15 अगस्त 1947, पूरे देश द्वारा मनाया जाने वाला एक दिन और एक संघर्ष के अंत का प्रतीक नहीं था, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था, कानून व्यवस्था, गरीबी का उन्मूलन, आदिके पुनर्निर्माण की शुरुआत थी. इस वर्ष एक स्वतंत्र राष्ट्र होने के 75 गौरवशाली वर्षों को पूरा कर रहे हैं.वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता उसके आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ था. अंग्रेजों द्वारा किए गए विभिन्न हमलों और डीमोनिटाईजेशन के कारण, देश बुरी तरह से गरीब और आर्थिक रूप से ध्वस्त हो गया था. ऐसे में आजाद देश कई समस्याओं से गुजर रहा था, क्या अभी भी उन समस्याओं से देश के नागरिक निजात पा चुके है? क्या कानून व्यवस्था आज भी सर्वोपरि है? आइये जानें,मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस विद्यासागर कनाडे से हुई बातचीत के कुछ खास अंश.
विश्वास बनाए रखना है कानून पर
इस बारें में मुंबई हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस विद्यासागर कनाडे कहते है कि 75 सालों बाद भी ये गनीमत है कि देश की जनता का विश्वास कानून से हटा नहीं है. मसलन अयोध्या का केस कई सालों तक पड़ा रहा. हाई कोर्ट के जजमेंट के समय पूरे देश में कर्फ्यू लगा था, शिक्षा संस्थान बंद थे, लेकिन कुछ नहीं हुआ. न तो सार्वजनिक संपत्ति नष्ट हुई और न ही तोड़-फोड़ हुई. दोनों पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी. लोगों को इतना विश्वास कानून तंत्र पर था कि कुछ समस्या नहीं आई और एक बीच का रास्ता निकाला गया. आज भी किसी प्रकार के न्याय के परिणाम में देर होती है, तारीख पर तारीख पड़ते रहते है. समय पर न्याय नहीं मिलता, लेकिन मुझे लगता है कि न्याय तंत्र में कुछ सुधार लाना जरुरी है. ताकि जनता का विश्वास जारी रहे. इसमें सबसे पहले अपॉइंटमेंट में देर होती है, जो केंद्र सरकार और गठबंधन साथ में करती है.
जज दोषी नहीं
इसके आगे वे कहते है कि न्याय में देरी की वजह केवल जज को देना उचित नहीं. वकील को किसी केस को तैयार करने में लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसमे तर्क, लोगों की बातें आदि में समय लगता है. आर्गुमेंट को अगर एक से दो घंटे का समय दिया जाय, तो बार काउंसिल धरने पर जाती है. वैसा अमेरिका और इंग्लैंड में नहीं है, कितना भी बड़ा केस हो एक से दो घंटे का समय आर्गुमेंट के लिए दिया जाता है, महीने-महीने बहस चलती है और एक अंतिम निर्णय तक पहुंचा जा सकता है, जो जल्दी भी होती है.
दूसरी अहम बात है कॉस्ट अधिक हो जाता है, क्योंकि पहले लोग PIL का पास करते है. इसमें अगर कोई दावा दाखिल नहीं हुआ फिर भी डिफेन्स करते है, क्योंकि उन्हें अधिक मूल्य नहीं देना पड़ता. ब्रिटेन और अमेरिका में जितना कॉस्ट है पूरा एक साथ देना पड़ता है. उसमे सुधार लाने की जरुरत है, ताकि विशेषाधिकार मुकदमा (प्रिविलेज लिटिगेशन) कम हो जाय. इससे पेंडिंग पड़े फाइल की संख्या कम हो जायेगी, क्योंकि आज भी बिना किसी न्याय के सालों साल फ़ाइलें पड़ी रहती है. जबकि अमेरिका और ब्रिटेन में लोग आपस में सेटल कर लेते है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि केस न जीतने पर उनके लिए ये महंगा साबित होगा. इस प्रोसेस को प्री लिटिगेशन सेटलमेंट कहा जाता है. ये होने पर पेंडिंग की समस्या कम हो जाएगी. करीब 60 प्रतिशत लिटिगेशन सरकार की होती है, जिसमे भूमि अधिग्रहण, अवार्ड देने के बाद रेफ़रेंस आदि सुप्रीमकोर्ट तक चलता रहता है. इनकम टैक्स की प्रक्रियां में राज्य सरकार की करीब 70 प्रतिशत लिटिगेशन के केसेज होती है, उन्हें लिटिगेटिंग नेचर को कम करना जरुरी है.
