लेखिका- रोचिका अरुण शर्मा
गत दिसंबर माह में एक अखबार में खबर छपी कि मुंबई के एक नामी इंटरनैशनल विद्यालय के 13-14 साल के कुछ छात्रों के चैट किसी अभिभावक ने पढ़े तो उन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. यह बात उन्होंने विद्यालय के प्रधानाचार्य तक पहुंचाई और अखबार ने मीडिया तक. वैसे तो यह वीडियो उतना ज्यादा फौरवर्ड न हो सका, क्योंकि मामला नामी स्कूल का था तो हो सकता है किसी तरह दबा दिया गया हो. इतनी बात भी आगे इसलिए पहुंच सकी, क्योंकि सैलिब्रिटीज के बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं और इन में से ही एक सैलिब्रिटी की मां ने चैट देख कर मामला प्रधानाचार्य तक पहुंचाया.
बात कुछ इस तरह से थी कि कक्षा 7-8 के विद्यार्थी जिन के पास अपने पर्सनल फोन भी हैं उन के सामूहिक चैट में बेहद चौंकाने वाले शब्दों समेत चौंकाने वाली बातें की गई थी. इन छात्रों ने अपनी सहपाठी लड़कियों को अपनी मापतोल के हिसाब से कुछ रेटिंग दी. किसी सैलिब्रिटीज की बेटी के लिए जब रेटिंग तय की जा रही थी तो छात्रों ने यह भी कहा कि शी इज टू फ्लैट और उस रेटिंग के हिसाब से सब से अच्छी लड़की का बलात्कार किस तरह करेंगे, यह भी तय किया गया. सिर्फ बलात्कार ही नहीं अपितु किस तरह से इस कुकृत्य के लिए रौड का इस्तेमाल किया जाएगा, यह भी डिस्कस किया गया. सामूहिक बलात्कार का नाम उन्होंने ‘गैंगबैंग’ दिया. ये छात्र ‘वन नाइट स्टैंड’ के बारे में बात करते हैं. किस छात्रा के साथ वन नाइट स्टैंड करना है बताते हैं. वे छात्राओं के प्राइवेट पार्ट्स और बौडी कौंटूर यानि रूपरेखा के बारे में बात करते हैं.
इस के बाद भी प्रिंसिपल ने कोई बड़ा ऐक्शन नहीं लिया, बस छात्रों को मामूली सजा दी गई और लड़कियों को निर्देश दिए गए कि अंगदिखाऊ कपड़े न पहना करें. इस पर उन की मांएं गुस्सा हो गईं और मामला मीडिया तक पहुंच गया.
वीडियो पर लोगों की राय
जब यह वीडियो व्हाट्सऐप पर देखा गया तो जितने मुंह उतनी बातें. कुछ लोगों ने बड़ा ही आश्चर्य जताया कि इतने बड़े रुतबे वाले लोगों के बच्चे ऐसे? ये कामवालियों और आयाओं के भरोसे पले बच्चे हैं. मातापिता ने बस पैदा कर के छोड़ दिया है.
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कुछ लोगों का कहना था कि यह बड़े ही शर्म की बात है कि लड़कों की गलती की सजा लड़कियों को दी जा रही है कि वे ढंग के कपड़े पहनें.
वहीं कुछ लोगों ने कहा कि इस कच्ची उम्र में स्मार्ट फोन और इंटरनैट के इस्तेमाल से बच्चे न जाने क्याक्या सीख लेते हैं और उस का बुरा असर उन की मानसिकता पर पड़ता है.
मनोचिकित्सक दीपक रहेजा कहते हैं, ‘‘ऐसा कहने और करने वाले छात्र सोचते हैं कि वे मैचो मैन हैं, वे बड़े हो गए हैं. बच्चे अनुशासित नहीं हुए हैं. बच्चे जिस तरह से सैक्स की बातें स्कूल में कर रहे हैं यह चिंता का विषय है. पेरैंटिंग के मानदंड बदल चुके हैं. इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. हम अपनेआप को मौडर्न समझ रहे हैं, किंतु ये बातें स्कूल, पासपड़ोस में हो रही हैं तो अब समय बेटों और बेटियों को समझाने का है.’’?
