35 वर्षकी आयु में युवा अब बचत कम कर रहे हैं और अपनी सारी कमाई आज ही शौकों में पूरा कर रहे हैं. कोविड से यह खर्चीलापन बड़ गया है क्योंकि अकेले रहने वाला अब आज की सोचते हैं, कल का न जाने क्या होगा? जिस के निकट संबंधी कोविड की मौत के शिकार हो गए हैं, उन में तो नेगेटिविजन भर गया कि कल का क्या करूं, कल की बचत क्यों करें.

यह खतरनाक स्थिति है. बिमारी को तो असल में बचत की आदत डालनी चाहिए क्योंकि महामारी के दिनों में जब कमाई बंद हो जाए और इलाज पर खर्च बढ़ जाए तो अपनी बचत ही काम आएगी, कोविड के दिनों में तो बहुत सी जानें इसलिए गई कि इलाज, औक्सीजन, वैंटीलेटर, हास्पिटल के लायक पैसे बचे  नहीं थे.

दिक्कत यह है कि कोविड की आइसोलेशन ने लोगों को मोबाइल, लैपटौप का गुलाम बना दिया जो बारबार नया खरीदने को उकसाते रहते हैं. मोबाइल और लैपटौप पर औन लाइन जानकारी में विज्ञापन भरे ही नहीं हैं, वे पढऩे के दौरान बारबार बीच में आते हैं और अब जब तक एड फ्री साइट का पैसा न दिया गया हो, वे उन चीजों को बेचते हैं जो जरूरत की नहीं है जिन के दामों के बारे में कहीं से चैक नहीं किया जा सकता.

औफ लाइन बाजार में खरीदी का एक फायदा है कि दुकानदार अपनेआप में एक फिल्टर होता है. वह वही सामान रखता है जो ठीक है और जिसकी शिकायत करने के लिए अलग दिन ग्राहक फिर घर आ कर खड़ा न हो जाए. औफ लाइन बाजार में खरीदारी करने के लिए आनेजाने में लगने वाले समय और पैसे का एक फिल्टर होता है जो बेकार की खरीदी को रोकता है. दुकान से सामान ढो कर घर तक ले जाने के डर का एक और फिल्टर लग जाता है. अगर सामान अच्छा ओर लोकप्रिय हो तो आसपास की कई दुकानों पर वही सामान मिलने लगता है और दुकानदार मुनाफा कम कर के कंपीटिशन में सस्ता बेचते हैं.

औन लाइन खरीद में कार्ड से पेमेंट करते समय लोग भूल जाते है कि इस माह वे कितने का सामान खरीद चुके हैं. उन को छोटी चीजें याद ही नहीं रहती. पेमेंट करने के बाद डिलिवरी का समय देर से होता है तो नौंटकी दिया राम भूल जाना बड़ी बात नहीं होती. जब सामान मिलता है तो वह एक तरह से गिफ्ट लगता है और पैकेंट उसी तरह खोला जाता है मानो किसी ने गिफ्ट दिया हो.

इस मैंटिलिटी का नतीजा है कि आज के युवाओं के पास पैसा नहीं बना रहे. यूरोप, अमेरिका में सैकड़ों युवा बड़े शहरों से अब मातापिता के पास फिर शिफ्ट हो रहे हैं जहां रहना खाना मुफ्त मिलता है. जेनरेशन गैप के विवाह तो होते हैं पर अकेले मातापिता भी खुश रहते है. उन्हें दिक्कत तब होती है जब खाली हाथ बच्चे शादी के बाद आ धमकते हैं और फिर ससुरदामाद या सासबहू का विवाद शुरू हो जाता है. यदि समय रहते बचत की जाती तो यह नौबत नहीं आती.

युवाओं की पढऩे की तेज से कम होती आदत और बेबात में पिंगपिग करते मैसेज उन्हें किसी भी बात को गंभीरता से करने का समय नहीं देते. हर वह व्यक्ति जो खाली है, जब मर्जी किसी को हाई का मैसेज डाल देता है, कोई चीज फौरवर्ड कर देता है. मोबाइल हाथ में आते ही विज्ञापन भी टपकने लगते हैं और लाख कोशिश करो वे हटते नहीं है.

खर्चीले युवा न केवल एक पूरी पीढ़ी को भूखा मारेंगे, वे डैल्लेपमैंट को रोक लगा देंगे. दुनिया का विकास बचत पर हुआ. रोमन युग में सडक़ें और पानी लाने के एक्वाडक्ट बने थे ये आम लोगों की बचत के कारण. युवाओं की प्रौडक्टिविटी जब ज्यादा होती है तब वे ज्यादा खर्चा कर बचत नहीं करेंगे तो पूरी वल्र्ड इकौनौमी का कचरा बैठ जाएगा. यह कोविड और रूसी हमले की तरह है जो खतरनाक नतीजे दे सकता है.

अपना समय बचत बेकार का सामान खरीदने में न लगाएं. कुछ बनाए और उसे बनाने के लिए पढ़ कर कुछ जानकारी लें. सुखी आज और कल के लिए बचत ही सब से ज्यादा जरूरी है.

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