काम है चुनौतीपूर्ण
जज बनने के बाद खास काम के बारें में पूछने पर जस्टिस कनाडे कहते है कि मैं 16 साल जज था, उस दौरान मैंने 34,000 केसेज को अंजाम तक पहुँचाया था. स्पेशल टाटा स्कैम में मैंने 2000 मैटर्स को मैंने बाहर निकला. लोगों को लगता है कि जज अपना काम निष्ठा से नहीं कर रहे है. जबकि कई पोस्ट जजों के खाली पड़े है. 4 जज का काम एक जज अब कर रहा है. यहाँ 8 बजे तक कोर्ट चलते है. जो काम जज करता है, उससे पहले वकील के रूप में वह जितना कमा पाता है, उसके हिसाब से बहुत कम वेतन है. न्याय का यह काम एक तरीके का त्याग है, लेकिन वे इमानदारी से काम करते है. इसके अलावा जज हमेशा सही न्याय करता है, लेकिन भ्रष्टाचार के जो आरोप जज को लगते है, उसे इग्नोर करना पड़ता है, क्योंकि अगर व्यक्ति केस जित जाता है, तो जज का न्याय उसे ठीक लगता है, अगर हार जाता है, तो जज भ्रष्टाचारी कहा जाता है. बिक गया है, ये इमेज वकीलों के समूह तैयार करते है, लेकिन मेरी नजर में काम ईमानदारी से ही होता है.
आम आदमी के लिए कानून
आम जनता में कानून की कम जानकारी के बारें में उनका कहना है कि CPC में दिए गए बातों को कड़ाई से पालन करना चाहिए, ताकि न्याय पाने में देर न हो. महिलाओं को कानून की जानकारी कम होने की वजह उनका किसी विषय पर जागरूक न होना है. आजकल किसी भी जानकारी को इन्टरनेट के जरिये जाना जा सकता है. ये सही है, साधारण इंसान कानून कम जानते है, इसके लिए विदेशों की तरह कानून की सीरीज बननी चाहिए. खासकर शिक्षा में इसे सरल भाषा में किताबों में लिखी गई हो और सरकार की तरफ से सारे कानून को संक्षेप में स्थानीय भाषा में लिखकर किसी कमिटी के द्वारा पब्लिश कर इसे आम इंसान को देने से उसका फायदा उन्हें मिलेगा, क्योंकि ब्रिटिश चले जाने के बाद आज भी सभी काम अंग्रेजी में किया जाता है, जो गलत है. इसके अलावा किसी भी लॉ कमिशन को लाने के बाद लेजिस्लेचर को सलाह देते है. साधारण लोगों के लिए भारत सरकार को लेखकों की एक समूह बनाना जरुरी है, जिसमे एक्सपर्ट वकील भी शामिल हो और जो स्टैंडर्ड टेक्स्ट बना सकें,जिसमे सरल भाषा में इंडियन पीनल कोड,सीआरपीसी,बेल बांड के प्रोविजन आदि को संक्षिप्त में लिखकर देना चाहिए, ताकि आम नागरिक को समझने में आसानी हो. इसे सेक्शन वाइज न देकर चैप्टर वाइज कॉमन इंसान को देना चाहिये.
हुए कई अलग अनुभव
कार्यकाल में अपने अनुभव के बारें में जस्टिस कनाडे कहते है कि एक ग्रैंड मदर जो दूसरी पत्नी थी और उसकी दूसरेपति की भी मृत्यु हो गई, उनके सौतेले पोते-पोती थे, जबकि सौतेले बेटी का इस बूढी महिला के साथ प्रॉपर्टी को लेकर डिस्प्यूट चल रहा था. बेटी ने स्टेप मदर को जेल में और उनके पोती पोते को चाइल्ड होम में डाला. मैंने बच्चों को कोर्ट में लाने की आदेश दिया, दादी भीकोर्ट में लायी गयी और मैंने तुरंत दादी को पोते पोती से मिलवाया. इसके अलावा एक केस में एक विधवा का लड़का स्कूल जाता था, लेकिन उस महिला के पास बच्चे को पढ़ाने का पैसा नहीं था. मैंने इंस्टिट्यूशन को बुलाकार उनकी समस्या जानी और बच्चे को फ्री में शिक्षा देने की बात कही थी, उन्होंने नहीं माना और मैंने खुद उसे पढ़ने की बात सोची थी, पर इंस्टिट्यूशन ने उसकी फीस माफ़ कर दिया. ऐसे निर्णय देने के बाद खुद को संतुष्टि मिलती है.
सम्हाले नागरिक देश को
75वीं देश की आज़ादी को मना रहे देश की नागरिकों के लिए जस्टिस कनाडे का सन्देश है कि देश के लिए ही काम कीजिये, बाकी सब बेकार है. सभी नगरिक को देश को अहमियत देना है, ताकि भारत भी विकसित देशों की लिस्ट में शामिल हो सकें.