फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा कि फेसबुक पर हर रोज 200 करोड़ बार ‘जय श्री राम” लिखा जाता है. उस पर एक यूजर ने लिखा कि कृपया इसमें कुछ हजार और जोड़े “जय श्री राम जय श्री राम. लेकिन यह दावा गलत बताया जा रहा है, क्योंकि “जय श्री राम” लिखे जाने के संबद्ध में मार्क जकरबर्ग ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है. यह दावा सच्च है या झूठ, यह तो हम नहीं जानते. लेकिन यह बात एकदम सच है कि सोशल मीडिया पर भगवान की फोटो डालकर कहा जाता है कि अगर आपकी किस्मत अच्छी है तो आप “जय श्री राम” जरूर लिखेंगे. भगवान गणेश के सच्चे भक्त जरूर शेयर करें. 24 घंटे के अंदर आपको शुभ समाचार सुनने को मिलेगा, वरना आपके साथ अशुभ होगा. फेसबुक पर ऐसे कई पोस्ट रोजाना देखने को मिल जाती है. कुछ लोग इसे इगनोर कर देते हैं. लेकिन कुछ लोग लाइक, कमेट्स और शेयर करने से खुद को रोक नहीं पाते हैं. लेकिन जरा सोचिए, भगवान अगर हैं तो क्या आपके लाइक, कमेट्स और शेयर करने से खुश हो जाएगे, वरना आपकी किस्मत खराब कर देंगे या शुभ समाचार को अशुभ बना देंगे ? आज पूरा विश्व कोरोना से लड़ रहा है. कोरोना जैसी महामारी से बचने के लिए पूरे विश्व के वैज्ञानिक वैक्सीन ढूँढने में लगे हैं. वहीं बिहार में कोरोना मायी की पुजा होने लगी. महिलाएं झुंड के झुंड बनाकर कोरोना मायी की पुजा करने जाने लगीं. आश्चर्य तो इस बात की है कि सिर्फ अनपढ़ महिलाएं ही नहीं, बल्कि पढ़ी-लिखी महिलाएं भी इस पुजा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं. पुजा के दौरान कोई सोशल डिस्टेन्स नहीं, कोई मास्क नहीं.

रिंकी नाम की एक महिला का कहना था कि कोरोना मायी की पुजा की जानकारी उसे सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप के वीडियो के माध्यम से मिली थी. उस महिला का कहना था कि वह कोरोना मायी की पुजा घर, बच्चे, परिवार और पूरे विश्व को कोरोना की कहर से बचाने के लिए कर रही है. कोरोना मायी जल्द ही इस बीमारी से हमलोगों को निजात दिलाएँगी. एक महिला का कहना था कि कोरोना माता की पुजा के बाद हवा आएगी और वायरस को भस्म कर देगी. लोग कोरोना को बीमारी के बजाय दैवीय प्रकोप मानने लगे थे. अंधविश्वास एक ऐसा विश्वास है, जिसका कोई उचित कारण नहीं होता, फिर भी लोगों का इस पर अटूट विश्वास बन जाता है. हम बचपन से ही जिन परम्पराओं, मान्यताओं में पले-बढ़े होते हैं, आगे जाकर भी हम अक्षरश: उसी का पालन करते हैं. यह अंधविश्वास हमारे मन-मस्तिष्क में इतना गहरा समा जाता है कि हम जीवन भर उससे बाहर नहीं निकल पाते हैं. अंधविश्वास अधिकतर कमजोर व्यक्तित्व, कमजोर मनोविज्ञान व कमजोर मानसिकता वाले लोगों में देखने को मिलता है. जीवन में असफल रहे लोग ही अंधविश्वास पर विश्वास रखने लगते हैं. उन्हें लगता है ऐसा करने से शायद वे जीवन में सफल हो जाएंगे.

