टाटा एआईए लाइफ इंश्योरैंस (टाटा एआईए) के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कामकाजी युवतियों की संख्या बढ़ी है लेकिन जब बात कोई फैसला लेने की आती है तो वे कतराती हैं. सर्वेक्षण से पता चलता है कि 59त्न महिलाएं अपने वित्तीय मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं लेती हैं. वैसे अगर उन्हें विकल्प दिया जाए तो 44त्न महिलाएं अपने फाइनैंशियल डिसीजंस खुद लेने को तैयार हैं. सर्वेक्षण के निष्कर्षों से यह भी पता चला कि 89त्न विवाहित महिलाएं और युवतियां फाइनैंशियल प्लानिंग के लिए अपने पति पर निर्भर हैं. शादी से पहले पिता युवतियों के फाइनैंशियल डिसीजंस के लिए जिम्मेदार होते हैं जिसे शादी के बाद चुपचाप पति को सौंप दिया जाता है.
अधिकांश महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अपने वित्त से संबंधित निर्णय लेने की स्वतंत्रता है. महिलाओं में फैसले न लेने का यह रवैया केवल महज आर्थिक बातों में ही नहीं है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश यही स्थिति है. उदाहरण के लिए इस समय त्योहारों का दौर चल रहा है. घरों में कपड़ों और दूसरी जरूरी चीजों की खरीदारी होती है जिस का फैसला ज्यादातर पुरुष लेते हैं. महिलाएं भी सब पुरुषों पर छोड़ देती हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि अकसर इन चीजों का इस्तेमाल उन्हें ही करना होता है.
अगर किचन इक्विपमैंट आ रहा है तो जाहिर है उस का इस्तेमाल स्त्री को करना है, बच्चों के कपड़े हैं तो वहां भी स्त्री को ही बच्चों को संभालना है. चीजें महिला के काम की हैं
मगर क्या लाना है या क्या नहीं लाना है यह फैसला पति का क्यों हो? घर के परदे बदलने हैं तो स्त्रियां अपनी पसंद के रंग वाले परदे क्यों न लाएं?
समाज की परिपाटी
दरअसल, हमारे समाज में सभ्य और संस्कारी औरत वही मानी जाती है जो समाज की बनाई परिपाटी के अनुसार जीवन बिताती है. मसलन, पढ़ाई के बाद जौब मिली तो ठीक और नहीं मिली तो शादी होने में देर नहीं लगती. शादी के बाद बच्चा पैदा करना है या नहीं इस में युवतियों की मरजी नहीं चलती. उन्हें बच्चे पैदा करने ही हैं और फिर उन की परवरिश और घरपरिवार संभालना ही उन का दायित्व बन जाता है. इन सब के बीच युवतियों की अपनी जिंदगी, अपनी पसंद, अपने लमहे और अपने फैसले खो से जाते हैं. वे वही करती जाती हैं जो उन्हें करने को कहा जाता है.
पहले पिता और सासससुर, फिर पति और उम्र बढ़ने पर बच्चे ही महिला की जिंदगी के छोटेबड़े हर तरह के फैसलों के मालिक होते हैं. कोई औरत इस परिपाटी को तोड़ना चाहे और अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहे तो समाज के लोग उसे कनखियों से देखने लगते हैं और उस पर छींटाकशी करना अपना अधिकार समझने लगते हैं.
जिंदगी जीने का हक
यदि कोई लड़की अविवाहित रहना चाहे या शादी के बाद बच्चा पैदा न करना चाहे, जौब पर फोकस करना चाहे या कोई पसंदीदा कैरियर अपनाना चाहे तो ऐसी लड़कियों को समाज अलग ही नजरिए से देखता है और उन का अपमान करता है. असल में समाज यह मानता है कि जिस ने शादी नहीं की उस को अपने हिसाब से जिंदगी जीने का कोई हक नहीं और अकेली रहने का हक तो बिलकुल नहीं. जिस ने शादी कर ली उसे केवल पति की आज्ञानुसार पीछेपीछे चलना है तभी वह संस्कारी और गुणी कहलाएगी. यदि कोई युवती अपने फैसलों के साथ जीना चाहती है तो अकसर समाज उस का जीना मुहाल कर देता है.