अमीरी या इंटरनैट का दोष नहीं
क्या गांवों में इस तरह की बातें नहीं होती हैं? समस्या इंटरनैटजनित नहीं है. समस्या है कि लड़कियों को सैक्स औब्जैक्ट मान लिया गया है. यहां बात अमीर और गरीब परिवारों की नहीं है. निर्भया बलात्कार कांड में बलात्कारी अमीर नहीं थे और न ही डाक्टर प्रियंका रैड्डी के बलात्कारी अमीर थे. समस्या यह है कि स्त्री को सदियों से भोग की वस्तु माना जा रहा है. वह पुरुष पर ही आश्रित रहती आई है.
इस विषय पर जब कुछ महिलाओं से बात की गई जिन में कुछ महिलाएं ग्रामीण इलाकों से भी ताल्लुक रखती थीं तो कुछ नए केस सामने आए:
– एक महिला जो अब 40 साल की उम्र की है बताया कि वह मात्र दूसरी कक्षा में थी, उस का परिवार एक संयुक्त परिवार था. उस की मां को जब कहीं बाहर जाना होता तो बच्चों को उन के दादाजी के भरोसे छोड़ जाती. मौका पा कर दादाजी उस के कपड़ों में हाथ डाला करते. वह कुछ समझ नहीं पाती थी. फिर कभीकभी उस का बड़ा भाई जो उस समय 7 या 8वीं में रहा होगा वह भी उस के कपड़ों में हाथ डालने लगा. उसे ये सब अच्छा नहीं लगता था. वह अपने भाई से कहती भी थी कि मुझे अच्छा नहीं लगता पर कोई उस की सुनने वाला नहीं था. एक दिन उस के भाई ने यही हरकत बड़ी बहन के साथ कर दी. तब बड़ी बहन ने अपने पिता को बताया और घर वाले यह सब सुन कर हैरान रह गए.
– ऐसा ही केस करीब 27 वर्ष पुराना है जब एक मां ने अपनी बेटी को पढ़ने के लिए दूसरे शहर में अपनी बहन के पास भेजा और वह भी नौकरी करती थी. एक दिन बहन जब किसी कारण से जल्दी घर पहुंच गई तो देखा उस के पति और भानजी संदिग्ध अवस्था में थे. यह मौसा और भानजी के बीच का केस है. कालेज में पढ़ने वाली लड़की और विवाहित मौसा, सोच कर ही आश्चर्य होता है. किंतु यह सत्य है घर में रहने वाली लड़की को उस मौसा ने भोग की वस्तु समझा और अपनी पत्नी की गैरमौजूदगी में उस का भोग भी किया.
– एक महिला अपने आसपास की घटना बताते हुए कहती है कि उस के एक पड़ोसी का बेटा किसी कारणवश बच्चे पैदा करने में असक्षम था. सास ने पहले ससुर और बहू के संबंध बनवाए ताकि घर को एक वारिस मिल जाए. उस के बाद बहू को ससुर से दूर रहने की हिदायत दे दी गई. मामला तब सामने आया जब बहू हर बात में सास की अवमानना कर ससुर की सपोर्ट लेने लगी. सास को यह बात जमी नहीं और फिर ससुरबहू की पोलपट्टी खोल दी.
– 45 वर्षीय एक महिला का कहना है कि उस के यहां रिश्तेदारों का अकसर आनाजाना लगा रहता था. उस की मां नौकरी करती थी. मां की गैरमौजूदगी में उस के एक रिश्तेदार जोकि पिता की उम्र के थे उस से शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करते थे. एक दिन वह बहुत डर गई और कुछ कह न पाई तो वे बोले कि अच्छा पहले मोमबत्ती इस्तेमाल कर के देख लो. आज भी वह उस घटना को याद कर के खीज उठती है और अपने स्त्री होने पर दुखी होती है.
– 50 वर्षीय एक महिला का कहना है कि उस के एक मामा ने जब वह मात्र चौथी कक्षा में थी तो उस से शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की. उस की मां ने देख भी लिया, किंतु कोई ऐक्शन नहीं लिया, क्योंकि परिवार की इज्जत का सवाल था. यही कोशिश मामा ने दोबारा की जब वह 10वीं कक्षा में थी. उस महिला ने अपनी मां को इस बारे में बताया, किंतु तब भी कोई ऐक्शन नहीं लिया गया. तीसरी बार उस के मामा ने फिर कोशिश की जब वह कालेज में थी और मामा भी विवाहित था. तब तक वह सयानी हो चुकी थी और उस ने मामा को लताड़ा. तब मामा ने परिवार की इज्जत और घर में कलेश होने का वास्ता देते हुए कहा कि किसी को न बताना.
