आज देशभर में किसी युवा जोड़े के लिए अपनी कमाई से अपना घर खरीदना लगभग असंभव हो गया है. जिनका पैकेज लाखों में है वे भी अपने मातापिता का पैसा जोड़ कर ही कुछ खरीद पाते हैं और जो मिलता है वह जरूरत से कम होता है. न मनमाफिक मकान होता है, न सुविधाएं, न साइज और न पड़ोस. सबको छोटे फ्लैटों या मकानों से काम चलाना पड़ रहा है और युवा जोड़ों को सुबून से 2 पल भी इन में अपने नहीं मिलते.

इसलिए जरूरी है कि पब्लिक प्लेसों को और खूबसूरत और ज्यादा बनाया जाए. इन में जोड़े, विवाहित हो या अविवाहित कम से कम हाथ पकड़ कर बतिया तो सकें. आमतौर पर शहरों के बागबगीचों मैलेकुचैले रहते हैं. बैच नहीं होते. पत्ते बिखरे रहते हैं. नशेड़ी कोनों में जम रहते हैं. बदबू आती है.

दिल्ली के लोधी गार्डन, रोशनारा गार्डन, या मुंबई की मेरिन ड्राइव जैसी जगह कई शहरों में हैं ही नहीं. दिल्ली में भी 2 करोड़ की आबादी के लायक सांस लेने की जगह काफी नहीं है और इसीलिए कुछ महिनों पहले तक इंडिया गेट पर हर इतवार को ऐसा लगता था कोई कुंभ का मेला हो. दिल्ली की घनी बस्तियों से उसे लोग सांस लेने के लिए पूरा इंडिया गेट व राजपथ भर देते थे. मोदी जी ने यह भी बंद कर दिया है. एक तरफ समर स्मारक बना दिया है जहां केवल वे ही किसी स्मारक में आते है. बाकी का सारा खुदा पड़ा है. उस का पुननिर्माण हो रहा है पर न जाने कैसा होगा.

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मुंबई और कई शहरों के मुकाबले के दिल्ली में बागबगीचे ज्यादा हैं पर इन में हिजड़ों और पुलिस वालों का मजमा रहता है. लोगों को खाने की जरूरत तो होती है पर जिस तरह से खोमचे और रेहड़ी वाले अच्छे बने बाग का सत्यानाश करते हैं वह हर घरवाली के लिए आफत है.

एक जमाने में लोग अपना खाना खुद लाते थे पर आज बाहर के खाने की संस्कृति इतनी है कि बच्चे बाहर आते ही खाना मांगते हैं और फिर जो गंद बागों में फैलता है वह इनका पर्पज ही खत्म कर देता है.

युवा जोड़ों को अपनी स्पेस मिले, यह बहुत जरूरी है. बन बैडरूम हाल में 4 जने रहते हो तो सब के साथ पूरा आकाश तो बांटने की इजाजत दो. उस पर यह मंदिर, वह स्मारक, यह मूॢत, वह फ्रूड कोर्ट तो न बनाओ.

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