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अंधविश्वास केवल अनपढ़ और मध्यम या निम्न वर्ग के लोगों में ही नहीं होता, बल्कि यह काफी शिक्षित, उच्च वर्ग के लोगों में भी देखने को मिलती है. आजकल ज्योतिष को विज्ञान भी कहा जाने लगा है. लेकिन अधिकतर ज्योतिष द्वारा बताई गयी बातें झूठ ही निकलती है. भूत-प्रेत में विश्वास रखना एक बहुत बड़ा अंधविश्वास ही है. आमतौर पर लोग भूत-प्रेत से मिलने या देखने की बात करते हैं. ये सिर्फ लोगों को भरमाते हैं. उसी तरह मासिक धर्म के दौरान महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित एंव पुजा करना, धूप-दीप जलाना मना होता है क्योंकि यह माना गया है कि उस समय महिला अपवित्र होती है. जबकि यह एक अंधविश्वास के सिवा और कुछ नहीं है. बहुत से लोग मंगल और शनिवार के दिन बाल-दाढ़ी नहीं बनवाते, हाथ का नाखून भी नहीं काटते, क्योंकि यह हनुमान जी का दिन होता है. वहीं महिलाएं गुरुवार के दिन बाल नहीं धोती, क्योंकि यह गुरुभगवान का दिन होता है. यह सिर्फ अंधविश्वास नहीं तो और क्या है. सिर्फ आम इंसान ही नहीं, बल्कि देश के नेता अभिनेता भी अंधविश्वास पर विश्वास करते हैं. देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी अपनी कलाई पर उल्टी घड़ी पहनते हैं. इसे वह लकी मानते हैं.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पारंपरिक तौर पर राफेल की नींबू –नारियल से पुजा की थी. उस पर मलिल्कार्जुन ने इसे तमाशा और ड्रामा कहा था. एक मंत्री ने तो यहाँ तक बोल दिया कि देश की रक्षा के लिए राफेल खरीदा गया और राफेल की रक्षा के लिए नींबू. तो इससे तो अच्छा यही होता कि दुश्मनों के बॉर्डर पर नींबू रख दिया जाता, तो अपने आप दुशमनों के दांत खट्टे हो जाते. मोदी जी के कहने पर कोरोना वायरस को भागने के लिए लोगों ने जमकर ताली पीटा, शंख फूँकें, दिये जलाए. यहाँ तक की बीजेपी की एक महिला ने खुशी जाहीर करते हुए पिस्तौल फायरिंग भी कर डाली. यही नहीं, कई जगहों पर लोगों ने जुलूस निकाले और ‘’गो कोरोना गो’ और कोरोना गो बैक के नारे भी लगाए. एक जगह पर तो कोरोना का पुतला भी जलाया गया. लेकिन क्या यह सब करने से कोरोना भाग गया ? नहीं, बल्कि आज कोरोना की स्थिति और भी भयावान हो रही है. ये सब देखकर प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने ये निष्कर्ष निकाला कि हिन्दुत्व की शक्तियों ने लोगों की वैज्ञानिक चिंतन का नाश कर दिया. जिस समय भारत समेत पूरी दुनिया कोरोना वायरस के कहर का मुक़ाबला कर रही थी, लोग मर रहे थे.