साफ समझ में आता है कि मामा उसे भोग की वस्तु समझ भोगना तो चाहता ही?था और साथ ही यह भी चाहता था कि बात दबी रहे. उस की मां भी रिश्ते निभाने में भरोसा रखती थी, किंतु अपनी बेटी के प्रति कैजुअल थी. एक मां यदि अपनी बेटी के मर्म को न समझे तो फिर इस समाज में स्त्री तो भोग्या ही रहेगी.
– ऐसा ही एक केस 50 वर्षीय महिला ने बताया कि जब वह 8वीं कक्षा में थी, तो स्कूल की तरफ से पिकनिक में गई थी, उस के अध्यापक ने उसे बस में अपनी गोद में बैठा लिया और फिर सब से नजर बचा कर उस के अंगों से छेड़छाड़ करता रहा. जब उस ने घर आ कर अपनी मां को बताया कि वह अध्यापक की गोद में बैठी थी तो मां को समझते देर न लगी. किंतु मां ने उसे समझा दिया कि किसी को न कहना वरना इज्जत खराब होगी और पिता को मालूम हुआ तो वे स्कूल जा कर झगड़ा न कर बैठे.
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यहां मैं ने सभी मामले 40 पार की महिलाओं के लिए है ताकि यह समझा जा सके कि उस जमाने में इंटरनैट नहीं था, न ही महिलाएं आज जितने अंगदिखाऊ कपड़े पहनती थीं. यहां तक कि स्कूलों में भी सलवारकुरता और दुपट्टा की यूनिफौर्म होती थी. स्कूल भी कोएड कम ही होते थे. लेकिन इस तरह की छेड़छाड़ घर में रह रहे परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों द्वारा की जाती थी या फिर जहां कहीं भी लड़की जाए वहां आसपास के लोंगों द्वारा. मैं कहूंगी मौलेस्टर या रैपिस्ट घर के सदस्य या नजदीकी पहचान वाले ही होते थे.
चूंकि अब महिलाएं बाहर निकलने लगी है तो घर के बाहर भी उन के साथ ऐसे हादसे होने लगे और मीडिया उन्हें दिखाने लगा तो लोगों की नजर इन हादसों पर पड़ने लगी.
धार्मिक ग्रंथों में नारी
बात करें धार्मिक ग्रंथों की तो महाभारत में द्रौपदी के 5 पति थे. जबकि यदि स्त्री अपनी मरजी से 5 पति बना ले तो वह कुलटा और कलंकिनी बता दी जाती है. फिर धर्मराज युधिष्ठिर ने जुए में अपनी पत्नी को दांव पर लगा दिया और उसे हार गए. दुशाशन ने उस का चीर हरण किया. ये सभी घटनाएं दर्शाती हैं कि स्त्री उस समय भी भोग्य ही थी. हालांकि उस समय भी युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को जुए में दांव पर लगाना और फिर उसे हार जाना, फिर दुशाशन द्वारा चीरहरण गलत ही ठहराया गया पर स्त्री भोग्या तब भी थी, इस तरह की घटनाएं तब भी होती थीं.
सीता का उस जमाने में रावण द्वारा अपहरण करना भी इसी तरह का उदाहरण है. रावण भी तो परस्त्री का भोग करना चाहता था, जबकि सीता इस के लिए राजी न हुई. सीता को इस के लिए देवी माना गया और रावण को राक्षस यानि कि उस जमाने में भी स्त्री यदि परपुरुष के साथ संबंध रखे तो कलंकिनी और कुलक्षिणी अन्यथा देवी. किंतु पुरुष 3 रानियां रख सकते थे जोकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पिता दशरथ ने रची थीं. राम को मर्यादा पुरुषोत्तम माना गया, क्योंकि उन्होंने एक पत्नी व्रत का पालन किया.