दिल्ली के अशोक नगर में रहने वाली अनुजा कहती हैं कि हमारी सोसाइटी में 35-40 साल की एक अविवाहित युवती अकेली रहती थी. वह कामकाजी थी. शनिवाररविवार ही घर पर दिखती और बाकी दिन ड्यूटी पर रहती. सोसाइटी के कुछ बुजुर्ग हमेशा उस महिला पर नजर रखते. कब उस के मित्र आते हैं, कब जाते हैं, उस ने कैसे कपड़े पहन रखे हैं, फोन पर क्या बातें करती है.
छोटीछोटी बात के लिए उसे परेशान करते. उस के चरित्र पर उंगली उठाते. उसे एक तरह से सोसाइटी से बहिष्कृत रखते. अंत में उस युवती ने तंग आ कर मकान ही खाली कर दिया और कहीं दूसरी जगह शिफ्ट हो गई.
मलाला यूसुफजई ने बदली सोच
इस संदर्भ में मलाला यूसुफजई का उदाहरण भी बहुत सटीक बैठता है जिसे पता था कि जिंदगी में उसे क्या चाहिए. उस ने अपने फैसले खुद लिए. किसी की नहीं सुनी. समाज की भी नहीं. मगर उसे बहुत कठिन रास्तों से गुजरना पड़ा.
एक स्त्री अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले भला यह संकीर्ण मानसिकता के लोगों को कैसे सहन हो सकता है?
मलाला का जन्म 12 जुलाई, 1997 को स्वात घाटी के सब से बड़े शहर मिंगोरा में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है. बहुत छोटी उम्र में ही मलाला में ज्ञान की प्यास पैदा हो गई थी. 2007 में जब मलाला 10 साल की थी तो तालिबान ने स्वात घाटी को नियंत्रित करना शुरू कर दिया और प्रमुख सामाजिकराजनीतिक ताकत बन गया.
शिक्षा पर प्रतिबंध
लड़कियों के स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. नृत्य और टैलीविजन देखने जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. तब 2008 के अंत तक तालिबान ने लगभग 400 स्कूलों को नष्ट कर दिया था. स्कूल जाने के लिए दृढ़निश्चयी और शिक्षा के अपने अधिकार में दृढ़विश्वास के साथ मलाला तालिबान के खिलाफ खड़ी हो गई. उस ने एक बार पाकिस्तानी टीवी पर कहा था, ‘‘तालिबान ने मेरी शिक्षा के मूल अधिकार को छीनने की हिम्मत कैसे की?’’
2009 की शुरुआत में मलाला ने ब्रिटिश ब्रौडकास्टिंग कौरपोरेशन (बीबीसी) की उर्दू भाषा की साइट पर गुमनाम रूप से ब्लौग लिखना शुरू किया. उस ने तालिबान शासन के तहत स्वात घाटी में जीवन और स्कूल जाने की अपनी इच्छा के बारे में लिखा. ‘गुल मकाई’ नाम का उपयोग करते हुए उस ने घर पर रहने के लिए मजबूर होने का वर्णन किया और उस ने तालिबान के इरादों पर सवाल उठाया.
मलाला 11 साल की थी जब उस ने अपनी पहली बीबीसी डायरी लिखी थी. ब्लौग शीर्षक ‘मुझे डर लग रहा है’ के अंतर्गत उस ने अपनी खूबसूरत स्वात घाटी में एक पूर्ण युद्ध के डर और तालिबान के कारण स्कूल जाने से डरने के अपने बुरे सपनों का वर्णन किया.
