प्यार की राह पर चलने वाली 27 वर्षीय श्रद्धा का जो हश्र उस के प्रेमी आफताब ने किया वह एक नाकाबिले माफी जुर्म है जिस के लिए वह कतई हमदर्दी नहीं बल्कि सख्त से सख्त सजा का हकदार है ऐसा दुर्दांत और जघन्य हादसा अकसर नहीं होता, लेकिन जब हो गया तो हर किसी को दुख हुआ और सभी ने सड़क हादसों की तर्ज पर कुछ न कुछ कहा, लेकिन परंपरावादी लोग यही कहते नजर आ रहे हैं कि इस से तो अच्छा है कि प्यार किया ही न जाए और किया जाए तो पेरैंट्स की इजाजत ले ली जाए. पर यह कहना कम है, प्रमुखता से हल्ला यह मचाया गया कि हिंदू लड़कियों को मुसलिम लड़कों से प्यार नहीं करना चाहिए नहीं तो न केवल उन के बल्कि सनातन धर्म और संस्कृति के 35 टुकड़े होना तय है.सभ्य समाज के लिए कलंक मामला क्या है और क्यों व कैसे हुआ इस से पहले तरस उन लोगों की मानसिकता पर खा लेना जरूरी है जो इस बीभत्स कांड को लव जिहाद कहते लड़कियों को प्यार के रास्ते पर न चलने की नसीहत दे रहे हैं क्योंकि श्रद्धा हत्याकांड में भी अपना धर्म उन्हें खतरे में नजर आ रहा है. जाने क्यों और कैसे तंदूर कांड में मारी गई नैना साहनी के बाद यही धर्म सलामत बच गया था तब क्यों लड़कियों को नसीहतें धर्म गुरुओं ने नहीं दी थीं और न ही मीडिया वालों ने यह कहा था कि हमें शिकायत नैना से भी है.

सार यह कि अगर आफताब की जगह कोई आकाश या सूरज होता तो हल्ला इतना नहीं मचाया जाता और सनातन खतरे में नहीं पड़ता. ठीक इसी तरह श्रद्धा की जगह सलमा या सकीना होती. तो भी इसे हादसा मानने की कोई वजह नहीं होती. कितनी हास्यास्पद बात है कि अगर प्यार में हिंदू लड़का हिंदू लड़की की हत्या करे या मुसलिम लड़का मुसलिम लड़की की हत्या करे तो कोई आसमान नहीं फटता मानो यह उन का हक हो.

धर्म के ठेकेदार दरअसल में प्यार को कोस रहे हैं क्योंकि इन की दुकान की बुनियाद ही युवाओं की आजादी के विरोध से पड़ी है. दूसरे क्या भारतीय पेरैंट्स इतने उदार हो गए हैं कि संतान खासतौर से लड़की अगर कहेगी कि मु?ो फलां से प्यार हो गया है तो क्या ये ?ाट से उस की भावनाओं का सम्मान करते हुए शादी के लिए राजी हो जाएंगे?

नहीं पेरैंट्स हजार बातें करेंगे, सैकड़ों नुक्स जातिधर्म और गोत्र के निकालेंगे और आखिर में मुंह लटका कर कहेंगे कि तुम्हें कोई हक नहीं कि तुम हमारी प्रतिष्ठा और खुशियों का गला घोंट कर अपनी मरजी से शादी करो और घर बसाओ फिर जैसी तुम्हारी मरजी तुम जानो तुम्हारा काम जाने. किसी बुरे के हम जिम्मेदार नहीं होंगे.

अपवाद मामलों में ही ऐसा होता है कि पेरैंट्स बच्चे की खुशी और इच्छा पर तवज्जो देते जीवनसाथी के चुनाव पर खुले दिल से उस के फैसले का सम्मान करते हैं नहीं तो तादाद उन की  ज्यादा हैं जो हिंदी फिल्मों के मांबाप की तरह परवरिश की दुहाई देते संतान को इमोशनली ब्लैकमेल करने का पुराना हथकंडा इस्तेमाल करते हैं जो कभी कामयाब तो कभी नाकामयाब हो जाता है.

जिन मामलों में यह कामयाब होता है उन में ज्यादातर बेटी की जिंदगी दूभर होने का खतरा ज्यादा रहता है जो अपने अरमानों का गला घोंट कर पेरैंट्स जिस के गले बांध देते हैं उस के साथ बेमन से विदा हो जाती है. बेमन से इसलिए कि यह एहसास उसे रहता है कि वह शादी नहीं कर रही बल्कि पेरैंट्स के लिए त्याग, सम?ाता या सौदा कर रही है जो जन्म देने, परवरिश करने और शिक्षा दिला कर काबिल बनाने की कीमत है.