हो सकता है अन्य धर्मों के ग्रंथों में भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाएं, क्योंकि मुझे इन की जानकारी है सो यहां इन का जिक्र किया.
इतिहास में भी नारी भोग्या
अब यदि इतिहास खंगाला जाए तो रानी पद्मावती ने जौहर किया था. इस के पीछे कारण यही थे कि अल्लाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती को अपने हरम में शामिल करना चाहता था इसलिए उस ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया. इस युद्ध में राव रतन सिंह मारे गए और तत्पश्चात रानी समेत हजारो दासियों ने जौहर किया, क्योंकि वे भलीभांति समझती थीं कि खिलजी के पास जा कर वे मात्र एक भोग्या बन कर रह जाएंगी और यह उसे मंजूर नहीं था. इसीलिए आज भी रानी पद्मावती का नाम वीरांगना के रूप में लिया जाता है.
इसी प्रकार जब ब्रिटिशर्स झांसी के महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी लक्ष्मी बाई से झांसी हड़प लेना चाहते थे तो रानी ने इन का डट कर मुकाबला किया और कहा कि मैं अपनी झांसी हरगिज न दूंगी. यहां भी जाहिर है स्त्री को कमजोर समझ उस पर आक्रमण किया गया. जब तक राजा रहे ब्रिटिशर्स उन के मित्र रहे. निश्चित रूप से यदि रानी लक्ष्मीबाई मुकाबला न करती और घुटने टेक देती तो यह ब्रिटिशर्स की दासी बन कर रहती.
नारी की आज स्थिति
विलियम डैलीरिंयल की नई पुस्तक ‘अनार्की’ जो ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत आने के समय पर इतिहास को समेटती है. हर सेना के आम लोगों की औरतों के बलात्कारों के किस्सों से भरी है और इन में ब्रिटिश सैनिक भी शामिल हैं.
आज भी विवाह बाद पुरुष घर का मुखिया होता है. अच्छी बात है कि वह घर का मुखिया है, किंतु स्त्री को समान हक नहीं मिलता है. उसे तो पुरुष की अनुगामिनी ही बनना होता है. अन्यथा बिगड़ैल, चरित्रहीन बहू या पत्नी का खिताब दे दिया जाता है. स्त्री का विवाह होते ही उस का सरनेम और गोत्र बदल जाता है. उसे सभी धार्मिक आयोजनों में ससुराल के नियमों का पालन करना होता है.
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यहां तक कि नौकरीपेशा महिलाएं दोहरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं. वे रुपए कमा कर तो लाती ही हैं, उस के बाद भी परिवार के हर सदस्य की जिम्मेदारी तो उसी पर डाल दी जाती है. वहां मैं एक बात और कहना चाहूंगी कि अपने पति के बराबर कमाने वाली महिला भी अपने पति की अनुमति और पसंदनापसंद का खयाल रखना अपना फर्ज समझती है. उसे पतिव्रता कहलाना अच्छा लगता है. इस मानसिकता के पीछे यही कारण है कि वह अपने घरों में ऐसे ही माहौल में पलीबढ़ी है. हर धार्मिक आयोजन में उसे पति, भाई, पिता पर आश्रित रख कर उस का स्थान पीछे ही रखा गया है.
यदि बात करें जायदाद में हिस्से की तो उस में भी बेटों का ही मुख्य स्थान है. आजकल कानून तो बन गए कि बेटियों का भी जायदाद में हक है, किंतु उन्हें खुशी से यह हक दिया नहीं जाता है. यदि वे अपने हक की मांग करें तो भाई और मातापिता उन्हें यह हक देने से कतराते हैं और नाराज भी होते हैं. कुल मिला कर मायके से उन के संबंध सदा के लिए खराब हो जाते हैं.
एक और बहुत ही अहम और जरूरी बात यह है कि जब महिलाओं के साथ बलात्कार होते हैं तो अकसर दोष उन का ही दिखाया जाता है. डा. प्रियंका रेड्डी बलात्कार केस में भी यही हुआ. उन की हत्या के बाद यह सुनने में आया कि जब वे दूर गई थीं तो घर क्यों फोन किया पुलिस को क्यों नहीं?