मलाला ने स्कूल जाने के अपने अधिकार के लिए अपना सार्वजनिक अभियान जारी रखा. उस की आवाज और तेज होती गई और 2011 में अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए उस का नामांकन हुआ. उसी वर्ष उसे पाकिस्तान के राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
9 अक्तूबर, 2012 की सुबह 15 वर्षीय मलाला यूसुफजई को तालिबान ने गोली मार दी. गोली लगने के बाद उस की अविश्वसनीय रिकवरी और स्कूल में वापसी के परिणामस्वरूप मलाला के लिए दुनियाभर से समर्थन की बाढ़ आ गई.
12 जुलाई, 2013 को अपने 16वें जन्मदिन पर मलाला ने न्यूयौर्क का दौरा किया और संयुक्त राष्ट्र में भाषण दिया. उसी वर्ष बाद में उस ने अपनी पहली पुस्तक ‘एक आत्मकथा’ प्रकाशित की जिस का शीर्षक था ‘आई एम मलाला: द गर्ल हू स्टुड अप फौर ऐजुकेशन ऐंड वाज शौट बाय द तालिबान’.
10 अक्तूबर, 2013 को उस के काम की सराहना करते हुए यूरोपीय संसद ने मलाला को विचार की स्वतंत्रता के लिए प्रतिष्ठित सखारोव पुरस्कार से सम्मानित किया. बाद में उस ने अपने पिता के साथ मलाला फंड की सहस्थापना की. अक्तूबर, 2014 में मलाला को भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी के साथ नोबेल शांति पुरस्कार विजेता घोषित किया गया. 17 साल की उम्र में वे यह पुरस्कार पाने वाली सब से कम उम्र की व्यक्ति बन गईं.
जाहिर है मलाला ने हिम्मत दिखाई, अपने पढ़ने के फैसले पर डटी रहीं, अपनी जिंदगी के फैसले खुद लिए और सब के लिए एक प्रेरणा बन गईं.
मलाला यूसुफजई के शब्दों में, ‘‘हमें अपनी आवाज का महत्त्व तभी पता चलता है जब उसे दबा दिया जाता है.’’
उर्फी जावेद ने भी खुद लिए जिंदगी के फैसले कुछ ऐसे ही उर्फी जावेद ने भी अपनी जिंदगी की कमान अपने हाथों में ली. अपने फैसलों के लिए उसे अपने पिता समेत पूरे समाज से लड़ना पड़ा लेकिन जो उसे दिल कहता उसे ही करती गई. उर्फी को भले ही बहुत से लोग नकारात्मक नजरिए से देखते हैं मगर यदि उस की जिंदगी को सही तरीके से देखा जाए तो वह शुरू से ही फोकस थी कि उसे क्या करना है. उस ने अपनी जिंदगी को जीने का निर्णय खुद लिया. आज जब वह सफल हो गई तो सब का मुंह बंद कर दिया.
वैसे ऊर्फी जावेद का नाम आते ही लोग ऊटपटांग ड्रैस पहनने वाली लड़की को याद करते हैं. लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि उर्फी सोशल मीडिया का एक जानामाना नाम है. वह अकसर अपनी ड्रैस और बेबाक बयान की वजह से चर्चा में बनी रहती है.
एक बार फिर से उर्फी चर्चा का विषय बनी हुई है. इस बार की वजह उस की ड्रैसिंग सैंस नहीं बल्कि उस की जिंदगी पर आधारित सीरीज ‘फौलो कर लो यार’ है. यह सीरीज ओटीटी प्लेटफौर्म 23 अगस्त से नैटफ्लिक्स पर आ चुकी है. इस में कई सैलिब्रिटीज के साथसाथ उर्फी जावेद के परिवार को भी उन के बारे में खट्टेमीठे किस्से बताते हुए देखा जा सकता है.
