पिछले दिनों दिल्ली के डाबड़ी में एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया. एक पति ने महज इस वजह से अपनी गर्भवती पत्नी के साथ मारपीट की और उस की हत्या का प्रयास किया, क्योंकि उसे और उस की मां को शक था कि होने वाला बच्चा लड़की है, लड़का नहीं. पुलिस को दिए गए महिला के बयान के मुताबिक 2014 में इस महिला ने लव मैरिज की थी. इस बीच उसे एक बेटी हुई. वह दोबारा गर्भवती हो गई.

पति को शक था कि गर्भ में फिर से लड़की है, इसलिए वह गर्भपात कराना चाहता था. पर महिला ने इनकार कर दिया. इस पर पति उसे घसीट कर जबरन ले जाने का प्रयास करने लगा. महिला ने इस का विरोध किया, तो पति ने जान से मारने की धमकी देते हुए उस का गला दबाने की कोशिश की. फिर उसे बालों से पकड़ कर उस का सिर जोर से दीवार पर दे मारा. घायल महिला ने किसी तरह 100 नंबर पर काल कर के पुलिस को वारदात की जानकारी दी. आरोपी पति पर धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू की गई है.

ऐंड टीवी पर ‘वारिस’ धारावाहिक आता है, जिस में एक मां अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए सब से झूठ बोलती है कि उसे बेटी नहीं बेटा हुआ है. वह बेटे के रूप में ही बेटी का पालनपोषण करती है. उसे जमाने से लड़ना सिखाती है, उसे वारिस के तौर पर तैयार करती है. यह महज एक कहानी नहीं. कहीं न कहीं हमारी जिंदगी से जुड़ी हुई हकीकत है.

चुनौतियों का सामना

आज भी जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रही लड़कियों को अपने वजूद की रक्षा हेतु दूसरों का मुंह देखना पड़ता है. कितनी विसंगतियां हैं, हमारे समाज में. बुढ़ापे में मांबाप का खयाल रखने के लिए जीजान एक करने वाली बेटियों को जन्म लेते ही नमक चटा कर मारने का प्रयास किया जाता है. स्त्री कोख में पलबढ़ कर दुनिया में कदम रखने वाला पुरुष, उसी स्त्री के वजूद को कोख में ही छिन्नभिन्न कर डालने का दुस्साहस करता है. देवी की तरह पूजने का ढोंग करने वाला समाज लड़कियों को ही आग की लपटों के हवाले करने में संकोच नहीं करता. कभी हत्या, कभी बलात्कार, कभी दहेज हत्या, कभीकभी घरेलू हिंसा का शिकार होती ये लड़कियां आखिर कब तक अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष करती रहेंगी?

2011 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक 1000 बच्चों में लड़कियों का अनुपात 943 है. इस संदर्भ में सोशल वर्कर अनुजा कपूर कहती हैं, ‘‘आखिर एक लड़की को अपना वजूद बनाए रखने के लिए इतनी चुनौतियों का सामना क्यों करना पड़ता है? हम लड़कियों को कोख में ही मार डालते हैं. मगर कभी लड़कों का गला क्यों नहीं दबाते? हमारे कानून ऐसे हैं, जो महिलाओं को कहीं न कहीं कमजोर बनाते हैं. तभी उन के साथ हो रहे अन्यायों की कोई रोकथाम नहीं हो पाती. कानून ही नहीं स्वयं औरत ही औरत के विरुद्ध हो जाती है.’’

पारस हौस्पिटल, गुड़गांव की डा. नूपुर गुप्ता कहती हैं कि भ्रूण हत्या डिलिवरी से कहीं ज्यादा रिस्की होती है. मां के जीवन को भी खतरा हो सकता है. कई दफा इस तरह गर्भपात कराने के बाद दूसरी प्रैगनैंसी में दिक्कतें आती हैं.  20 सप्ताह के बाद यों भी गर्भपात कराना जिंदगी को खतरे में डालने के समान है.’’

‘अस्तित्व मुझ से मेरी पहचान’ एनजीओ की फाउंडर प्रैसीडैंट अनामिका यदुवंशी कहती हैं, ‘‘अशिक्षा, असुरक्षा एवं गरीबी समाज में लड़की को बोझ समझने का मुख्य कारण हैं. हमारे देश में तकनीकी उन्नति ने भ्रूण जांच को बहुत आसान बना दिया है. जरूरी है कि लोगों की सोच बदली जाए. उन्हें समझाया जाए कि बच्चा स्वस्थ होना जरूरी है. फिर चाहे वह लड़का हो या लड़की, इस से उस की अहमियत में फर्क नहीं पड़ता.’’

