साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली मनीषा शाह होनहार छात्रा थी. वह डाक्टर बनने का सपना देखती थी. अपने इस सपने को पूरा करने के लिए वह कड़ी मेहनत से पढ़ाई करती थी. गरीबी उस की राह में बाधा नहीं बनी. उस के इंटरमीडिएट में अच्छे मार्क्स आए, जिस से उस के हौसलों में इजाफा हो गया, लेकिन एक ही झटके में उस का सपना तिनकातिनका हो गया. बिस्तर पर अब उस की जिंदगी दूसरों के सहारे की मुहताज हो चुकी है. पढ़ाई की बात करने पर उस की आंखों से आंसू छलक आते हैं. परिवार के साथ गरीबी पूरी बेरहमी से पेश आ रही है.

बमुश्किल दो वक्त की रोटी और उन दवाओं का इंतजाम हो पाता है, जो मनीषा को जिंदा रखने के लिए जरूरी हैं. सभी की कोशिश मनीषा की जिंदगी बचाने की है. वक्त के साथ मनीषा को दर्द के दरिया से नजात मिल कर सब ठीक भी हो जाए, लेकिन वह टीस कभी नहीं जाएगी जो एक शोहदे ने उसे दी. वह सभ्य समाज में उस छेड़छाड़ का शिकार हुई जो युवाओं के लिए फैशन बन गया है.  यह कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत है कि हर मिनट कोई न कोई युवती या महिला किसी न किसी कुंठित मानसिकता के हैवान का खुलेआम शिकार हो रही है. बेटियों की सुरक्षा को ले कर चिंता अभिभावकों की भी स्थायी फिक्र बन चुकी है. हकीकत के नैतिक पतन रूपी इस आईने से रूबरू और जागरूक के लिए कोई बुलंद आवाज नहीं उठती. नतीजतन, इस रोग का दायरा बढ़ता जा रहा है.  दरअसल, मनीषा मौडर्न शहर का लिबास पहने दिल्ली से सटे नोएडा के मोरना गांव की रहने वाली है. उस के इलैक्ट्रीशियन पिता दिहाड़ी पर काम करते हैं. इस परिवार की पूरी दुनिया महज एक कमरे में सिमटी  हुई है.

बचपन से ही गरीबी का सामना करने वाली मनीषा पढ़लिख कर परिवार का सहारा बनना चाहती है. हौसलों को वक्त के साथ वह पंख भी दे रही थी. गांव के 2 युवक मनीषा को परेशान करते थे और वह उन का विरोध करती थी. 19 मई की रात जब वह घर की छत पर थी, तो उन शरारती युवकों ने वहां पहुंच कर उस के साथ छेड़छाड़ कर दी.

उस ने विरोध किया, तो उन्होंने उसे छत से धक्का दे दिया, जिस से मनीषा के सिर, कमर व शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें आईं. सिर पर लगी गहरी चोट से उस का दिमागी संतुलन गड़बड़ा गया, जिस की वजह से कभीकभी वह खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाती. अस्पताल का खर्च ज्यादा था लिहाजा, छुट्टी करा कर मनीषा को घर में रखा गया, लेकिन इलाज जारी रहा. बेटी के इलाज में पिता कर्जदार हो चुके हैं. सीबीएसई बोर्ड की इंटरमीडिएट की परीक्षा में 94 प्रतिशत मार्क्स लाने वाली मनीषा इलाज और हौसले से शायद उन बुलंदियों को छू सके जिन का कभी उस ने ख्वाब देखा था. हालांकि आरोपी युवकों को पुलिस जेल भेज चुकी है.

तमाशबीन जनता

छेड़छाड़ की घटना की मनीषा इकलौती शिकार हो, ऐसा नहीं है. समाज में ऐसी घटनाओं का दायरा बढ़ता जा रहा है. युवतियां और महिलाएं छेड़छाड़ की शिकार हो रही हैं. कामकाजी महिलाएं व छात्राएं आएदिन इस कड़वी हकीकत से दोचार होती हैं.