उर्फी के पिता बहुत ही रूढि़वादी थे और जब उर्फी अपने मन की करती तो वे उसे मारते थे. अपने दर्दनाक बचपन के बारे में खुल कर बात करते हुए एक इंटरव्यू में उर्फी जावेद ने बताया था कि एक बार उन के पिता ने उसे इतना मारा कि वह बेहोश हो गई थी. उसे 17 साल की उम्र में अपना शहर लखनऊ छोड़ना पड़ा था. दरअसल, लखनऊ जैसी छोटी जगह में अपना पैशन पूरा करने के लिए निकलती थी तो लोग बहुत टोकाटाकी करते थे. तब उसे लगा कि वह जैसा जीवन जीना चाहती है वैसा इस संकीर्ण समाज में नहीं जी पाएगी.
एक बार वह अपनी जिंदगी और उस में आने वाली परेशानियों से इतना परेशान हो गई थी कि उस के दिमाग में सुसाइड के खयाल आने लगे थे. उर्फी जावेद ऐन मौके पर रुक गई थी और फिर उस ने फैसला कर लिया था कि वह कभी अपनी दिक्कतों के आगे झुकेगी नहीं बल्कि जीवन में अपना संघर्ष जारी रखेगी.
उर्फी लखनऊ छोड़ कर और दिल्ली आ गई. पैसों के लिए ट्यूशन की और एक कौल सैंटर में भी काम किया जिस के बाद वह मुंबई चली गई. मुंबई में उस के पास पैसे नहीं थे जिस की वजह से छोटी जौब करनी पड़ी, औडिशन और इंटरव्यू देने पड़े लेकिन इस के बाद भी उस की दाल नहीं गली. बिग बौस ओटीटी से भी जब उर्फी 1 हफ्ते में आउट हो गई तो उस ने फैसला किया कि वह अपने कपड़ों को ले कर ऐक्सपैरिमैंट करेगी क्योंकि उसे यही सब पसंद है. उस के सपने बड़े थे.
ब्रैंडैड कपड़ों का शौक
उर्फी को ब्रैंडैड कपड़ों का शौक था. महंगी कारों का शौक था. उस ने अपनी टीम बनाई और यह काम शुरू किया. अपने हिसाब से कपड़ों को डिजाइन करना और पहन कर निकलना शुरू किया. लोग उसे जानने लगे. कुछ को उस की फैशन सैंस बुरी और अजीब लगी मगर ज्यादातर लोगों ने उस की काबीलियत का लोहा माना. लोग उस की नकल कर के कपड़े पहनने लगे. इस तरह उसे एक अलग पहचान मिली. उर्फी का कैरियर उटपटांग कपड़ों पर ही चलता है. अजीबोगरीब कपड़े पहन कर वह फेमस हो गई.
दूसरे ब्रैंड भी उस से अपनी ब्रैंडिंग करा रहे हैं. इसी से वह कमाई कर रही है. आज वह इतनी सफल हो गई है कि अपनी बहनों का भी कैरियर बना दिया और परिवार को भी सपोर्ट करती है. आज उर्फी अतरंगी फैशन आइकौन बन चुकी है और अबूजानी संदीप खोसला और राहुल मिश्रा जैसे बड़े डिजाइनर्स के कपड़ों में मौडलिंग करती हैं.
अल एनोन ने सही कहा था कि यदि आप को दरवाजे की चटाई बनना पसंद नहीं है तो फर्श से उठ जाइए. अपने वजूद को स्थापित करने और अलग पहचान बनाने के लिए जिंदगी को अपने हिसाब से जीना जरूरी है. अपने फैसले ले कर अपने कैरियर पर फोकस करना जरूरी है. दिल की सुन कर अपनी मरजी चलानी जरूरी है.