ताकि कसी जा सके लगाम

इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व एक बहुत ही दिलचस्प वाकेआ सुनने को मिला. हरियाणा की 2 बहनों ने अपनी शादी की रस्मों में 2 फेरे जुड़वाए और अपनेअपने पति से वचन लिया कि वे कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ काम करेंगे और पर्यावरण का ध्यान रखेंगे.

जींद जिले की इन 2 बहनों- दामिनी और चंचल की इस अनूठी शादी का खयाल उन के पिता जगदीप सिंह के दिमाग में आया था और ऐसा उन्होंने जिले में लड़कियों के लिहाज से बेहद दयनीय लिंगानुपात की वजह से सोचा. ऐसी घटनाएं समाज में कोई आधारभूत परिवर्तन ले आएं कुछ कहा नहीं जा सकता, मगर इस तरह की प्रतीकात्मक पहल इस दिशा में समाज को कुछ सोचने पर तो जरूर विवश करती है.

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अपना निजी विचार रखा था कि लिंग जांच को अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि जिन महिलाओं के गर्भ में लड़की है, उन का ध्यान रखा जा सके. इस जांच को रजिस्टर किया जाए ताकि पता लग सके कि इन लड़कियों को जन्म दिया गया या नहीं. इस तरह कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम कसी जा सकती है.

क्या कहता है कानून

भारतीय कानून में प्रीकंसैप्शन ऐंड प्रीनेटल डायग्नोस्टिक टैकनीक्स ऐक्ट 2002 के अनुसार, गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच करना, शब्दों या इशारों से गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग के बारे में बताना या पता करना, गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जांच कराने का विज्ञापन देना, गर्भवती महिला को उस के गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग के बारे में जानने के लिए उकसाना, किसी व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्रेशन करवाए बिना प्रसव पूर्व निदान तकनीक अर्थात अल्ट्रासाउंड इत्यादि मशीनों का इस्तेमाल करना, गर्भवती महिला को उस के परिजनों या अन्य के द्वारा लिंग जांचने के लिए प्रेरित करना आदि कानूनन अपराध है. इस से पहले हमारे देश में प्रीनेटल डायग्नोस्टिक ऐक्ट 1994 था, लेकिन इस कानून में प्रीकंसैप्शन डायग्नोसिस का प्रावधान न होने की वजह से 2004 में नया कानून लाया गया.

कानून का उल्लंघन करने पर सजा

प्रीकंसैप्शन ऐंड प्रीनेटल डायग्नोस्टिक टैकनीक्स ऐक्ट 2002 के अनुसार पहली बार कानून का उल्लंघन करने पर अपराधी को 3 साल की कैद व क्व50 हजार तक का जुर्माना हो सकता है. दूसरी बार पकड़े जाने पर 5 साल की कैद व क्व1 लाख तक का जुर्माना हो सकता है. वहीं लिंग की जांच करने का दोषी पाए जाने पर क्लीनिक का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा.

कुनाल मदान, अधिवक्ता, के एम ए ला फर्म का कहना है, ‘‘कन्या भ्रूण हत्या भी कत्ल के समान ही एक गंभीर अपराध है, इसलिए इस जघन्य अपराध के लिए 3 साल की सजा अपर्याप्त है. मेरा मानना है कि मौजूदा कानून को और अधिक सख्त बनाया जाना चाहिए. हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए एक महिला को जिस ने लड़के की चाहत में अपनी 3 साल की लड़की के कत्ल को अंजाम दिया, को उम्र कैद की सजा सुना कर पूरे समाज को एक बड़ा सबक दिया है. इसलिए जरूरी है कि कानून को और अधिक सख्त  बनाया जाए, तभी भ्रूण हत्या को नियंत्रित किया जा सकेगा.

जरूरी यह भी है कि लोगों की मानसिकता बदली जाए, महिलाओं को शिक्षित किया जाए, समाज को जागरूक बनाया जाए ताकि लड़कियों को उन के हिस्से का आसमान मिल सके और किसी भी अजन्मी बच्ची का मन यह चीत्कार न करे कि-

‘मेरा भी था यह अरमान,

बढ़ाऊं घर वालों का मान,

मगर कोख में ही ले ली गई,

अपनों द्वारा मेरी जान.’

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