स्पर्म डोनर के बढ़ते चलन से झोलाछाप डाक्टरों और ओझाओं के ठगी के धंधे को तगड़ा झटका लगा है. बच्चे न पैदा होने को मर्द के नाम पर कलंक, मर्दाना ताकत की कमी और न जाने क्याक्या अफवाहें फैला कर ये बच्चे की चाह में भटकते लोगों को ठगते रहते हैं.
स्पर्म डोनर की बदौलत मां बनने का सुख पाने वाली पटना की एक महिला बताती हैं कि संतान पाने के लिए वह और उस के पति पटना, दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ आदि के दर्जनों झोलाछाप सैक्स स्पैशलिस्टों से इलाज करा चुके पर संतान नहीं हुई. 4 सालों तक उन लोगों से इलाज कराने पर करीब 4 लाख रुपए खर्च करने के बाद भी संतान पाने का सपना पूरा नहीं हो सका. जब पटना में एक रिश्तेदार ने इनफर्टीलिटी क्लीनिक के बारे में बताया, तो वहां इलाज कराने के बाद उन्हें बेटा पैदा हुआ.
बढ़ी है मांग
स्पर्म डोनर्स का चलन बढ़ने से धीरेधीरे ही सही पर ढोंगी बाबाओं, नीमहकीमों और तांत्रिकों की दुकानें बंद होने लगी हैं. समाज में पिछले कुछ सालों से स्पर्म डोनर्स की मांग बढ़ी है और संतान की चाह में लोग स्पर्म डोनर्स की सेवाएं लेने लगे हैं. डोनर अच्छीखासी कमाई करने के साथसाथ कई सूनी गोदों में किलकारियां पैदा करने का काम कर रहे हैं. कई लोग जहां स्पर्म डोनेशन को गंदा कारोबार बता रहे हैं, वहीं कई लोग इसे आज के समय की मांग बता कर इस की सराहना कर रहे हैं. मर्दों में प्रजनन क्षमता की कमी होने के बढ़ते मामलों के बीच स्पर्म डोनर कई घरों में मर्द के नपुंसक होने की जलालत पर परदा डालने का भी काम कर रहे हैं और कई वैवाहिक रिश्तों को टूटने से भी बचा रहे हैं, साथ ही बच्चे की चाह में कई लोगों को झोलाछाप डाक्टरों, बाबाओं और तांत्रिकों के चंगुल में फंसने से भी बचा रहे हैं.
इनफर्टीलिटी क्लीनिकों और डाक्टरों के जरीए स्पर्म डोनेशन के काम में सैकड़ों युवक शामिल हैं, जो पढ़ाई और कोचिंग के साथसाथ स्पर्म डोनर का काम भी कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बैंगलुरु जैसे महानगरों से निकल कर आज कई डोनर छोटे शहरों तक पहुंच गए हैं.
पटना के एक बड़े इनफर्टीलिटी क्लीनिक के डाक्टर के अनुसार पटना जैसे शहर में करीब सौ से ज्यादा स्पर्म डोनर काम कर रहे हैं, जो सब बाकायदा स्पर्म बैंक या इनफर्टीलिटी सैंटर से रजिस्टर्ड हैं. इस सारे कारोबार में बहुत सीक्रेसी मैंटेन की जाती है. स्पर्म लेने और देने वालों को एकदूसरे के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है. स्पर्म देने वाले और लेने वाले का नाम पूरी तरह से गुप्त रखा जाता है.
बेऔलादों के लिए वरदान
औरतों में बांझपन और मर्दों में प्रजनन क्षमता नहीं होने के बाद भी ऐसे दंपती संतान का सुख पा सकते हैं. इनफर्टीलिटी स्पैशलिस्ट डाक्टर हिमांशु राय बताते हैं कि जिन मर्दों में शुक्राणुओं की संख्या नगण्य हो या फिर वे बहुत महंगा इलाज कराने में सक्षम न हों तो ऐसी हालत में डोनर स्पर्म से महिला को गर्भधारण कराया जा सकता है. इस वजह से आज डोनर स्पर्म की मांग काफी बढ़ चुकी है. वहीं किराए पर कोख (सैरोगेट मदर) ले कर मर्द के शुक्राणुओं से गर्भधारण कर संतान सुख पाया जा सकता है.
