नई तकनीकों पर आधारित नई दवाओं और नए उपचारों से लाखों जानें तो बचाई जा रही हैं पर उन के बढ़ते दाम की चिंता की बात भी उठ रही है. सरकार ने डाक्टरों और अस्पतालों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है कि वे ओवर चार्ज न करें पर यह एक ऐसी समस्या है जिस का हल आसान नहीं है.

नई दवाओं, नए उपचारों और जांच की नई मशीनों की कीमत वाकई बहुत ज्यादा है, क्योंकि इन को खोजने में बहुत समय, पैसा और शक्ति लगती है. कंपनियां वर्षों तक पहले जानवरों पर और फिर आदमियों पर इन का ट्रायल करती हैं. इस दौरान वैज्ञानिक वेतन व सुविधाएं तो पाते ही हैं, बहुत बार बीच में ही दवा या मशीन का विकास छोड़ना पड़ता है, जिस से लगाया गया पैसा बेकार जाता है. इस की कीमत असल में मरीज से ही वसूल की जा सकती है, क्योंकि दवा, उपचार या नई बनने वाली मशीन का लाभ तो मरीजों को ही मिलता है.

दुनिया भर के अस्पतालों का खर्चा भी बढ़ गया है. उन के भवन 5 सितारा होटलों की तरह होने लगे हैं ताकि एक तरफ इन्फैक्शन कम हो तो दूसरी ओर मरीजों और उन के रिश्तेदारों को यह न लगे कि वे किसी जेल में आ गए हैं, जहां से रास्ता केवल मृत्यु की ओर जाता है. अस्पतालों को चलाने के लिए हर जने का प्रशिक्षित होना जरूरी है और यह काम महंगा और धैर्य वाला होता है. दर्द से कराहते मरीजों को रोजरोज देखना और उन्हें मौत के मुंह से निकाल कर लाना आसान नहीं होता. डाक्टरों और सपोर्ट स्टाफ का मानसिक संतुलन भी बना रहे यह खर्चीला काम है.

भारत सरकार ने नैशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथौरिटी गठित की है, जो अस्पतालों के खर्चों पर नजर रखने के लिए बनाई गई है पर इस तरह की अंकुश रखने वाली एजेंसियां अस्पतालों का खर्च बढ़ाती हैं. उन्हें लगाई गई पूंजी पर तो लाभ कमाना ही है खर्च भी पूरे करने हैं. एजेंसियां यदि सख्त हुईं तो अस्पताल वे इलाज देंगे ही नहीं जो महंगे हैं पर जिन से जान बच सकती है. मरीजों की जेब तो बचेगी पर जान चली जाएगी.

इस का उपाय यह है कि सरकार जनता से जमा किए टैक्स से चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध कराए पर यह फार्मूला दुनिया भर में असफल हुआ है. चूंकि इस में मरीज पैसा नहीं देता, इसलिए सरकारी अस्पताल या सरकार से पैसा पाने वाले निजी क्षेत्र के अस्पताल व डाक्टर लापरवाह हो जाते हैं. मरीज भी बेमतलब का इलाज कराने चले आते हैं.

आदमी की जान बहुत कीमती है पर इसे बचाने की कीमत भी बहुत है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा सरकार ने इस की भरपाई करने की कोशिश की थी पर अब नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसे खत्म कर रहे हैं. दुनिया भर के कई देशों में हैल्थ सेवाएं जो सरकारी थीं, धीरेधीरे गैरसरकारी बनाई जा रही हैं, जिस से मरीजों को इलाज कराना महंगा पड़ रहा है. पर इस का उपाय क्या है?

चिकित्सा का खर्च किसी को तो वहन करना ही होगा. मरीज करे तो अच्छा है. रैग्युलेटरी अथौरिटी हो पर रैग्युलेशन के नाम पर शोध का गला न घोट दिया जाए.

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