बड़ी संख्या में लोग शहरों से पलायन हो रहे थे, उस समय भारत के लोगों द्वारा कोरोना को उत्सव में बदल देना एक भद्दा तमाशा ही था. इसी बात पर स्तंभकार सारिका घोष ने ट्वीट कर व्याख्या दी थी कि ‘भारत अंधविश्वास और मूर्खता के जिस गर्त में जा रहा है, वह इतना अंधकारमय और पतनशील है कि ये कहना मुश्किल है कि वहाँ से निकल पाना कभी संभव हो पाएगा या नहीं.‘ आज भी बहुत से घरों में सूर्य डूबने पर झाड़ू नहीं लगाए जाते, क्योंकि एक मान्यता है कि ऐसा करने से घर से लक्ष्मी चली जाती है. एक अंधविश्वास है जो विश्वास के रूप में फल रहा है. पर लोगों को यह नहीं पता कि पहले के जमाने में लाइटिंग की समस्या होती थी. सफाई के समय कुछ छोटी-मोटी कीमती चीजें गिर कर धूल के साथ भूल से फेंका न जाए, इसलिए लोग रात के समय घर में झाड़ू नहीं लगाते थे. लेकिन लोगों में यह अंधविश्वास बैठ गया कि रात में झाड़ू लगाने से घर से लक्ष्मी चली जाती है. कई लोग बिल्ली का रास्ता काटने को अशुभ मानते है तो कोई छींकना शुभ नहीं मानते. कई लोग बुरी नजर से बचने के लिए अपने पैरों में काला धागा बांध कर रखते है. तो कई लोग बुरी नजर से बचने के लिए घोड़े के नाल की अंगूठी बनवाकर सीधे हाथ की बीच की उंगली में पहनते हैं. 13 तारीख को कई लोग अशुभ मानते हैं. देखा होगा आपने कई होटलों में 13 नंबर का कमरा या तेरहवाँ तल नहीं होता है. बाहर के बाद सीधे 14 नंबर होता है. हमारे समाज में ऐसा माना जाता है कि काली बिल्ली अगर रास्ता काट दे तो अशुभ होता है. क्योंकि काली बिल्ली में भूत का वाश होता है. जाते समय पीछे से अगर कोई टोक दे तो उसे अशुभ मानते हैं. खड़ी हुई सीढ़ी के नीचे से निकलने को भी लोग दुर्भाग्य मानते हैं. जबकि यह केवल एक अंधविश्वास है. टीवी सीरियलों में भी शीशे का टूटना, पुजा के समय दिया का बुझना अशुभ दिखाया जाता है. ऐसे अंधविश्वास हमारे समाज में काफी प्रचलित हैं.

बॉलीवुड सितारों में भी अंधविश्वास——–
बॉलीवुड सितारे भी अंधविश्वास पर विश्वास करते हैं. गुड लक के लिए कई टोने-टोटके आजमाते हैं, आइए जानते हैं.

1. शायरा बनो उतारती हैं दिलीप कुमार की नजरें——

अपने जमाने के दिलीप कुमार को कौन नहीं जानता है. उनके बार में यह बात कई बार सुनी है कि उन्हें बचपन में नजर बहुत जल्दी लग जाती थी. इसके लिए उनकी दादी उनकी नजरें उतारा करती थीं. फिर उनकी माँ उनकी नजरें उतारने लगीं. आज भी उन्हें जल्द नजर लग जाती है इसलिए उनकी नजर उतारने के लिए उनकी पत्नी शायरा बनो सदका करती हैं. वह गरीबों को अनाज, पकड़े और जरूरतों का सामान कुछ दे देती हैं ताकि दिलीप कुमार बुरी नजरों से बचें रहें.

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2. रणवीर सिंह——

रणवीर सिंह बुरी नजरों से बचने के लिए अपने पैरों में काले धागे बांधते हैं. दरअसल, कुछ समय पहले रणवीर सिंह बीमार रहने लगें थे और उन्हें अक्सर चोटें भी लगती रहती थी. ऐसा न हो, वह बुरी नजरों से बचें रहें, इसलिए वह अपने पैरों में काला धागा बांध कर रखते हैं.

3. शिल्पा शेट्ठी——–

शिल्पा शेट्टी मानती हैं कि वो अपनी आईपीएल टीम ‘राजस्थान रॉयल’ के मैच के दौरान जब अपनी कलाई पर दो घड़ियाँ पहनती हैं तो उसकी टीम जीत जाती है. अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी अंधविश्वास में विश्वास रखती हैं. वे अपनी उँगलियों में अंगूठियाँ भी पहनती हैं और मंदिर भी जाती हैं.

4. दीपिका पादुकोण——

दीपिका पादुकोण अपनी फिल्मों की सफलता के लिए सिद्धिविनायक मंदिर जाती हैं.

