बिहार में खगडि़या के जिला जज द्वारा अंतर्जातीय प्रेमविवाह करने पर घर में नजरबंद रखी गई बेटी को पटना हाईकोर्ट ने पुलिस को सुरक्षित पेश करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने यह आदेश लीगल पोर्टल ‘बार ऐंड बैंच’ में प्रकाशित खबर पर संज्ञान लेते हुए दिया है.

जिला जज सुभाष चंद्र चौरसिया की बेटी यशस्विनी ने सुप्रीम कोर्ट के वकील सिद्धार्थ बंसल से प्रेमविवाह किया. दिल्ली जुडीशियल सर्विसेज की परीक्षा देने आई बेटी को मां ने होटल के बाहर सिद्धार्थ के साथ देख लिया. मां ने फिर दोनों को मिलने नहीं दिया और बेटी को होटल से बाहर नहीं निकलने दिया. यहां तक कि यशस्विनी परीक्षा तक नहीं दे पाई. इस तरह परीक्षा दिलाए बिना  वे बेटी यशस्विनी को ले कर चली गईं.

कुछ समय बाद सिद्धार्थ के पास यशस्विनी के परिजनों के फोन आए जिन में वे सिद्धार्थ को धमका रहे थे. युवती की मां का फोन भी आया, उन्होंने सिद्धार्थ को यशस्विनी से दूर रहने की हिदायत दी.

उत्तर प्रदेश के बागपत के अहीर गांव में हिंदू धर्म के छुआछूत व ऊंचनीच के बरताव से तंग आ कर करीब आधा दर्जन दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इन परिवारों का कहना है कि उन्हें बातबात पर तंग किया जाता है, उन से भेदभाव बरता जाता है, जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया जाता है. बौद्ध धर्म से आए भंते महाराज ने हमारे परिवारों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाई और उन्होंने बौद्ध धर्र्म में शामिल होने का लिखित पत्र दिया.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में 21 जून को दलित दयाराम अहीरवार को सरपंच के घर के सामने से मोटरसाइकिल ले जाने पर मारापीटा गया. दयाराम मोटरसाइकिल से अपने घर जा रहा था. उस के घर की तरफ जाने वाली सड़क सरपंच के घर के आगे से निकलती है. आरोप है कि सरपंच हेमंत कुर्मी और उस के भाइयों ने उस के बाल पकड़ कर थप्पड़ मारे और खूब पिटाई की.

भेदभाव के मारे ये बेचारे

देश में दलितों और स्त्रियों में लगातार भय का माहौल बढ़ता जा रहा है. सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले 3-4 वर्षों में दलितों पर हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की अनगिनत घटनाएं हुई हैं. यौनशोषण की वारदातों का सिलसिला कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है.

देशभर में आएदिन दलितों द्वारा हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण करने की खबरें सुर्खियों में रहती हैं. उन पर भेदभाव, हिंसा की घटनाएं रोज होती हैं. 2016 में जातिगत भेदभाव के 40 हजार मामले दर्ज हुए थे. एक रिपोर्ट के अनुसार, हर 18 मिनट पर एक दलित के साथ अपराध घटित होता है.

48 प्रतिशत गांवों में पानी के स्रोतों पर दलितों के जाने की मनाही है. 40 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों को

कतार से अलग बैठ कर भोजन करना पड़ता है. 54 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. प्रति एक हजार दलित परिवारों में 83 बच्चे जन्म के एक साल के भीतर मर जाते हैं. 45 प्रतिशत बच्चे निरक्षर रह जाते हैं.

समाज में महिलाओं के साथ अपराध की तसवीर भयावह है. यौन अपराध, घरेलू हिंसा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. नैशनल अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, रोज 60 बलात्कार के मामले सामने आते हैं. हर घंटे महिलाओं से छेड़छाड़ की 15 घटनाएं दर्ज की जाती हैं.

