नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में धमाकेदार जीत ने देश का नकशा बदल डाला है. 2014 को एक अपवाद समझा गया था पर इन 2 राज्यों में जीत के बाद यह पक्का हो गया है कि एक नई तरह की राजनीति अब एक नई तरह की भारतीय जनता पार्टी चलाएगी. देश के अन्य राज्यों में जहां गैरभाजपाई सरकारें हैं वहां भी भारतीय जनता पार्टी आक्रामक बनेगी और 2014 व 2017 के अनुभवों को दोहराएगी.

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की जीतों ने भारतीय जनता पार्टी को 1947 से 1975 तक की कांग्रेस की स्थिति में ला खड़ा किया है और अन्य राज्य सरकारों के पास भारतीय जनता पार्टी की सरकार के एजेंडे को लागू करने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

कांग्रेस के 2004 से 2014 के सुधारों को नकारते हुए जनता ने उसे भ्रष्टाचार का भारी दंड तो दिया ही, यह भी बता दिया कि राजनीति में केवल खड़े रहना काफी नहीं है, अपने को बेचना भी जरूरी है. नरेंद्र मोदी का मुकाबला अब न कांग्रेस के और न ही अन्य दलों या उन के गठबंधनों के बस का है.

अब भारतीय जनता पार्टी के लिए विकास के एजेंडे का बहाना बनाना भी जरूरी नहीं है. उसे न तो भ्रष्टाचारमुक्त भारत बनाना है और न ही स्वच्छ भारत. उस ने जातियों, संतोंमहंतों की फौज और अंधश्रद्धालुओं के सहारे धर्म का सहारा ले कर जो नई राजनीति की है वह कोई अनूठी नहीं है.

आम आदमी सदियों से अपने पेट और अपनी जिंदगी को धर्म, रीतिरिवाज, परंपरा के नाम पर बलिदान करता रहा है और उसी में अपना वजूद देखता रहा है. कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने भी इसी को इस्तेमाल किया है पर उस ढंग से नहीं जैसे भाजपा ने.

नरेंद्र मोदी को मिली जीत ने उन की सरकार को अब देश की अर्थव्यवस्था और समाज के साथ नए प्रयोग करने की छूट दे दी है. सरकार अब विरोध की चिंता करे बिना काम कर सकती है. अब संविधान और राजनीतिक परंपराएं उसी तरह ताक पर रखी जा सकती हैं जैसे इंदिरा गांधी ने 1969 और 1977 के बीच रखी थीं.

सरकार विरोधियों को अब 4 बार सोच कर कुछ कहने की हिम्मत करनी होगी, क्योंकि जनता ने वैलट मशीनों के जरीए एक नया फैसला लिया है. अब उस पर बहस की गुंजाइश कम है कि यह फैसला अच्छा है या नहीं.

शादी के बाद जब घर में बहू या पत्नी आ जाए तो उस की कमियों पर ध्यान देने का कोई लाभ नहीं होता. भला इसी में है कि जो जैसा है स्वीकार लो. अगर पंचों यानी जनता की राय, भरपूर राय के साथ जीत कर कोई सरकार बने तो उसे स्वीकार करना चाहिए.

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