देश के सीवरों की बुरी हालत है. नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता के नाम पर हर घर में अपना शौचालय बनाने की मुहिम तो चलवा दी पर उन्होंने राज्य सरकारों, नगर निकायों और पंचायतों को सीवर डालने की जरूरत पर ध्यान देने को कुछ नहीं कहा, क्योंकि इस में अरबोंखरबों लगते हैं और सरकार को अरबोंखरबों तो सैनिक, हथियारों, बुलेट ट्रेनों और मूर्तियों पर खर्च करने हैं.  देश तब तक साफ न होगा जब तक देश भर में बड़े, विशाल सीवर न बनेंगे. 

हमारे देश में आर्यों से पहले बसने वाले सिंधुघाटी सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा, मोहन जोदाड़ो, धौलावीरा या लोथल जैसी जगहों पर जो बंद ढके नालेनालियां बनाई थीं आज भी देखी जा सकती हैं. पर आर्यों को किसी तरह शूद्र व अछूत मिल गए जिस की वजह से सीवर बनने न के बराबर हो गए.

आज देश के अधिकांश शहरों में बने सीवर आवश्यकता से कहीं कम हैं. अकसर भरे रहते हैं. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने हाल ही में आदेश दिया है कि रेस्तराओं का कचरा सीवरों में जा कर उन्हें रोके नहीं पर यह न कहने भर से रुकेगा और न ही 2-4 को पकड़ने व जुर्माना कर देने से.  सीवरों का विज्ञान आज बहुत आगे चला गया है पर हमारे ऊंचे लोग उस बारे में सोचने को भी तैयार नहीं हैं.

सीवर हर घर के लिए वरदान है, सब से बड़ा सुख है, क्योंकि इस से बदबू नहीं रहती, आसपास मच्छरमक्खी नहीं फटकते पर इस देश में करोड़ों ने तो अपने घर ही उन छोटी नदियों के किनारे बना रखे हैं, जो अब शहरी नालों में बदल गई हैं.

मुंबई में हर बरसात में जहां बहुत से सीवर अपनेआप साफ हो जाते हैं, ये नाले उफन कर पानी और कचरे को बाहर फेंक देते हैं.  हर शहर की दोतिहाई  आबादी हमारे यहां सीवर की कमी या खराबी के कारण परेशान रहती है. शौचालय बनाओ के होर्डिंगों  पर नरेंद्र मोदी की तसवीरें दिखती हैं पर सीवर डालो के होर्डिंग कहीं नहीं दिखते, क्योंकि यह महंगा  काम है.

आजकल ऐसे क्रशर आ गए हैं, जो घर के कूड़े को पीस कर पानी के साथ बहा सकते हैं और अगर हमारे शहरियों ने लगाने शुरू कर दिए तो रहेसहे सीवरों को भरने में देर न लगेगी. रेस्तराओं में तो ये लग चुके हैं, क्योंकि उन के कूड़े को हर समय फेंकने के लिए न तो लोग हैं और न ही जगह.  शहरों की शुद्धि न्यायाधिकरणों के आदेशों, नेताओं के भाषणों, यज्ञोंहवनों से नहीं, सही सीवरों से आएगी पर इस पर ध्यान दे कौन. इस गंदे काम के लिए तो मरने को तैयार एक बड़ी जनता है तो हम क्यों परेशान हों.

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