एक जमाना था जब किसी भी तरह की पक्की छत लोगों को स्वीकार थी या आज लाइफ स्टाइल के साथ मजबूती और टिकाऊ भी मकान में होना जरूरी हो गया है. जहां पहले दिल्ली डेवलेपमैंट अथौरिटी के मकानों को अलाट कराने के लिए हजार तरह की सिफारिशें लगाई जाती थीं और रिश्वतें दी जाती थीं अब ये मकान लौटाए जा रहे हैं और हाल में 27′ लोगों ने अपने मकान लेने से इंकार कर दिया.
ये सरकारी मकान अब सस्ते तो नहीं रह गए थे उलटे इन की बनावट खराब है और यह पक्का है कि इनकी रखरखाव पर डीडीए कोई ध्यान न देगा क्योंकि डीडीए अपने लिए जीता है, चलता है, काम करता है. जनता के लिए नहीं. घरों के चलाने वाली औरतों ने अब खराब मकान लेने से इंकार कर दिया चाहे वे वर्षों इन का इंतजार कर चुकी हो.
आज की औरत को डीडीए ही नहीं देश भर की सरकारें कम न समझें. शिक्षा और आजादी ने उन्हें इतनी समझ दे दी है कि अकेलेे होते घरों में वे पहली धुरी हैं और उन के पति. पिता या बेटे बाद में आते हैं. घर को चलाने के लिए आवश्यकताओं की समझ उन्हें है और घर ही चुनौतियों का सामना उन्होंने ही करना है. अब वे इंकार करना जानती है और डीडीए यह सब करोड़ों का नुकसान सह कर समझ रही है.
आज की औरतें मकान के रखरखाव पर बहुत ज्यादा चूजी होती जा रही हैं और अब जैसा है चलेगा की भावना खत्म होती जा रही है. मकानों में प्राइवेट बिल्डरों की बाढ़ आ गई है और डीडीए जैसे सरकारी संस्थाएं अब निरर्थक हो गई हैं. औरतों को अब सरकारी बाबू नहीं चाहिए जिस के सामने वे गिड़गिड़ाएं, उन्हें अब सप्लायर चाहिए जो उन की मर्जी से काम करे, जो उन की सुने और उन की शिकायत दूर करे.
सरकारी मकान तो एक उदाहरण है कि किसी की भी मोनोपोंली असल में भीषण में होती है आज यही टैक्नोलौजी में हो रहा है जिस में कुछ कंपनियों ने एकाध्धिककार कर के दिमाग और जानकारी पर वैसा ही कब्जा कर लिया है जैसा भवनों और मकानों की जमीनों पर 30 साल पहले सरकार का था. आम जनता और विशेषत औरतों की एक पीढ़ी ने बहुत बुरे मकानों में अपने जीवन के कीमती साल बर्बाद करें क्योंकि सरकार को अपनी चलाने की पड़ी थी.
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आज सरकार सुधरी है, ऐसी नहीं लगता. सरकार आज भी घरों के आसपास में ऐसा ढंग से नहीं रख पा रही है और शहर में कुछ वीआईपी इलाकों को छोडक़र सब दूसरी जगहों को बुरी तरह निग्लैक्ट किया जा रहा है क्योंकि औरतों ने राकेश टिकैत की तरह धरने देने शुरू नहीं किए हैं. अगर शाहीन बाग और किसान मोर्चो की तरह कालोनी सुधार मोर्चे लगने शुरू हो जाएं तो ही शहरी जीवन सुधरेगा. कुछ हफ्तों की मेहनत बाकी जीवन को सुधार देगी.