अच्छी महिला होने का तमगा
बहुत सी बातें महिलाओं की गतिशीलता, स्वतंत्रता और यौनिकता को प्रभावित करती हैं. समाज में ‘अच्छे घर की औरतें’ ऐसा नहीं करती हैं, बाहर नहीं जाती हैं, बाहर नहीं दिखती हैं, उन के घर में ऐसा नहीं होता है जैसे कथनों के द्वारा उन्हें रोका जाता है. एक मां, बेटी, पत्नी के रूप में उन से इस व्यवहार की उम्मीद की जाती है. घर की मर्यादा को बढ़ाने का भार उन पर लाद कर उसे घर में भी कैद कर दिया जाता है.
दुनियाभर में करीब 240 करोड़ महिलाएं, पुरुषों के समान अधिकारों से वंचित हैं. अनुमान है कि उन के बीच के इस अंतराल को भरने में अभी 50 साल और लगेंगे.
यह सही है कि आज अतीत के मुकाबले कहीं ज्यादा बच्चियां शिक्षा ले रही हैं. इसी तरह बालविवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा और खतना जैसी सामाजिक कुरीतियों में कमी आई है. महिला स्वास्थ्य की दिशा में प्रगति हुई है जिस की वजह से महिलाओं की औसत उम्र में इजाफा हुआ है.
अब पहले से कहीं ज्यादा महिलाएं संसद तक पहुंच रही हैं. भारत जैसे देशों में तो वे देश का प्रतिनिधित्व भी कर रही हैं. बड़ी संख्या में लोग महिलाओं के खिलाफ होती हिंसा के खिलाफ सामने आ रहे हैं. महिला श्रमिकों के अधिकारों में बढ़ोतरी हुई है. लेकिन इस के बावजूद महिलाओं और पुरुषों के बीच जो असमानता की खाई है वह अभी भी काफी गहरी है जिसे भरने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना होगा और वह चुनौतियों से भरा होगा. भले ही हम ने विकास के कितने ही पायदान चढ़ लिए हों लेकिन आज भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा नहीं मिला है.
वे आज भी रोजगार, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित कई क्षेत्रों में पुरुषों से पीछे हैं. दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक दिला पाने की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा हो.
एक रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा पर बहुत कम निवेश किया जाता है. इसी तरह रोजगार में उन के पास पुरुषों से कम मौके उपलब्ध होते हैं. यदि मौका मिल भी जाए तो उन्हें.
पुरुषों से कम वेतन दिया जाता है. आंकड़ों के अनुसार 24.5 करोड़ से ज्यादा महिलाएं या युवतियां हर साल शारीरिक और यौन हिंसा का शिकार बनती हैं.
गहरी है असमानता की खाई
आंकड़ों की मानें तो दुनिया में आज भी केवल काम करने योग्य आयु की केवल 61.8 फीसदी महिलाएं श्रम बल का हिस्सा हैं. यह आंकड़ा पिछले 3 दशकों में नहीं बदला है वहीं पुरुषों की बात करें तो 90 फीसदी काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं पारिवारिक जिम्मेदारियां और बिना वेतन के घंटों किया जाने वाला काम उन के पुरुषों की तरह श्रम बल में शामिल होने की क्षमता को बाधित करता है. उन्हें अभी भी पुरुषों से कमतर आंका जाता है.
लैंगिक भूमिका और पितृसत्तात्मक परिवार
अकसर मातापिता अपने बच्चों को समानता का पाठ तो पढ़ाते हैं पर उस समानता को उन के जीवन में उतारने में कहीं न कहीं चूक जाते हैं. व्यावहारिक जीवन में लगभग हर घर में वही पितृसत्तात्मक सोच हावी है. बच्चे का वातावरण ही उस के मस्तिष्क के विकास को आकार देता है. बचपन में सीखी और सम?ा बातें ही उसे जीवनभर याद रहती हैं और वह उसी तरह का व्यवहार करता है. जरूरी है कि हम बच्चों में उन के लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा न कर के उन की इच्छा के अनुसार कामों का बंटवारा करें.