पिछली सरकारें भी दलितों और स्त्रियों पर होने वाले अपराधों पर अंकुश नहीं लगा पाईं, जबकि उन की नीतियां उदार थीं. भाजपा के केंद्र में आने के बाद इन तबकों पर अपराध की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है क्योंकि भाजपा के सक्रिय नेता पौराणिकवादी हैं और संतोंमहंतों के छलफरेब में पड़े रहते हैं. पार्र्टी ने 2014 के घोषणापत्र में दलितों के लिए सामाजिक न्याय और खुशहाली की प्रतिबद्धता जताई थी. दावा था कि सत्ता में आने के बाद

पार्र्टी दलितों का शिक्षा, रोजगार, स्किल डैवलपमैंट के जरिए उत्थान करेगी. दलितों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने पर भी जोर दिया गया था पर सत्ता में आने के बाद भाजपापरस्त धार्मिक ताकतें शक्तिशाली हो गईं और वे चारगुना दम से दलितों व स्त्रियों पर जुल्म के लिए टूट पड़ीं.

धर्म की कट्टरता

देशभर में हो रही घटनाओं के पीछे जो कारण उभर कर सामने आ रहे हैं उन से जाहिर है कि धर्म के रखवाले आज भी इन तबकों को धर्म के अमानवीय कायदों के शिकंजे में कस कर रखना चाहते हैं. आज भी समाज में पुरानी मानसिकता कायम है.

भारत में दलित और स्त्रियों में चेतना के उभार के बीच इन पर अत्याचार के किस्से भी भयावह होते जा रहे हैं. दलितों और स्त्रियों में जागृति आ रही है पर उन पर नए तरह के हमले भी हो रहे हैं.

हिंदू धर्म दलितों और स्त्रियों के खिलाफ अपना दबदबा बनाए रखने के लिए पूरी ताकत के साथ जुटा हुआ है. दलित और स्त्री के जो काम धर्मग्रंथों में बताए गए हैं, धर्म के रखवाले उसे कायम रखने के प्रयास कर रहे हैं. नजर रखी जा रही है कि स्त्री और दलित वर्ग अपनेअपने धर्म से च्युत न हो जाएं. धर्म के बेरहम डंडे से अब भी इन्हें हांकने की कोशिशें जारी हैं.

धर्म में जातीय आधार पर भेदभाव व असमानता तो है ही, लिंग के आधार पर भी गैरबराबरी है. संविधान में समानता का अधिकार मिलने के बावजूद दलितों और स्त्रियों के प्रति सदियों पुरानी सड़ीगली पौराणिक सोच हावी है. इन के प्रति अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे.

भारतीय संस्कृति और धार्मिक वातावरण में लगातार घटती घटनाओं  से स्पष्ट है कि धर्म के धंधेबाज धर्म के नियमकायदों के नाम पर भय बनाए रखना चाहते हैं. धर्म का यह अमानवीय पक्ष है जो समानता का दुश्मन तो है ही, मानवता का संहारक भी है.

देश कितनी भी तरक्की का डंका पीटे, पढ़ाईलिखाई का जश्न मना ले, पर वैचारिक रूप से अभी भी रूढि़वादी जकड़नों से बाहर नहीं निकल पाया है. यहां की धार्मिक वर्णव्यवस्था की संरचना में जातिवादी दुराग्रह और वर्चस्ववादी पूर्वाग्रह धंसे हुए हैं.

स्त्रियों का मजाक

दुनिया के सभी धर्म और समाज स्त्रियों पर अत्याचार के लिए हमेशा दोषी रहे हैं. वे मध्ययुगीन सोच से ऊपर नहीं उठ पाए हैं. अरब देशों में स्त्रियों की हालत खराब है. सऊदी अरब में महिलाएं धर्र्म के शिकंजे से मुक्ति के लिए जद्दोजेहद कर रही हैं. हालांकि नए युवा शासक सुलतान बिन सलमान महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए कुछ करना चाहते हैं, पर कट्टरपंथियों के आगे उन्हें जूझना पड़ रहा है.

