आमतौर पर औरतों को अपना पैसा घर वालों यानी पति, बच्चों और अन्य रिश्तेदारों से छिपा कर रखने की आदत होती है. यह बहुत अच्छी आदत है. यह भारी सुरक्षा का एहसास तो देती ही है, आत्मविश्वास भी बनाए रखती है. जिन औरतों के पास अपनी नौकरी नहीं है और शेयर आदि की भी कोई आमदनी नहीं है उन के लिए बैंक अकाउंट खोल कर 4-5 लाख 8-10 साल में जमा कर लेने कोई बड़ी बात नहीं है.
अब सरकार उन जमा रुपयों को भी वैसे ही हथिया लेना चाहती है जैसे उस ने नोटबंदी के समय हथियाए थे जब अलमारियों में बंद साडि़यों के बीच छिपे रुपए निकले थे. अब टीडीएस यानी संभावित आयकर का एक अंश निकाल कर और बैंक अकाउंट को आधार नंबर से जुड़वा कर मेहनत से बचाई पूंजी को हथियाने की योजना लागू कर दी है.
कहा तो यह जा रहा है कि यह काला धन रखने वालों के लिए तैयार शिकंजा है पर घर खर्च में से बचाए और पति या पिता से मिले नितांत कानूनी पैसे की कैफीयत इनकम टैक्स औफिसर को दी जाए यह अन्याय और महिला विरोधी है.
असल में यह कदम घोषित करता है कि या तो यह सरकार समझती है कि दलित, शूद्र और स्त्री को धन रखने का अधिकार नहीं है या फिर इतनी निकम्मी है कि अपने विरोधियों पर तेजाबी बारिश करने से पहले यह तक नहीं सोच पाती कि भीड़ में निहत्थे और निर्दोष भी हो सकते हैं.
निर्दोष और निहत्थी, बैंकों और करों के जाल पर जाल से बेखबर औरतों के अकाउंटों को आधार नंबर से जोड़ कर और फिर पति, पिता या बेटे के आधार नंबर से जानकारी जुटा कर आयकर अधिकारी औरतों की संपत्ति को काला धन घोषित कर सकते हैं.
जहां बात हजारों तक है वहां भी हर साल ब्याज पर टीडीएस की कटौती एक अन्याय ही है. कम से कम औरतों को तो एक साधारण स्व:सर्टिफिकेट से मुक्ति दिलाई जा सकती थी. पर हमारी सरकार तो हरेक को बेईमान मान कर चल रही है और औरतों को भी नहीं बख्श रही. बुढ़ापे या बीमारी में जब पैसे की आवश्यकता होती है तो यह सरकार कहीं नजर नहीं आती पर जब औरतों की संपत्ति पर डकैती डालनी होती है तो यह मौजूद रहती है.
कर एकत्र करना सरकार का हक है पर कर दिए पैसे को कौन, कहां, कैसे रखे यह बारबार हर साल पूछने का हक सरकार को नहीं होना चाहिए. क्या औरतों में दम है अपने अधिकार के लिए लड़ने का?