कौन है श्रद्धा

कौन है श्रद्धा लेकिन श्रद्धा भी दूसरी कई जागरूक युवतियों की तरह इस पचड़े में नहीं पड़ी इसीलिए उसे कोसने की एक बड़ी वजह कुछ लोगों को मिल गई जैसे उस की हत्या की इकलौती वजह पेरैंट्स की अनदेखी ही हो और उस ने एक मुसलिम युवक से प्यार करने के गुनाह की सजा बेरहम तरीके से भुगती जबकि सच कुछ और है कि दरअसल में लिव इन में रह रहे लाखों कपल्स की तरह उस की और आफताब की पटरी आपस में नहीं बैठ रही थी. श्रद्धा की गलती प्यार करना नहीं थी बल्कि प्यार और लिव इन में जरूरी सम?ादारी और सावधानियां न रखना थी.

श्रद्धा का पूरा नाम श्रद्धा वाकर है. वह महाराष्ट्र के पालघर की रहने वाली थी. आम मध्यवर्गीय परिवारों की युवती की तरह वह भी पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने लगी थी. मास मीडिया में मास्टर डिगरी लेने वाली श्रद्धा को उस के सहपाठी उसे 4 जी गर्ल कहते थे. एक मल्टीनैशनल कंपनी के कौल सैंटर में मुंबई के मलाड इलाके में नौकरी कर रही बिंदास, हंसमुख  खूबसूरत और आकर्षक इस युवती की जानपहचान 2019 में अपने सहकर्मी आफताब से हुई जिस का पूरा नाम आफताब अमीन पूना वाला है.

यह जानपहचान जल्द ही प्यार में बदल गई और दोनों साथ जीनेमरने के वादे करते शादी के सपने देखने लगे. श्रद्धा को उम्मीद यह थी कि उस के पेरैंट्स इस शादी के लिए हां कर देंगे क्योंकि वे अपनी बिटिया को बहुत चाहते थे.

श्रद्धा के इस भ्रम या विश्वास कुछ भी कह लें को ?ाटका उस वक्त लगा जब पेरैंट्स ने सख्ती से मना कर दिया कि नहीं यह शादी नहीं हो सकती क्योंकि लड़का मुसलमान है. इस से श्रद्धा को जाहिर है दुख हुआ और वह निराश भी हुई. उस ने मांबाप को मनाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन बात नहीं बननी थी सो नहीं बनी. तय है इसलिए कि पेरैंट्स एक मुसलिम युवक को दामाद स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. इस मुकाम पर 2 ही बातें मुमकिन होती हैं. पहली तो यह कि मांबाप बेटी की बात मानते उसे अपनी जिंदगी जी लेने दें या फिर बेटी अपने प्यार की आहुति देते हुए मांबाप की बात मान ले.

श्रद्धा और उस के पेरैंट्स दोनों ही अपनी जिद पर अड़े रहे और धीरेधीरे उन के बीच रिश्ते की गरमाहट और बातचीत तक खत्म होने लगी. मांबाप की सम?ाइश की तह में अपना अहम और प्रतिष्ठा ज्यादा थी तो बेटी की जिद में भी नादानी और बेवकूफी कम नहीं थी जिस ने एक बर्बर हत्याकांड को जन्म दिया.

कौन है आफताब

मुंबई के ही मीरा रोड स्थित एक रिहायशी अपार्टमैंट में दीवाली के दिनों में पूना वाला परिवार वसई से रहने आया था. अपार्टमैंट्स में कौन रहने आया, कौन गया इस से आजकल कोई मतलब नहीं रखता जो महानगरीय संस्कृति का ही एक हिस्सा है. लोग ट्रक से सामान उतरते और चढ़ते सहजता से देखते रहते हैं. मुंबईया माहौल में पैदा हुए और पलेबढ़े आफताब का परिवार मीरा रोड शिफ्ट हो गया तो किसी ने ज्यादा नोटिस नहीं लिया और जिन्होंने लिया उन्हें यही सम?ा आया कि इस परिवार में 4 ही लोग हैं. मांबाप और 2 जवान बेटे (दूसरा आफताब का छोटा भाई) ये लोग ठीकठाक हैं, लेकिन बोलते ज्यादा हैं.