सऊदी अरब में अब भी महिलाओं को पुरुष की गार्जियनशिप में रहना पड़ता है. पुरुष की इच्छा के विरुद्ध वे शादी नहीं कर सकतीं. विदेश नहीं जा सकतीं. गैरपुरुष से मित्रता नहीं कर सकतीं. न ही उस के साथ कहीं जा सकती हैं. सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं का लंबे व ढीले वस्त्रों के अलावा हिजाब पहनना जरूरी है. महिला डाक्टर पुरुष डाक्टर की अनुमति के बगैर पुरुषों का इलाज नहीं कर सकती. महिलाएं अकेले घूम नहीं सकतीं. ऐसा करने से रोकने के लिए धार्मिक पुलिस उन पर निगरानी रखती है.

भारत में भी स्त्री की आजादी को ले कर तरहतरह के फतवे जारी किए जाते हैं. ये फतवे कुछ उसी तरह के होते हैं जो धर्मग्रंथों में लिखे हैं. हिंदू धर्र्म में महिलाओं और दलितों को पशुओं से भी नीच समझा गया है.

हिंदुओं के पूजनीय आदिशंकराचार्य ने स्त्री को नरक का द्वार बताया था.

याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है, उस स्त्री के सारे अधिकार छीन लेने चाहिए जो अपना सतीत्व खुद खोए. इन में उसे जिंदा रहने लायक भोजन देने, उस की उपेक्षा करने, जमीन पर सोने, गंदे कपड़े पहनने की सजा शामिल है.

मजे की बात यह है कि ऐसी सजा चरित्रहीन पुरुष के लिए नहीं है.

हिंदू समाज में जहां पति को परंपरा और धर्मग्रंथों में परमेश्वर का दर्जा प्राप्त है वहीं पत्नी को तरहतरह के व्रतपूजा करनी होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो लंबी उम्र की कामना केवल पत्नी न करती, पति भी पत्नी के लिए ऐसी कामना करता.

मनुस्मृति-9-3 में लिखा है,

‘‘स्त्री सदा किसी न किसी के अधीन रहती है, क्योंकि वह स्वतंत्र रहने के योग्य नहीं है.’’

मनुस्मृति-9-45 में इस तरह दर्ज है-

‘‘स्त्रियां स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली, चंचल और अस्थिर अनुराग वाली होती हैं.’’

चाणक्य नीति-16-2 में कहा गया है,

‘‘झूठ, दुसाहस, मूर्खता, लालच, अपवित्रता और निर्दयता स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं.’’

मैत्रायणी संहिता में फरमाया गया है,

‘‘नारी अशुभ है. यज्ञ के समय नारी, कुत्ते और शूद्र को देखना नहीं चाहिए.’’

हिंदू धर्मगं्रथों में वर्णित इस तरह की सीखें आज भी समाज के जेहन में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं. दलित हिंदुओं की मानसिक गुलामी की जकड़न से निकलने की कोशिश तो कर रहा है पर वह खुद अपने बनाए किसी दूसरे धार्मिक जाल में फंस रहा है.

आरक्षण और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों ने दलितों के प्रति ऊंची जातियों में नफरत भर दी है. उन्हें लगता है कि दलित उन के अवसरों को हथिया रहे हैं.

अच्छी बात यह है कि दलितों और स्त्रियों के खिलाफ जितना शोषण, अत्याचार हो रहा है और उन्हें दबाने, कुचलने के प्रयास हो रहे हैं, ये वर्ग अब उतना ही प्रतिरोध करते दिखाई दे रहे हैं. आएदिन महिलाएं और दलित संगठन हिंदू रूढि़वादी सोच का खुल कर विरोध करने लगे हैं. भारत सहित दुनियाभर की महिलाएं ‘मी टू’ जैसा अभियान चला कर पुरुषों की भोगवादी सोच का भंडाफोड़ कर दकियानूसी समाज की आंखें खोल रही हैं. दलित युवा छुआछूत, भेदभाव, हिंसा जैसे मुद्दों को ले कर संघर्षरत नजर आते हैं.

दलित और स्त्री पर धर्र्म की अमानवीय प्रथाओं का अंत तो तभी होगा जब ये वर्ग धर्म का त्याग करने का साहस दिखाएंगे.

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