5. क्रिकेट मैच नहीं देखते अभिताभ बच्चन——-

अभिताभ बच्चन को क्रिकेट मैच देखना बहुत पसंद है. लेकिन वो कभी भी भारत का क्रिकेट मैच लाइव नहीं देखते. उनका मानना है कि अगर वो टीवी के सामने बैठ जाते हैं तो भारत के विकेट गिरने शुरू हो जाते हैं.

6. सलमान का लकी ब्रेसलेट——

बॉलीवुड के दबंग, यानि सलमान खान रियल ज़िंदगी में बहुत अंधविश्वासी हैं. अपने हाथ में हमेशा
वो फिरोजी रंग का ब्रेसलेट पहने रहते हैं, क्योंकि उसे वह अपना लकी चार्म मानते हैं. यह ब्रेसलेट सलमान खान को उनके पिता ने दी थी.

7. शाहरुख खान के सभी गाड़ियों का नंबर एक जैसा——-

शाहरुख खान का कहना है कि वह अंधविश्वास पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते हैं. लेकिन वो अंक ज्योतिष या न्यूमरोलॉजी पर इतना ज्यादा भरोसा करते हैं कि उन्होंने अपनी सभी गाड़ियों का नंबर ‘555’
रखा है. इतना ही नहीं, कोलकाता नाइट राइडर्स की हार से परेशान होकर उन्होंने ज्योतिष के कहने पर अपनी टीम की जर्सी रंग भी बैंगनी करावा लिया था.

8. कैटरीना कैफ जाती हैं अजमेर शरीफ———

फिल्म ‘नमस्ते लंदन’ के प्रमोशन के दौरान कैटरीना अजेमर शरीफ गईं थी और उस फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया था. तब से लेकर अब तक कैटरीना कैफ अपनी हर फिल्म रिलीज के पहले अजमेर शरीफ दरगाह जाकर दुआ मांगती हैं.

9.  एकता कपूर का हर काम से पहले ज्योतिष की राय——–

छोटे पर्दे की सीरियल क्वीन एकता कपूर अंधविश्वास पर सबसे ज्यादा विश्वास करती हैं. वह अपने हर काम के पहले ज्योतिष की राय जरूर लेती हैं. वह इतनी ज्यादा अंधविश्वासी हैं कि शूटिंग की तारीख से लेकर शूटिंग की जगह तक ज्योतिष से सलाह लेकर करती हैं. वह अपनी उँगलियों में ढेर सारे रत्न अंगूठियाँ, ताबीज और काला घागा पहनती हैं.

10. ‘क’ अक्षर से शुरू होती है करना जौहर की फिल्में

——— कारण जौहर की ज़्यादातर फिल्में ‘क’ अक्षर से शुरू होती हैं क्योंकि
उनका मानना है कि उनकी ‘क’ अक्षर से बनी फिल्में सफल होती है.

11. अमीर खान की फिल्में दिसंबर में रिलीज—–

मिस्टर परफेक्शनिस्ट यानि अमीर खान भी अंधविश्वास पर विश्वास करते हैं. अमीर खान दिसंबर महीने को लकी मानते हैं इसलिए वह अपनी फिल्मों को दिसंबर में रिलीज करते हैं. वास्तव में अंधविश्वास केवल भारत में ही नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में है. जहां भी मानव जाति फली-फुली है, वहाँ अपने आप अंधविश्वास पैदा होता चले गए.