मर्दों में प्रजनन क्षमता कम होने की बहुत सारी वजहें हैं. सिर्फ शारीरिक कमजोरी की वजह से ही उन में संतान पैदा करने की ताकत नहीं होती है. डाक्टर सोनिया मलिक कहती हैं कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मर्दों में प्रजनन क्षमता कम होने लगी है. बीमारी, नशाखोरी, काम का तनाव, गड़बड़ खानपान, टाइट कपड़े और बढ़ता प्रदूषण जैसी वजहों से भी प्रजनन क्षमता में कमी हो सकती है. वहीं मोबाइल फोन और लैपटौप के ज्यादा इस्तेमाल से भी मर्दों की प्रजनन क्षमता कम हो रही है. इन के ज्यादा इस्तेमाल से औक्सीडैंटिव स्ट्रैस बढ़ जाता है और औक्सीजन की कमी हो जाती है, जिस से डीएनए डैमेज हो जाता है. इस से स्पर्म काउंट कम हो जाता है और शुक्राणुओं में गड़बड़ी आती है. इन सब से बच कर या कम से कम उपयोग और नियमित ऐक्सरसाइज कर मर्द अपनी प्रजनन क्षमता को कायम रख सकते हैं.
सुरक्षित व गोपनीय
इनफर्टीलिटी स्पैशलिस्ट 20 से 26 साल तक के ही युवकों का स्पर्म लेते हैं, जिस में ज्यादातर इंजीनियरिंग और मैडिकल के स्टूडैंट्स होते हैं. इनफर्टीलिटी स्पैशलिस्ट बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि हर किसी का स्पर्म ले लिया जाता है. सिर्फ स्टूडैंट्स का ही स्पर्म लिया जाता है और उस में भी 10-12 का स्पर्म टैस्ट करने के बाद महज 1-2 का ही स्पर्म पूरी तरह से खरा पाया जाता है. डोनेशन के लिए अब युवकों को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती है. अपना स्पर्म डोनेट कर चुके स्टूडैंट्स ही दूसरे स्टूडैंट्स को भेजते हैं.
पटना में करीब 800 स्पर्म सैंपल की खपत होती है. स्पर्म देने वाले इंजीनियरिंग या मैडिकल के स्टूडैंट्स को क्व4 से 5 हजार मिलते हैं, जबकि आम स्टूडैंट्स को प्रति डोनेशन क्व1 से डेढ़ हजार दिए जाते हैं. किसी एक डोनर से महीने में 4-5 बार ही डोनेशन लिया जाता है. डाक्टरों का मानना है कि उम्रदराज और नौकरीपेशा लोग काफी तनाव में रहते हैं या लंबे समय से किसी न किसी नशे के आदी होते हैं, जिस से उन का स्पर्म ठीक नहीं होता है. इनफर्टीलिटी क्लीनिकों के संचालक बताते हैं कि स्पर्म डोनेशन के काम में पूरीपूरी गोपनीयता बरती जाती है. डोनर को यह नहीं बताया जाता है कि उस का स्पर्म किसे दिया जाएगा और न ही स्पर्म लेने वाले को यह पता होता है कि उसे किस का स्पर्म दिया गया. अब तो ब्लड ग्रुप का मिलान करने के बाद ही स्पर्म लिया जाने लगा है ताकि आगे कोई दिक्कत न हो.
सरल हो संतान सुख
महिला डाक्टर जगदीश्वरी मिश्रा कहती हैं कि शादी के बाद जब बच्चा पैदा नहीं होता है, तो अकसर औरतों को ही उस के लिए दोषी ठहराया जाता है. मर्द खुद की जांच नहीं कराते और दूसरी फिर तीसरी शादी करते जाते हैं. इस पर रोक लगाने की जरूरत है. अनपढ़ तबका औरत को बच्चा नहीं होने पर उसे हकीमों, बाबाओं, ओझाओं के पास ले जाता है, मगर जब उस के बाद भी बच्चा नहीं होता है, तो डाक्टर के पास जाते हैं. अधिकतर मामलों में यही देखा गया है कि जांच में पता चलता है कि औरत बिलकुल ठीक है और उस के पति में ही शारीरिक कमी है. अत: डाक्टरों को चाहिए की बीवी के साथसाथ उस के शौहर की भी जांच करें और साफ बताएं कि कमी किस में है. मर्द खुद की जांच न करा कर और शादियां करते जाते हैं. आज मैडिकल साइंस और इलाज इतना विकसित हो चुका है कि कोई भी दंपती संतान सुख से वंचित नहीं रह सकता है.
डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि स्पर्म डोनेशन का बढ़ता चलन समाज के लिए बहुत ही फायदेमंद है. इस से जहां बेऔलाद मियांबीवी को औलाद की चाह में बेवजह भटकना नहीं पड़ता, वहीं वे ठगों के शिकार होने से भी बच जाते हैं. अगर डोनर स्पर्म के बारे में अच्छे तरीके से जागरूकता मुहिम चलाई जाए, तो इस से समूचे समाज की बेहतरी हो सकती है.
VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट
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