दोष भी अकसर महिलाओं द्वारा दिया जाता है. यदि महिला अपने पुरुष सहकर्मी के साथ मेलजोल बढ़ाती है तो भी उसे भोग की वस्तु समझ लिया जाता है. यह कोई सोच ही नहीं पाता कि जिस तरह एक महिला की सहेली महिला उन के आपसी विचार मेल खाने से बन सकती है, उसी प्रकार यदि एक महिला और पुरुष के विचार मेल खाएं तो वे भी मित्र हो सकते हैं. अकसर इस रिश्ते को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और कई बार पुरुष मित्र इस नजदीकी का फायदा भी उठा लेना चाहता है. मीटू केसेज इसी सोच का परिणाम है.
कुछ दिनों पहले ही एक नई बात पता चली. मैट्रो सिटी के पढ़ेलिखे, नौकरीपेशा मातापिता की पौश सोसायटी में रहने वाली एक 11 वर्षीय बेटी से जब यह पूछा गया कि तुम्हारे मातापिता तुम पर हाथ उठाते हैं तो उस का जवाब था कि मां तो नहीं उठातीं, किंतु पिताजी उठाते हैं.
जब पूछा कि क्यों? तो उस ने जवाब दिया कि यदि मैं मेकअप करूं तब.
तो तुम्हारी मां मेकअप नहीं करतीं? उस का जवाब था कि नहीं मेरे पिता को पसंद नहीं, इसलिए वे भी नहीं करतीं?
कहने का मतलब यह है कि 11 वर्षीय बच्ची जो सजनासंवरना चाहती है, एक औरत जो पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर घर चलाने में मदद करती है उसे सजनेसंवरने के लिए अपने पति की अनुमति की आवश्यकता है और उस के इस शौक पर उस के घर में रोक है. यहीं यदि 15 वर्ष का बेटा मातापिता को सम्मान न दे और शराब पी कर आए, टैटू बनवा आए या बाल कलर करवा ले तो मातापिता सिर पीटने के सिवा कुछ नहीं कर सकते.
नैट और गैजेट्स कहां दोषी
ऐसे में यदि बड़े रसूखदार परिवारों और स्कूलों के बच्चे इस तरह का आचरण करते हैं. सैक्स चैट करते हैं तो यह कोई नई बात नहीं है. उन्होंने अपने घरों, आसपास और आज के मीडिया की मार्फत जो देखासीखा उसी का प्रतिफल है यह चौंका देने वाली चैट. हम इंटरनैट और मोबाइल फोन या उन की अमीरी, आया और नौकरों को दोष दे कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं.
क्या हैं समाधान
– सब से पहले घरों में हरेक सदस्य को परिवार की महिलाओं के लिए उचित सम्मानजनक व्यवहार रखना होगा. यदि परिवार का मुखिया पत्नी को कमतर समझेगा तो वही आचरण बच्चे भी अपनाएंगे.
– परिवार में भाईबहन दोनों को एक सा दर्जा
दिया जाए.
– ससुराल में ननद और बहू का स्थान बराबर का हो. लड़की के मातापिता और लड़के के मातापिता का भेद खत्म किया जाए. अकसर बेटी के ससुराल में उस के पिता को जबतब कोसा जाता है, उन्हें तुच्छ दिखाने की कोशिश की जाती है, जबतब उन से माफी मंगवाई जाती है.
– यदि लड़केलड़की की सगाई होने के बाद टूट जाए तो लड़की को दोषी करार दिया जाता है और यदि विवाह उपरांत तलाक हो जाए तो भी पत्नी को ही दोषी माना जाता है. यहां यह दोष कोई अन्य नहीं देता उस के अपने मायके वाले ही देते हैं और कोसते भी हैं कि तुम ने ससुराल मे एडजस्ट नहीं किया. यहां मै कहूंगी कोई भी लड़की अपनी गृहस्थी में स्वयं आग नहीं लगाएगी. वह भी सामाजिक नियमों को समझती है. किंतु आत्मसम्मान तो उस का भी होता है.
शारीरिक रूप से पुरुष, स्त्री की अपेक्षा ज्यादा बलवान है. उस का भी पुरुष को फायदा मिलता है, किंतु यदि मानसिकता बदल दी जाए तो सुधार होने के आसार है अन्यथा इस तरह के चैट आम बात थी है और रहेगी.