एक प्रगतिशील समाज का ध्येय अंधविश्वास को खत्म कर वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करना होता है. आज विज्ञान का युग है. विज्ञान के तमाम गैजेट हमारे जीवन का भिन्न अंग बन चुके हैं. हम विज्ञान की खोजों तथा आविष्कारों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं. लोग चाँद तक पहुँच चुके हैं, लेकिन फिर भी हमारे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी निर्मूल धारणाओं और अंधविश्वासों से घिरा हुआ है. इनमें गरीब-अमीर, अशिक्षित और शिक्षित सभी तरह के लोग शामिल हैं. ये लोग झाड-फूँक, जादू-टोना, और टोनोटोटकों से लेकर तरह-तरह के भ्रमों और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हैं. गाहे-बगाहे अंधविश्वास के इनसे भी भयानक रूप सामने आते हैं, जैसे मोक्ष की प्राप्ति के लिए ‘समूहिक आत्महत्या तक कर लेते हैं लोग. ऐसा नहीं है कि समाज में जागरूकता नहीं है. परंतु अंधविश्वास का स्तर इतना अधिक है कि इस समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. आज टीवी पर ही देख लीजिये, ‘इच्छाधारी नाग-नागिन, चमत्कार, असंभव घटनाओं पर आधारित कहानियाँ-किस्से और अस्तित्व दिखाकर तथा ज्योतिषियों की अवैज्ञानिक व्याख्याएँ प्रसारित करके अंधविश्वास परोसा जाता है. यह सब देखकर लोग आगे नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि और पीछे खिसक रहे हैं. ऐसे अंधविश्वास से भरी टीवी सीरियल आग में घी का काम कर रहे हैं. अंधविश्वास की जड़ें इतनी मजबूत है कि इसे एकदम से खत्म नहीं किया जा सकता है. लेकिन धीरे-धीरे इस जहरीली पेड़ को उखाड़ा जरूर जा सकता है. हमें समझना होगा कि हमारे हाथों की आड़ी-तिरछी रेखाएँ या अंगूठियों से भरी उँगलियाँ, गंडे-ताबीज, तंत्र-मंत्र हमारा भविष्य तय नहीं कर सकती. बल्कि हमें स्वयं अपने कर्म और मेहनत से अपना भविष्य संवारना होगा. भविष्यवाणियाँ, एक तरह से अंधेरे में चलाए जाने वाले तीर हैं. आज भी बहुत सी जगहों पर बीमारी ठीक करने या मनोकामना पूर्ति के लिए पशुओं की बलि दी जाति है.बच्चों की शादी सफल रहे, इसके लिए माता-पिता अपने बच्चों की कुंडली मिलान करवाते हैं, लेकिन इसके बावजूद तलाक के मामले बढ़ रहे हैं.

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समाज में आए दिन, किस्मत बदल देने, गड़ा हुआ धन दिलाने, पैसा, सोना-चाँदी दुगुन्ना कर देने वाले ढोंगी बाबा मिल जाते हैं. इसका कारण वैज्ञानिक सोच की कमी है. अंधविश्वास और धर्मान्धता इतनी है कि विगत कुछ वर्षों में गाय के नाम पर न जाने कितने मौत के घाट उतार दिये गए. बाबाओं को अपना भगवान मनाने वाले, उसी बाबाओं के हाथों महिलाएं शोषण का शिकार होती रहीं. लेकिन कई अंधे भक्त उसी आरोपित बाबा को सही साबित करने के लिए हल्ला-गुल्ला मचाते हैं, शहर के शहर जला देते हैं,गाडियाँ फूँक देते हैं. सच पूछिये तो वह उस बाबा को नहीं बचा रहे होते हैं, बल्कि अपने अंधविश्वास का विश्वास बनाएँ रखना चाहते हैं. आज हमें खुद यह बात समझनी होगी और अपने बच्चों को भी समझना होगा, ताकि वह अपने आने वाली पीढ़ी को यह बता सके कि हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं, इसलिए हमें अंधविश्वास का साथ नहीं, बल्कि विज्ञान के सच और तर्क के प्रकाश में जीना चाहिए. हमें सुनी सुनाई या आसआपस की घटनाओं को भेड़-बकरियों की तरह चुपचाप नहीं सुन और मान लिया चाहिए. बल्कि सोचना और तर्क करना चाहिए. तभी फर्क समझ में आयेगा.

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