मां कामकाजी हो या न हो लेकिन ज्यादातर घरों में रसोई की पूरी जिम्मेदारी उसी की होती है. एक बच्चा या बच्ची जन्म से अपनी मां या दादी को घरेलू कामों में उल?ा हुआ देखती है. इसी के अनुसार वह अपने मन में समाज के प्रति अपना योगदान निर्धारित कर लेती है. लड़कियों को मांबाप यही सिखाते आए हैं कि वे पराया धन हैं और उन्हें दूसरे के घर जा कर अपना जीवन बिताना है इसलिए उन में सहन और सम?ाता करने का गुण होना चाहिए.
यदि कोई बड़ा या घर का सदस्य एक गिलास पानी मांगे तो वह एक गिलास पानी देने की उम्मीद घर की लड़कियों से ही की जाती है. यदि किसी भी स्तर पर कोई भी सम?ाता करना हो तो उस सम?ाते की उम्मीद लड़कियों से ही की जाती है. उन्हें पढ़ाया तो जाता है लेकिन पढ़ाई का क्षेत्र बीएड, मैडिकल और सामान्य परीक्षाओं की तैयारी तक ही सीमित रहता है. नौकरी करने की अनुमति तो होती है लेकिन टीचिंग और बैंकिंग सैक्टर में ही ताकि नौकरी करने के साथसाथ वे घर की जिम्मेदारी भी अच्छी तरीके से निभा सके.
विडंबना नहीं तो और क्या
ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवारों में मातापिता अपनी लड़कियों को सपने देखना बाद में और उन की हद पहले बताते हैं. यूनिसेफ की ही एक और रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों और लड़कों के बीच भेदभाव जैसेजैसे बढ़ता जाता है इस का असर न केवल उन के बचपन में दिखता है बल्कि वयस्कता तक आतेआते इस का स्वरूप और व्यापक हो जाता है.
जिस भी रिश्ते से औरत जुड़ी है उस रिश्ते को महिमामंडित किया जाता है. औरत की हर रिश्ते में एक खास छवि बना दी गई है- बेटी के रूप में, बहन, पत्नी, मां और सास के रूप में. इस सब में ‘देवी,’ ‘सम्मान,’ ‘पवित्रता’ जैसे शब्द डाल कर औरत की ऐसी छवि तैयार कर दी गई है कि जबजब भी इस छवि से बाहर निकलने की औरत ने कोशिश की है उस की ओर उंगली उठ गई है. आक्षेप लगाए गए हैं.
यह छवि खुद औरत पर इस कदर हावी है कि वह निरंतर हाथपैर समेट कर बनाए गए फ्रेम के अंदर कैद रहने की कोशिश करती रहती है. इस के बाहर भी उस की पहचान बन सकती है यह खुद वह नहीं जान पाती. विडंबना यह है कि इस छवि की कैद औरत को कैद नहीं लगती क्योंकि पुरुष लगातार उसे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करता रहा है. उसे देवी होने का एहसास दिलाता है पर वास्तव में उसे महज एक कैदी मानता है.
खुद लें जिंदगी से जुड़े फैसले
जिंदगी के छोटे फैसले हों या बड़े उन्हें खुद लीजिए. बात शौपिंग की हो, कैरियर चौइस की हो या ट्रैवल प्लान की, जौब की हो या रिश्तेदारी निभाने की, फ्यूचर प्लान की हों या इनवैस्टमैंट का फैसला लेने की सब में महिलाओं और युवतियों को अपनी बात रखनी चाहिए और अपने डिसीजन खुद लेने चाहिए.
कैरियर डिसीजन
कालेज टाइम में किसी ने इंटर कर लिया है फिर आगे उस की चौइस की पढ़ाई से पेरैंट्स सिर्फ इसलिए नहीं रोक सकते कि जहां पढ़ने जाना है वह जगह दूर है. अगर आप अभी उन की बात सुनेंगी तो अपनी कैरियर चौइस से पीछे रह जाएंगी. वह नहीं कर पाएंगी जो आप वास्तव में करना चाहती थीं. कैरियर ग्रोथ में भी अपने डिसीजन होने चाहिए क्योंकि आप को पूरी लाइफ अपने बल पर अपने हिसाब से बितानी है न कि किसी और के डिसीजन के हिसाब से. नौकरी या बिजनैस के मामलों में भी केवल अपनी सुनें.
