अगर आप बैंक लोन के कर्ज पर ब्याज दर में 6 माह की सरकारी सहायता देने के वायदे पर खूब उछल रहे हैं तो संभल जाइए. यह वादा असल में और जुमलों की तरह एक और जुमला भर है. एक कैलकुलेशन के हिसाब से ₹50 लाख के कर्ज पर 8% की दर से यदि आप को ₹2,12,425 कंपाउंड इंटरैस्ट लगता था तो सरकार की महान घोषणा के बाद ₹12,245 सरकार देगी. कोविड-19 के दौरान लौकडाउन, बिजनैस ठप्प हो जाने, छोटे व्यापारियों का पैसा फंस जाने, बेमतलब की सरकारी अड़ंगेबाजी, थालीताली पीटने से जो नुकसान हुआ है वह क्या ₹12,245 से पूरा होगा?
जो लोग कोरोना की चपेट में आ कर बीमार हो गए उन के परिवारों को तो ₹10 लाख तक देने पड़े हैं. सरकारी अस्पतालों में इलाज मुफ्त हुआ है पर फिर भी सैकड़ों रुपए फालतू में बह जाते हैं जब घर के 1 या 2 सदस्य अस्पताल में भरती हो जाएं. इस सब की जिम्मेदार सरकार चाहे न हो पर जो सरकार हर पैसे की कमाई में हिस्सा लेने के लिए आ खड़ी होती है उसे आफत में जनता के साथ खड़ा होना चाहिए. माईबाप सरकार से यही अपेक्षा की जाती है.
मगर यहां तो सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह कोविड-19 के दौरान न तो आर्थिक सहायता दी, न खानेपीने, दवाओं, अस्पतालों पैट्रोल पर टैक्स कम किया ताकि जो पैसा लौकडाउन की शिकार जनता के हाथों में है वह और दिन चल सके.
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दुनियाभर में सरकारों ने जनता को भरपूर पैसा दिया है. कहीं सरकारों ने छोटे उद्योगों को अपने कर्मचारियों को वेतन देने की राशि उधार की तरह सहायता के रूप में दी तो कहीं लोगों के अकाउंट में सीधे उन के वेतन के बराबर पैसे डाल दिए ताकि वे लोग नौकरी या व्यापार न रहने पर भी गुजरबसर कर सकें.
हमारे यहां जो लाखों मजदूर लौकडाउन के दौरान अपने गांवों की ओर गए उन के पीछे उन के मालिकों के पास खत्म हुआ पैसा था. जीएसटी और नोटबंदी से पहले अधमरे हुए मजदूरों के मालिकों के पास इतना पैसा था ही नहीं कि वे मजदूरों को दे सकें. इन दिनों सामान भी नहीं बचा और ये लोग कहीं से पूंजी भी नहीं जुटा पाए.
सरकार ने वादा किया था कि ₹20 लाख करोड़ की आर्थिक सहायता दी है पर असल में यह न के बराबर है, क्योंकि सरकार ने महंगाई बढ़ने के डर से नोट छाप कर लोगों की सहायता नहीं की क्योंकि उसे डर था कि वह करों से होने वाली कम आय की पूर्ति कैसे करेगी?
इस सब का खमियाजा हर घरवाली को सहना पड़ा है, जिस की जमापूंजी कम हो गई है. लोगों ने इसीलिए खर्चे घटाए, हैल्प हटाई, बाहर का खाना नहीं मंगाया, पर घरवाली पर बो झ बढ़ गया. अब बच्चों के स्कूल जाने के समय जो राहत मिलती थी वह भी औनलाइन क्लासों की वजह से खत्म हो गई.
नुकसान हर तरफ औरतों का हुआ है. वैसे तो हिंदू औरतों को आज भी बराबरी का स्तर मिला ही नहीं पर जो सुविधाएं मिलने लगी थीं वे भी गलत सरकारी फैसलों से मिट्टी में मिल गई हैं. औरतों से उम्मीद की जाती है कि वे हर कष्ट झेलें, त्याग करें, उपवास करें, हवनों में घंटों आग के सामने बैठें, रीतिरिवाजों में ठंडे पानी में नहाएं और अब भक्त सरकार के गुणों के दर्शन कर के उस का गुणगान करें.
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