हर खराब चीज के लिए भाजपा सरकार को दोष देना तो ठीक न होगा पर जब मोदी हर अच्छी बात के लिए अपनी पीठ खुद थपथपा सकते हैं, तो उन के शासनकाल में होने वाली कमी, कमजोरी या खराबी के लिए उन्हें ही गाल आगे करने होंगे.
शहरों का प्रदूषण आज देश के लिए सब से भयंकर बीमारी है. यह भूख की तरह की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के 15 सब से गंदे शहरों में से 14 भारत में हैं. इन 14 (बाकी की तो छोडि़ए) की औरतों को बीमारियों, मैले कपड़ों, कीच होती दीवारों, चिटकते फर्शों, कीटों, मच्छरों व मक्खियों के लिए सरकार को ही कोसना होगा.
2014 में दुनिया के सब से गंदे 15 शहरों में से भारत के 3 ही शहर थे. स्वच्छता अभियान की पोल खोलती यह रिपोर्ट बताती है कि अब 4 सालों में 11 शहर और जुड़ गए हैं. गंगा किनारे बसा कानपुर सब से गंदा है. यमुना किनारे बसा फरीदाबाद 2 नंबर पर है, तो गंगा के किनारे बसा वाराणसी शहर 3 नंबर पर. तीर्थस्थान गया जहां 4 नंबर पर है, वहीं गंगा किनारे बसा पटना 5 नंबर पर. नरेंद्र मोदी की सीट दिल्ली 6 नंबर पर है और योगी आदित्यनाथ का आश्रम लखनऊ 7 नंबर पर है.
वृंदावन मथुरा से थोड़ा दूर आगरा 8 नंबर पर है. श्रीनगर जो कहते नहीं अघाता था कि स्वर्ग यहीं है 10 नंबर पर है. दक्षिण भारत के किसी भी राज्य में गंदे 15 शहरों में कोई भी शहर नहीं है. 15 में से 14 के 14 भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के हाथों में हैं.
यह चाहे सही है कि गंदगी पिछली सरकारों की भी देन है पर जब वाहवाही लूटने के लिए पिछली सरकार के अच्छे योगदान को अनदेखा करोगे तो थूथू भी सुनोगे.
बच्चों के अच्छे नंबर आए हैं, तो तारीफ पत्नी को मिलेगी, खराब नंबर आए हैं, तो उन के दादादादी को तो नहीं कोसा जाएगा न.
ये शहर गंदे इसलिए हैं कि गंद को उठाना हमारे यहां आज भी बेहद गंदा काम समझा जाता है. भारत में अब दलित भी यह काम करने में आनाकानी करने लगे हैं, क्योंकि इस काम का आर्थिक ही नहीं सामाजिक असर भी है. दूसरे देशों में यह काम वहां के अनपढ़, गरीब या बाहर के आए लोग कर रहे हैं पर इस काम को करने वाले सामाजिक बहिष्कार के शिकार नहीं होते.
यहां का सफाई कर्मचारी इस काम को जन्मजात बोझ समझता है. उस का मन ही नहीं है इस में और हो भी क्यों? घर में रह रही विधवा को यदि सफेद कपड़े पहना कर सीढि़यों के नीचे वाली कोठरी दोगे तो वह घर की रक्षा तो करेगी नहीं, मन मार कर काम करेगी, केवल जीने भर के लिए.
गंदगी ऊंचे फैलाते हैं, तो उस के निबटान का जिम्मा भी उन्हें ही उठाना होगा. हाथ से नहीं उठाना तो मशीनें हैं न आज. पर ऊंचे तो कूड़ा फैलाना जन्मजात पौराणिक हक मान कर चल रहे हैं और यही दुर्दशा की वजह है.
भूल जाइए कि हम सुधरने वाले हैं. हम और भी गंदे होंगे और अस्थमा, स्किन डिजीज, इन्फैक्शन, कैंसर आदि रोग सुरसा की तरह बढ़ेंगे ही. जो अंधविश्वासी हैं वे भले महा हवन करा लें, पर होगा तभी कुछ जब हर जना दस्ताने पहन कर अपना व दूसरों का कूड़ा उठाने को तैयार होगा.