फैशन चौइस
फैशन चौइस में हमेशा याद रखें कि नो बौडी कैन रूल यू कि आप को क्या पहनना है और क्या नहीं पहनना है. जिस में आप कंफर्टेबल हों, जिस में आप को लगता है कि आप स्टाइलिश और कौन्फिडैंट लगती हों वही पहनें. फैस्टिव में कपड़े आने हैं तो जो पापा ले आएंगे उन्हें पहन लेंगे वाली सोच सही नहीं. आप वह खरीदो जो आप के स्टाइल को शूट करता हो. कितनी सारी सैलिब्रिटीज ऐसी हैं जो अपने स्टाइल के लिए जानी जाती हैं और स्टाइल आइकौन कहलाती हैं. मसलन दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्या राय, कैटरीना कैफ, सोनम कपूर वगैरह. आप 48 साल की ऐश्वर्या को ही लें.
कांस फिल्म फैस्टिवल में जब ऐश रैड कार्पेट पर चलती हैं तो सच पूछिए उन की खूबसूरती, स्टाइल के आगे अधिकतर हौलीवुड ऐक्ट्रैसेज की पावर भी फीकी पड़ जाती है. इन का स्टाइल सब को दीवाना बना देता है.
वैसे ही आप अपने कालेज या औफिस की स्टाइल आइकौन बन सकती हैं. यह पहचान भी जरूरी है. इस से कौन्फिडैंस बढ़ता है.
इनवैस्टमैंट प्लान
इनवैस्टमैंट के बारे में अधिक से अधिक जानने और सम?ाने का प्रयास करें. खुद बैंक जाएं, खुद हर तरह की कागजी कार्यवाही करें. अपने नाम पर घर और प्लाट खरीदें. सारे डाक्यूमैंट्स खुद संभाल कर रखें. खुद लौयर या इनवैस्टर आदि से मिलें. आप खुद इंटरैस्ट लेंगी तभी आगे सबकुछ अपने हिसाब से कर सकेंगी. इस में जरा भी हिचकिचाएं नहीं.
ट्रिप प्लान: स्कूलकालेज के दौरान भी अगर कहीं ट्रिप पर जाना है तो प्लान लड़के बनाएंगे और लड़कियां बस साथ जाएंगी, ऐसी सोच न रखें. आप अपने हिसाब से और अपनी पसंद से जगह का चयन करें. क्या करना है, कहां ठहरना है, कहांकहां जाना है, क्या और्डर करना है, कहां से खाना मंगाना है, कैसे रिजर्वेशन कराना है, जैसी बातों के लिए लड़कों का मुंह न ताकें. खुद इनिशिएटिव लें. खुद सबकुछ डिसाइड करें. शुरू से यह आदत रहेगी तो आगे जा कर आप की जिंदगी बहुत सरल हो जाएगी और आप का आत्मविश्वास बढ़ेगा. शादी के बाद भी फिर आप हर फैसले के लिए पति पर निर्भर नहीं रहेंगी.
अब समय आ गया है जब युवतियां और स्त्रियां अपने वजूद को पहचानें. पुरुषों के हाथों की कठपुतली बनने के बजाय खुद की जिंदगी की कमान अपने हाथों में लें. अपने हिसाब से जीएं. अपने फैसले लें और उन फैसलों पर डटी रहें. तभी जिंदगी का एक नया विहान सामने आएगा. वे न सिर्फ खुल कर जी पाएंगी बल्कि हकीकत में पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर आगे भी बढ़ पाएंगी.