विवाह बहुत आसान है पर तलाक बहुत कठिन. कभी असल में पैसे की कमी की वजह से तो कभी केवल अपना अहं साबित करने के लिए पतिपत्नी मनमुटाव के बाद एकदूसरे को अदालतों, पुलिस थानों और अफसरों के आगे घसीटते रहते हैं. एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले जानलेवा बन जाते हैं.

एक मामले में समस्तीपुर, बिहार का एक जोड़ा महज 8 हजार मासिक के गुजारेभत्ते की अपील करने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में वकीलों को बहुत मोटी फीस देनी पड़ती है और दूसरे और हजारों के खर्च होते हैं.

बड़ी बात यह है कि 2010 में तलाक की दी गई अर्जी 2018 में भी पैंडिंग है. उसी दौरान मैंटेनैंस को ले कर पतिपत्नी फैमिली कोर्ट से हाई कोर्ट और हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का चक्कर लगा आए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पति को कोई राहत नहीं दी और मामले को बेगूसराय के फैमिली कोर्ट पर ही छोड़ दिया. एक तरह से यह पतिपत्नी दोनों के प्रति अन्याय है कि 2010 में दाखिल मामला 2018 में भी निबटाया नहीं गया और जब उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में गुजारेभत्ते को ले कर मामला पहुंचा तो अदालतों ने सिर्फ खर्च की सीमा पर कई सुनवाइयां कर डालीं. इतने में तो वे बेगूसराय से मामला अपने हाथ में ले कर तलाक की डिक्री दे सकते थे. सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 142 के अंतर्गत इस तरह के फैसले करने का हक है. पतिपत्नी के बीच विवाद अदालतों में न उलझे रहें यह देखना हर अदालत का काम है. बेगूसराय अदालत की ही 2-3 सुनवाइयों में 2010 में ही फैसला कर डालना चाहिए था. जब 2018 में सुप्रीम कोर्ट को यह एहसास था कि पतिपत्नी में फिर प्रेम पैदा हो ही नहीं सकता तो क्व8 हजार कैसे, कब दिए जाएं इस पर फैसला करने के साथ दोनों को एकदूसरे से मुक्त कर देना चाहिए था.

हमारा विवाह कानून इस मामले में एकदम आतंकवादी है कि वह पतिपत्नी को तलाक न दिला कर मामले को लटकाए रखता है. उस के पीछे अदालतों की आज भी सोच यही है कि विवाह तो संस्कार है, जो तोड़ा नहीं जा सकता. जैसे जब लड़केलड़की में प्रेम हो तो पतिपत्नी बनने से रोकटोक संभव नहीं है और मिनटों में प्रेमी पतिपत्नी बन सकते हैं, वैसे ही जब विवाह हो चुका हो तो बच्चे हों या न हों, एकदूसरे से मुक्ति भी तुरंत हो जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के पास अब ऐसे काफी मामले आते हैं और यदि वह फटकार लगाने लगे कि फैमिली कोर्ट ने 2-3 माह में क्यों नहीं निर्णय दिया तो यह समस्या इसी कानून के रहते दूर हो सकती है. कानून की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट को लोगों की इस सब से बड़ी समस्या का खयाल रखना चाहिए कि जब भी कोई जोड़ा अदालत तक पहुंचता है वह एकदूसरे से उकता चुका

होता है. अदालतों को प्रक्रिया की बारीकियों में जाने के बजाए समझानेबुझाने का लाभ न हो तो बंधनमुक्ति पर जोर देना चाहिए. ‘मियांबीवी की लड़ाई, वकीलों की कमाई’ का सिद्धांत दफना दिया जाना चाहिए.

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