यूरोप व पश्चिमी देशों में इसलामी बुरके को बैन करने की मांग जोर पकड़ रही है. यह सही है. धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि धर्म अपने अंधभक्तों को अलग किस्म की पोशाकें पहनने को मजबूर करे. हमारे देश में बुरके पर प्रतिबंध की मांग नहीं उठ रही, क्योंकि इसलाम की तरह हिंदू धर्म भी परदे में गहरा विश्वास रखता है. कट्टर हिंदुओं को तो यह भी बुरा लगता है कि आजकल लड़कियों ने चुन्नी भी छोड़ दी और जींस व टौप में खुलेआम घूम रही हैं.
बदन दिखाना जरूरी नहीं है. बदन की सुरक्षा करना हरेक का फर्ज है. आदमी भी केवल लंगोट पहने नहीं घूमते. वे फैशन या धर्म के लिए नहीं, व्यावहारिकता के लिए कमीजपैंट पहनते हैं. लड़कियां भी, चाहे फैशन की दीवानी हों, न शरीर दिखाना चाहती हैं न बोल्ड अदाएं दिखाना चाहती हैं. वे तो बंधन नहीं चाहतीं जो धर्म उन पर थोपता है, जिन की जरूरत नहीं.
मुसलिम औरतें अकसर धर्र्म के आदेश को अपनी निजी पसंद कहने लगती हैं. यह गलत है. यह छलावा है. यह खुद को धोखा देना है और दूसरों को बहकाना है. यह अंधविश्वास के कीचड़ में डूब जाने का कदम है कि कीचड़ की ठंडक से उन्हें असीम सुख मिल रहा है. बहुत गरीब ही सादगी का गुणगान करते हैं. वे जबरन अपने को बहलाते हैं. हिजाब या बुरका कोई लड़की मन से नहीं पहनती. जैसे हर सफल युवा अपनी सफलता दिखाना चाहता है, वैसे ही हर लड़की अपना सौंदर्य व व्यक्तित्व लोगों को दिखाना चाहती है. 17-18 साल की लड़की पर बुरके या परदे को लादना उस की आजादी में खलल है.
बुरका व परदा धार्मिक अत्याचार का नतीजा है. यह पुरुषों की साजिश है कि कहीं उन की औरतों को देख कर कोई उन्हें उठा न ले जाए. पर यह समस्या औरतों की नहीं, आदमियों की है. अच्छी चीज को ढक दिया जाएगा तो वह सड़ जाएगी, उस पर जाले लग जाएंगे. यही लड़कियों के साथ होता है जो अपने बदन का पूरा उपयोग अपनी बदन ढकने वाली पोशाकों के कारण नहीं कर पातीं. उन्हें इन बंधनों से आजादी मिलनी ही चाहिए.
फैशन के नाम पर अगर बदन दिखाया जाता है तो कपड़े भी तो दिखाए जाते हैं. फिल्मी फैस्टिवलों में ऐक्ट्रैस मीटरों लंबे गाउन पहनती हैं जिन्हें संभालने के लिए 2-2, 3-3 सहायिकाएं चाहिए होती हैं. यह न मूर्खता है न बंदिश. यह आजादी है. बुरका या हिजाब पहनना इस आजादी की हत्या की निशानी है. धर्म और धार्मिक समाज इस तरह हावी हो जाता है कि लड़कियां न केवल इसे पहनती हैं बल्कि इन की हमउम्र न पहनें तो ये हल्ला मचाती भी हैं. उन्हें रोकने के लिए सरकारी कानून का होना जरूरी है.