दिल्ली में बहुत सी जमीन केंद्र सरकार की है जिसे अरसा पहले सरकार ने खेती करने वाले किसानों से कौढिय़ों के भाव खरीदा था. इस में बहुत जगह कमॢशयल प्लाट बने हैं, छोटे उद्योग लगे हैं. रिहायशी प्लाट कट कर दिए गए हैं. जिन कीमतों पर जमीन इंडस्ट्री, दुकानों या घरों को दी गई उस से थोड़ी कम कीमत पर स्कूलों, अस्पतालों, समाजसेवी संस्थाओं को दी गई. यह जमीन दे तो दी गई पर केंद्र सरकार का दिल्ली डेबलेपमैंट अथौरिटी उस पर आज भी 50-60 साल बाद भी कुंडली लगाए भी बैठा है जबकि उद्योग चल रहे है, दुकानें खुली, लोग रह रहे है स्कूल अस्पताल चल रहे हैं.

उस का तरीका है लगे होल्ड जमीन. डीडीए ने आम बिल्डरों की तरह एक कौंट्रेक्ट पर सब आदमियों से साइन करा रखे है कि कौंट्रेक्ट, जिसे सब लोग कहते हैं, कि किसी भी धारा के खिलाफ काम करने पर अलौटमैंट कैंसिल की जा सकती है चाहे कितने ही सालों से वह जमीन अलाटी के पास हो.

ऐसा देश के बहुत हिस्सों में होता है और लीज होल्ड जमीनों पर आदमी या कंपनी या संस्था खुद की पूरी मालिक नहीं रहती. नियमों को तोडऩे पर जो परोक्ष रूप में सरकार के खिलाफ कुछ बोलने पर भी होता है. इस धारा को इस्तेमाल किया जाता है. बहुत से लोग इस आतंक से परेशान रहते हैं.

जहांं भी लीज होल्ड जमीन और अलादी सब लीज के बंधनों से बंधा है वहां खरीदफरोक्त, विरासत में, भाइयों के बीच विवाद में अलौट करने वाला. सरकारी विभाग अपना अडग़ा अड़ा सकता है. 40-50 साल पुरानी शर्तें आज बहुत बेमानी हो चुकी हैं. शहर का रहनसहन तौरतरीका बदल गया है. कामकाज के तरी के बदल गए है पर लीज देने वाला आज भी पुरानी शर्तों को लागू कर सकता है.

कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं लीज की शर्तों के आधार पर काफी सारा दिल्ली का व्यापार ठप्प करा दिया था कि रहायशी इलाकों में दी गर्ई जमीन पर कमॢशयल काम नहीं हो सकता. चाहे यह सिद्धांत 40-50 साल पहले ठीक रहा हो पर आज जब दुकानों की जरूरत है तो चांदनी चौक के रिहायशी कटरे भी दुकानों में बदल गए हैं और खान मार्केट के भी. और शहरों में भी ऐसा हो रहा है लखनऊ के हजरतगंज में ऊपरी मंजिलों में घर गायब हो गए हैं. जयपुर की सी स्कीम में बड़ी घरों की जगह माल बन गए हैं.

सरकारी दफ्तर फिर भी पुराने अधिकार छोडऩे को तैयार नहीं है क्योंकि यह कमाई का बड़ा साधन है. दिल्ली में एक अस्पताल का 1995 में अलौटमैंट कैंसिल कर दिया गया कि वह अस्पताल शुरू करने वालों ने दूसरों को बेच दिया गया जबकि अस्पताल की संस्था वही थी, बस मेंबर बदले गए थे. ट्रायल कोर्ट ने डीडीए का पक्ष लिया पर उच्च न्यायालय ने मामला खारीज कर दिया कि मेंबर बदलना, बेचना नहीं है.

असल में सरकारों को आम आदमी की ङ्क्षजदगी में जितना कम हो उतना ही रहना चाहिए. जब तक वजह दूसरों का नुकसान न हो, सरकार नियमों कानूनों का हवाला दे कर अपना पैसा नहीं वसूल सकती.

देश की सारी कृषि भूमि पर सरकार ने परोक्ष रूप से कुंडली मार ली है. उसे सिर्फ कृषि की भूमि घोषित कर दिया गया है. उस पर न मकान बन सकते है न उद्योग लग सकते है जब तक सरकार को मोटी रकम न दी जाए. सरकारको कृषि योग्य जमीन बचाने की रुचि नहीं है, वह सिर्फ कमाना चाहती है. चेंज इन लैंड यूज के नाम पर लाखों करोड़ों वसूले भी जाते हैं, और मनमानी भी की जाती है. अगर पैसा बनाना हो तो 10-20 साल आवेदन को जूते घिसवाए जा सकते हैं.

अब जमीनें औरतों को विरासत में मिलने लगी हैं. उन्हें इन सरकारी दफ्तरों से निपटना पड़ता है. उन को हर तरह से परेशान किया जाता है. तरहतरह के दयाल पैदा हो गए हैं. हर तरह के ट्रांसफर पर आपत्ति लगा दी जाती है. बेटियों के लिए पिता की संपत्ति एक जीवन जंजाल बन गया है जिसे न निगला जा सकता है न छोड़ा जा सकता है क्योंकि सरकारी सांप गले में जा कर फंस जाता है.

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