पेशे से फोटोग्राफर आफताब की डेटिंग ऐप पर श्रद्धा से पहचान और फिर कुछ मुलाकातों के बाद प्यार हो जाने पर वह भी हसीन सपने देखने लगा. लेकिन शादी की इजाजत उस के पेरैंट्स भी नहीं दे रहे थे इसे ले कर वह श्रद्धा की तरह तनाव में नहीं था यानी आने वाली जिंदगी को ले कर गंभीर नहीं था. श्रद्धा की तरह वह भी मध्यवर्गीय परिवार से था और महत्त्वाकांक्षी था. यह और बात है कि यह महत्त्वाकांक्षा हीनता और कुंठा में बदलती जा रही थी जिसे वह महसूस तो रहा था, लेकिन सम?ा नहीं पा रहा था.प्यार पर विरोध मुंबई महानगर है जहां युवाओं के इश्क और मुहब्बत के सीन कहीं भी देखे जा सकते हैं पार्कों, होटलों, बीच, सड़क और लोकल ट्रेनों में भी प्यार करते युवा इफरात से नजर आते हैं. इन्हीं में एक नाम श्रद्धा और आफताब का शुमार हो गया था जो अपने प्यार को शादी की मंजिल तक ले जाना चाहते थे इसलिए दोनों ने किसी से कुछ छिपाया नहीं था, लेकिन दोनों के परिवारजन इस के लिए तैयार नहीं थे और घर वालों की इच्छा के बाहर जा कर शादी करने की इन की हिम्मत नहीं पड़ रही थी, इसलिए एक दिन दोनों दिल्ली भाग गए. जहां जा कर पहले वे पहाड़गंज के एक होटल में रुके फिर उन्होंने महरौली इलाके में किराए का मकान ले लिया और बाकायदा पतिपत्नी की तरह रहने लगे, लेकिन उतने प्यार और शिद्दत से नहीं जितना कि प्यार होने के कुछ दिन बाद मुंबई में रहते थे.

ऐसा नहीं कि महरौली में रहते प्यार एकदम कम हो गया था बल्कि गलती दोनों तरफ से और बराबरी से हो रही थी. श्रद्धा चाहती थी कि वे दोनों जल्द से जल्द शादी कर लें पर आफताब उसे टाल रहा था. शायद ही नहीं तय है इस जिद के पीछे श्रद्धा का सोचना यह था कि एक बार शादी हो जाए तो उसे तो पहचान मिलेगी ही साथ ही समाज और परिवार वाले भी रिश्ते पर मुहर लगा देंगे क्योंकि अमूमन होता यही है कि लड़कालड़की लिव इन में रहते शादी कर लेते हैं तो शादी पर एतराज जताते रहने वाले पेरैंट्स भी ?ाक ही जाते हैं. महरौली शिफ्ट होने के बाद आफताब शादी से नानुकुर करने लगा तो श्रद्धा को चिंता होना स्वाभाविक बात थी. बात यहीं से बिगड़ी. श्रद्धा चाहती थी कि आफताब तुरंत शादी कर ले, लेकिन आफताब कुछ और ही सोच रहा था.

बड़ी भूल

लिव इन जिन शर्तों पर होती है उन में से एक खास यह है कि कोई भी एक पक्ष दूसरे पर बेजा हक नहीं जमाएगा पर श्रद्धा खुद को आफताब की ब्याहता सम?ाने की भूल करने के साथ दूसरी भी कई गलतियां कर रही थी. लक्ष्मण सहित वह अपने कुछ दूसरे फ्रैंड्स के संपर्क में भी थी, लेकिन मांबाप से तो जैसे उस का नाता टूट ही गया था. बिना डोली में विदा हुए ही वह उन के लिए पराई हो चुकी थी.

जाहिर है उसे यह सम?ा आ गया था कि बिना किसी ठोस वजह के आफताब शादी की बाबत उसे टरका रहा है. इस से वह और गुस्से और असुरक्षा से भर उठती थी क्योंकि अब दुनिया में आफताब के सिवा उस का कोई रह भी नहीं गया था. बात इस लिहाज से सच थी कि 3 साल एक मुसलिम युवक के साथ लिव इन में रहने के बाद उसे कोई नहीं स्वीकारता. उस तरफ के सारे दरवाजे उस के लिए बंद हो चुके थे.

जिद्दी श्रद्धा को अब पेरैंट्स से बात करने में भी हिचक होने लगी थी क्योंकि धीरेधीरे ही सही वे सही और वह गलत साबित होने लगी थी. इस वक्त वह कोई जौब भी नहीं कर रही थी इसलिए भी आक्रामक होने लगी थी. खर्चों को ले कर भी आए दिन दोनों ?ागड़ते रहते थे कि पैसा कौन खर्च करे. नौबत तो यहां तक आ गई थी कि रोज की सब्जीतरकारी खरीदने के लिए भी चिकचिक होने लगी थी.