छेड़छाड़ करने वालों के हौसले इतने बुलंद हैं कि न उन्हें समाज का डर होता है न कानून का. समाज तमाशा देखने का आदी हो चुका है और कानून अपराध होने पर ही अपना काम करता है. वह भी तब, जब बात हद से पार हो जाए.  इलाहाबाद की रहने वाली छात्रा रीना को स्कूल जाने से अब डर लगता है. उस के मातापिता हर वक्त बेटी को ले कर चिंतित रहते हैं, क्योंकि उन का एक ऐसी घटना से सामना हुआ, जिस ने उन की चिंता को और भी बढ़ा दिया. रीना को स्कूल आतेजाते कुछ शरारती युवक परेशान करते थे. पहले उस ने यह सब नजरअंदाज किया, लेकिन जब उन की हरकतें ज्यादा बढ़ गईं तो उस ने अपने पिता को सारी बातें बताईं. उन्होंने 3 युवकों की शिकायत पुलिस से की, लेकिन जब उन युवको को इस का पता चला, तो वे बौखला गए और उन्होंने रीना के घर पहुंच कर धावा बोल दिया. गालीगलौज करते हुए उसे जान से मारने की भी धमकी दी. बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन रीना के मन में एक अनजाना भय स्थायी रूप से घरघर गया है.

छेड़छाड़ की शिकार युवतियों को अकसर मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, जिस के चलते यह अपमान और खतरा बरदाश्त से बाहर हो जाता है और वे घातक कदम भी उठा लेती हैं.  सहारनपुर जिले के सीकरी की रहने वाली 11वीं की एक छात्रा को 2 युवक अकसर परेशान करते थे. उस के विरोध के बावजूद युवकों की छेड़छाड़ बढ़ती गई. उस ने पिता से उन की शिकायत की, तो उन्होंने युवकों को अपनी हरकतों से बाज आने की सख्त चेतावनी दी. कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन युवक फिर से अपनी हरकतों पर उतर आए.

उन की छेड़छाड़ से वह युवती इतनी परेशान हो गई कि एक दिन उस ने अपने घर में ही फांसी का फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली. समाज में छेड़छाड़ से परेशान युवतियों द्वारा इस तरह के घातक कदम उठाने के मामलों का ग्राफ बढ़ रहा है. हालांकि, हिम्मत हारने के बजाय युवतियों को हालात का जम कर मुकाबला करना चाहिए.

मजबूरी की मार

बहुत से मामलों में युवतियां छेड़छाड़ सहने को मजबूर होती हैं. मुसीबत की वजह से वे कई बार खुल कर विरोध नहीं कर पातीं. दबंग व बुलंद हौसले वाले शरारती तत्त्व उन्हें तरहतरह से परेशान करते हैं. ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भी भयावह है. दबंग चाहते हैं कि युवतियां उन की छेड़छाड़ को बरदाश्त करें. उन की बात न मानने या विरोध करने पर नौबत मारपीट या हिंसा तक आ जाती है.

पीलीभीत जिले के मल्लपुर गांव की एक 13 वर्षीय किशोरी शाम को नल पर पानी भरने गई. तो एक दबंग ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. वह खींच कर उसे पास के एक कमरे में ले गया. किशोरी ने जब इस की शिकायत अपने परिवार से करने की धमकी दी, तो वह हिंसक हो गया और उस पर उस ने मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी. जलती हालत में वह चीखते हुए भागी और बाहर आ कर गिर गई. लोगों ने मुश्किल से आग बुझा कर उसे अस्पताल पहुंचाया. बाद में पुलिस ने उस दबंग को गिरफ्तार कर लिया.

किस राह किस के साथ छेड़छाड़ हो जाए इसे कोई नहीं जानता. सहारनपुर जिले में एक भिखारी महिला के साथ भी एक युवक ने छेड़छाड़ कर दी. महिला के विरोध के बाद युवक को पुलिस के हवाले कर दिया गया. छेड़छाड़ के मामलों में आरोपी अंजाम भुगतने तक की धमकियां देते हैं.  ऐसे मामलों में पीडि़ता यदि पुलिस के पास जाती है, तो उसे कई बार बदनामी का डर दिखाया जाता है. कितने ही मामले ऐसे होते हैं जिन्हें पुलिस गंभीरता से नहीं लेती और आरोपी को सिर्फ चेतावनी दे कर छोड़ देती है. वह फिर कभी किसी के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा, इस की कोई गारंटी नहीं होती.

