देश के केंद्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), ने केंद्र सरकार और देशवासियों को दुविधा में नहीं रखा है. उसने साफ कह दिया है कि सकल घरेलू उत्पाद (ग्रौस डोमैस्टिक प्रोडक्ट यानी जीडीपी) चालू वर्ष में नैगेटिव में रहेगा. यह देश की सरकार के लिए बेहद चिंता की बात है यदि वह करे तो.

आरबीआई ने तो ऐसा अब कहा है, कई देशी व विदेशी आर्थिक विश्लेषक एजेंसियां इस विषय पर काफी पहले से भारत सरकार को चेताती रही हैं. विपक्षी नेता, कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी भी धंसती जा रही देश की अर्थव्यवस्था पर सरकार को सलाह देते रहे हैं.

लेकिन, किसी की न सुनने व मन की सुनाने/करने वाले बड़बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनमानी करते रहे. आर्थिक मामलों में भी अपने मन की करते रहे. एक उदाहरण, बिना सलाह के नोटबंदी थोपी गई. जिसका नतीजा नकारात्मक रहा. ताजा उदाहरण, बिना योजना बनाए देश पर लौकडाउन थोप दिया. इसका भी नतीजा नकारात्मक दिख रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तो 26 मई को साफ कह दिया कि नरेंद्र मोदी की लौकडाउन रणनीति फेल हो गई है.

गौरतलब है कि साल 2013 के आखिर में नरेंद्र मोदी भारत से भ्रष्टाचार मिटाने और अच्छे दिन लाने के वादों के साथ एक शक्तिशाली नेता बनकर उभरे जिसकी देश को जरूरत थी. सचाई तो यह थी कि पिछली सरकार के कार्यकाल में जो बैलून फट चुका था उसे दोबारा फुलाने का कोई उपाय नहीं था. भारत की जिस फलतीफूलती अर्थव्यवस्था की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही थी वह सिर्फ ऊपर के 20 फीसदी लोगों के लिए थी. बाकी लोगों को पिछले एक दशक के विकास से कुछ नहीं मिला था. दरअसल, पूरे 2000 के दशक के दौरान रोजगार में विकास की दर 1980 और 1990 के दशक से भी कम थी. जिस अर्थव्यवस्था में सिर्फ अमीरों का भला होता हो, वह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती.

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नई सरकार बनी, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. सत्ता में आते ही धर्म को प्राथमिकता में रखती मोदी सरकार आर्थिक फ्रंट पर ढुलमुल व दोषपूर्ण रवैया अख्तियार किए रही. सो, मोदीनौमिक्स का नाकाम होना तय था क्योंकि इस दौरान सबकुछ मोटेतौर पर पिछली यूपीए सरकार के आर्थिक रास्ते पर ही चलता रहा. नोटबंदी और जीएसटी ने देश के मध्यवर्ग के लिए जिंदगी और भी मुश्किल कर दी. मोदी सरकार का ध्यान गरीबों को आर्थिक सहायता देकर वोट जीतने पर रहा तो इससे सिर्फ इतना फायदा हुआ कि जो लोग अर्थव्यवस्था के हाशिए पर चले गए थे उनकी हालत जरा सी ठीक हुई. लेकिन गरीब लोगों की खपत का स्तर इतना कम रहा कि सरकार के खर्च के बावजूद अर्थव्यवस्था में मांग को नहीं बढ़ाया जा सका.

सरकार के कान अब खड़े हुए हैं. वह जानती है कि देश की अर्थव्यवस्था बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी है. इस आर्थिक संकट से निकलने का दीर्घकालिक समाधान है देश की संपदा का पुनर्वितरण, उत्पादन की प्राथमिकता में बदलाव और 20 फीसदी से ऊपर की आबादी में खपत की बढ़ोतरी.

मध्यवर्ग के लिए यह बुरी खबर है. पिछले एक दशक से यह वर्ग कभीकभार नजर आई उम्मीदों के बीच मुसीबतों को झेल रहा है. अब सरकार कह रही है कि इससे ज्यादा की उम्मीद मत करो. आत्मनिर्भर बनो और खुद से कम सुविधा में जी रहे लोगों की मदद करो.

सवाल है, आत्मनिर्भर कैसे बनें ? सरकार ने अपने तरीके से इसका इलाज बता दिया है – कर्ज लेकर – उसकी शतप्रतिशत यानी सौफीसदी गारंटी सरकार लेगी. यानी, आत्मनिर्भरता की निर्भरता कर्ज पर टिकी है.

सरकार की तरफ से आज कारोबारियों और उपभोक्ताओं को कर्ज लेकर खुद को बचाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. लेकिन, जब कर्ज चुकाने का कोई उपाय न दिख रहा हो, तो कर्ज लेगा कौन? ऐसा सिर्फ वे ही कर सकते हैं जो बेहद आतुर हैं या वे जो कर्ज चुकाने की कोई मंशा ही नहीं रखते. बहरहाल, सरकार की गारंटी की शह पर बैंक ऐसे लोगों को भी कर्ज देगा जिन्हें उधार देने में उसे खतरा होगा. और उनकी गलती का नतीजा भुगतेंगे मध्यवर्ग के वे लोग जो टैक्स अदा करते हैं.

बैंकों को कर्ज न चुकाए जाने का बोझ आखिरकार देश के मध्यवर्ग के कंधों पर भी आएगा, जिन्हें न तो सरकार से सब्सिडी मिलेगी और न ही टैक्स में छूट. इसलिए मध्यवर्ग अच्छे दिन की नहीं, बल्कि और बुरे दिन की ही उम्मीद रखे. दरअसल, बैंकों को कर्ज न चुकाए जाने की स्थिति में उसकी भरपाई के लिए सरकार टैक्स की दरों में बढ़ोतरी कर सकती है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिल्ली में बताया कि बैंकों को थ्री-सी नाम से चर्चित जांच एजेंसियों सीबीआई, सीवीसी और सीएजी के डर के बिना अच्छे कर्जदारों को स्वचालित रूप से कर्ज देने के लिए कहा गया है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों व प्रबंध निदेशकों के साथ बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बैंकों को ऋण देने से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि सरकार की ओर से 100 प्रतिशत गारंटी दी जा रही है.

दरअसल, यह कहा जाता रहा है कि बैंकिंग क्षेत्र में थ्री-सी यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा अनुचित उत्पीड़न की आशंका के कारण निर्णय प्रभावित हो रहे हैं.

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सीतारमण ने कहा, ”कल, मैंने दोहराया कि अगर कोई निर्णय गलत हो जाता है और कोई नुकसान होता है, तो सरकार ने 100 प्रतिशत गारंटी दी है. यह व्यक्तिगत अधिकारी और बैंक के खिलाफ नहीं जाने वाला है. सो, बिना किसी डर के उन्हें इस स्वचालित मार्ग को इस अर्थ में अपनाना चाहिए कि सभी पात्र लोगों को अतिरिक्त ऋण और अतिरिक्त कार्यशील पूंजी उपलब्ध हो.”

तो, आत्मनिर्भरता के पीछे सरकार की निर्भरता छिपी है. सरकार आत्मनिर्भरता पर निर्भर दिख रही है. उसकी मंशा है कि लोग आत्मनिर्भर बन जाएं चाहे कर्ज लेकर ही सही. कर्जदार कर्ज न चुका पाएंगे, तो सरकार टैक्स बढ़ा कर टैक्सदाता मध्यवर्ग से वसूल लेगी ही.

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