जो काम इंगलैड में टैबलायड साइज के अखबार करते हैं उसी काम में हमारे देश के हिंदी न्यूज चैनल बढ़चढ़ कर के नए पैमाने तय कर रहे हैं. झूठ, सफेद झूठ, भ्रामक झूठ, हानिकारक झूठ में इन चैनलों ने फर्क ही मिटा दिया और जैसे इंगलैंड में टैबलायड हिटलर को कभी जिंदा कर देते हैं, कभी किंग चार्ल्स की 2 और बीवियां खोज लाते हैं, हमारे चैनल क्व2 हजार के नोट में चिप्स से ले कर हर मुसलिम में कोई न कोई खामी ढूंढ़ सकते हैं और सीधीसादी जनता को बहका सकते हैं.

इन चैनलों को दोष नहीं दिया जाना चाहिए, इन के दर्शकों को दिया जाना चाहिए जिन्होंने बचपन से ही झूठ और चमत्कार की इतनी कहानियां पढ़ीसुनी हैं और इतने गलत तथ्यों को सनातन सत्य माना है कि उन के लिए ये चैनल दर्शनीय है और दूरदर्शन टाइप के बुलेटिन बोरिंग बन कर रह गए चैनल बेकार.

मामला आर्यन खान के ड्रग लेने का हो, तबलीगी जमात के कोविड फैलाने का हो, रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह के आपसी संबंधों का हो, ये चैनल बिना सही झूठ परखे कुछ भी कर सकते हैं.

इन का हाल तो यह है कि जब मोदी की पार्टी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, केरल में हार रही हो तो ये बड़ी खबर बनाते हुए घंटों त्रिपुरा की 2 सीटों की बातें करते रहेंगे कि शायद कुछ चमत्कार हो जाए जिस में समाजवादी, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस हार जाए.

यह एक तरह की वही भावना है जो हमारा हर अंधविश्वासी पाले रखता है जो पहाड़ पर बने अपने 4 मंजिले मकान को गिरते देख कर उस चमत्कार की कामना करने के लिए भगवद भजन शुरू कर देता है कि मकान 45 के कोण पर झुक जाए पर गिरे नहीं.

सरकार के बारे में कड़वे सच को छिपाने और बाकी दुनिया को छोटा, नीचा, बेईमान दिखाने के लिए हर झूठ का सहारा लेने वाले चैनलों की अपराध रिपोर्टिंग पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है और कहा है कि हर जिले का पुलिस अफसर सूचनाएं देने से पहले 4 बार सोचे. ऐसा होगा या नहीं, पता नहीं पर जो बकबकिए ऐंकर हिंदी चैनलों ने पाल रखे हैं उन पर अंकुश उन के दर्शकों की सेहत के लिए अच्छा है.

इन चैनलों के भ्रामक समाचारों के कारण बहुत से साधारण लोग गुस्से में भरे रहते हैं, कुछ अनापशनाप दवाएं खा लेते हैं, कुछ हिंसक हो जाते हैं, कुछ मायूस भी हो जाते हैं. सरकार और सुप्रीम कोर्ट इन पर स्पीड ब्रेकर लगा सकेगा, इस की गुंजाइश कम है पर कोशिश ही संतोषजनक है.

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