अमूमन छेड़छाड़ करने वाले पुलिस के इस लचीले रवैए का फायदा उठाते हैं. लोगों की भी यह प्रवृत्ति बन गई है कि यदि किसी सार्वजनिक स्थल पर किसी के साथ छेड़छाड़ हो रही हो, तो वे दखल देने से गुरेज करते हैं. घर, स्कूल, दफ्तर या बाजार आतेजाते महिलाओं व युवतियों के मन में छेड़छाड़ का डर बना ही रहता है. छेड़छाड़ किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती. यह न सिर्फ किसी युवती के लिए बल्कि समाज के लिए भी बड़ी फिक्र होनी चाहिए.

एक तरह का मनोरोग

महिलाएं व युवतियां अकसर सब से अधिक सार्वजनिक स्थलों पर छेड़छाड़ का शिकार होती हैं. किसी को छू कर निकलना, पीछा करना, सीटी बजाना, सांकेतिक टिप्पणी करना या अश्लील इशारा करना इसी श्रेणी में आता है. इस की शिकार महिलाएं कई बार इसे नजरअंदाज करने की कोशिश करती हैं. विरोध करने पर ऐसा करने वाले अकसर सरल तरीका खोजते हैं. कई बार वे शिकार महिला को ही झूठा साबित करने पर अड़ जाते हैं. तमाशबीन लोग पचड़े में नहीं पड़ना चाहते. उन की यह सोच छेड़छाड़ करने वालों को हिम्मत देती है.

चिकित्सकों की राय में महिलाओं पर बुरी नजर रखने और उन से छेड़छाड़ करने वाले वास्तव में एक तरह के मानसिक रोग से पीडि़त होते हैं. ऐसी विकृत मानसिकता के लोगों के दिमाग में कुछ गलत विचार चल रहे होते हैं. किसी भी विपरीतलिंगी को देख कर गलत विचारों की शृंखला और बढ़ जाती है. मौका लगते ही वे छोटीबड़ी हरकत करते हैं. यदि कोई विरोध करता है, तो अनजान बनने का नाटक करते हैं. पीडि़ता यदि कमजोर हो, तो वह कुंठित हो कर घातक कदम उठाने से भी नहीं चूकते.

क्या कहता है कानून

छेड़छाड़ को ले कर कानून बेहद सख्त है और समयसमय पर उस में बदलाव भी किया गया है. बावजूद इस के छेड़छाड़ का मर्ज समाज में बढ़ रहा है.

अधिवक्ता राजेश द्विवेदी बताते हैं कि पहले छेड़छाड़ के मामले में अधिकतम 2 साल की कैद की सजा का प्रावधान था, लेकिन निर्भया कांड के बाद कानून में हुए बदलाव के बाद अब छेड़छाड़ के मामले में अपराध की गंभीरता के हिसाब से व्याख्या की गई है. अलगअलग सैक्शन में सजा का प्रावधान भी अलग हैं. दोषी को 1 से ले कर 7 साल तक की सजा हो सकती है. इतना ही नहीं, धारा 354 व उस के सैक्शन के अंतर्गत आने वाले इस अपराध को गैर जमानती अपराध माना गया है.  कानून के तहत किसी महिला को गलत मंशा से छेड़ना, आपत्तिजनक इशारा करना, मरजी के खिलाफ पौर्न दिखाना, जबरन किसी के कपड़े उतारना, उसे उकसाना, किसी का आपत्तिजनक फोटो लेना, उन्हें बांटना, किसी का पीछा करना या जबरन बात करने का प्रयास करना अपराध है.

 ऐसे में कोई भी महिला शिकायत दर्ज करा सकती है.  छेड़छाड़ के मामलों को ले कर अदालतें भी गंभीर रहती हैं. एक मामले में कोर्ट की यह टिप्पणी कथित सभ्य समाज को आईना दिखाने के लिए काफी है, जिस में कहा गया कि किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या उस का पीछा करना उस के जीने के अधिकार का उल्लंघन है. पुलिस महिलाओं को ऐसा सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराए कि वे कहीं भी बेखौफ आजा सकें.

महिला आईपीएस मंजिल सैनी कहती हैं कि छेड़छाड़ के मामले में पीडि़ता को तुरंत पुलिस की मदद लेनी चाहिए.

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