नशे का आदी आफताब

उधर आफताब को श्रद्धा की यह कमजोरी पकड़ आ गई थी कि वह चारों तरफ से टूट चुकी है लिहाजा उस ने श्रद्धा पर हाथ उठाना भी शुरू कर दिया था. नशे के आदी इस नौजवान ने यह नहीं सोचा कि श्रद्धा ने उस के भरोसे पर दुनिया को ठुकरा रखा है. मारपीट और कलह अब रोजरोज की बात हो चली थी. लगता ऐसा था कि अपनेअपने हिस्से की प्यार भरी जिंदगी वे जी चुके हैं और अब तो दुश्मनी निभा रहे हैं.कसाई बना आशिक दुश्मनी इस हद तक बढ़ गई थी कि आफताब रोज श्रद्धा की पिटाई करने लगा था. इतना ही नहीं वह उस के जिस्म पर जलती हुई सिगरेटें भी दागने लगा था जैसे श्रद्धा का शरीर एशट्रे हो. श्रद्धा हर ज्यादती सहन कर रही थी, लेकिन जाने क्यों हैवान बनते जा रहे आफताब को छोड़ने को तैयार नहीं थी. अपने साथ हो रही हैवानियत का जिक्र उस ने लक्ष्मण सहित कुछ और दोस्तों से भी किया था. उसे यह भी लगने लगा था कि आफताब उसे मार डालेगा.

और फिर 18 मई को ऐसा हो भी गया.

इस दिन भी आफताब गांजे का नशा कर आया था. दोनों में फिर इस बात को ले कर कहासुनी हुई कि मुंबई से दिल्ली तक सामान ढुलाई के 20 हजार रुपए कौन दे. इस के बाद श्रद्धा ने जैसे ही फिर शादी करने की बात कही तो आफताब कसाई बन गया. पहले तो उस ने श्रद्धा का गला घोंट कर उस की हत्या की, फिर धारदार चाकू से इत्मीनान से लाश के 35 टुकड़े किए.

इस काम में उसे 2 दिन लगे. यह कितना प्रीप्लान्ड मर्डर था इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आफताब ने लाश के टुकड़े रखने के लिए 300 लिटर का फ्रिज खरीदा था और उस की पेमैंट भी श्रद्धा के पैसों से की थी. उस ने 55 हजार रुपए श्रद्धा के अकाउंट से निकाले थे. हत्या करने के बाद भी नशे के लिए वह लगातार बियर पीता रहा था.

बाथरूम में खून बहाने के बाद उस ने श्रद्धा की लाश के टुकड़े फ्रिज में करीने से जमाए और रोज 2-2 टुकड़े ले जा कर महरौली के जंगल में फेंकता रहा. यह आइडिया उसे क्राइम सीरियलों से मिला था. वह रोज फ्रिज में रखे श्रद्धा के शरीर के टुकड़े और खोपड़ी देखता था. फ्लैट में बदबू न आए इसलिए कमरों में खुशबूदार अगरबत्ती और रूम फ्रैशनर का इस्तेमाल करता था.

साफ दिख रहा है कि सभ्य समाज से साइको किलर आफताब का नाता टूट चुका था. खुद को सजा से बचाने के लिए वह जुर्म छिपाने के तमाम टोटके कर रहा था. मसलन श्रद्धा के सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ पोस्ट करना और उस के क्रैडिट कार्ड का बिल भरना वगैरह

शामिल हैं. बेटी की तलाश अब क्यों जब कई दिनों तक श्रद्धा से बात नहीं हुई तो पिता विकास मदन वाकर उस की तलाश में निकल पड़े. पहले मुंबई फिर बैंगलुरु और फिर दिल्ली की खाक उन्होंने छानी, लेकिन श्रद्धा उन्हें कहीं नहीं मिली. मिलती भी कैसे कहीं होती तो मिलती. उन्होंने महरौली थाने में भी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई तो पुलिस इन्वैस्टिगेशन में आफताब फंस गया. पुलिस के सामने उस का एक यह ?ाठ भी नहीं चला कि श्रद्धा तो ?ागड़ा कर घर छोड़ कर चली गई कहां गई यह मु?ो नहीं मालूम.

अहिस्ताअहिस्ता पुलिस ने उस से उंगली टेढ़ी कर सब उगलवा लिया. आफताब ने भी खुद को कानून के फंदे में फंसता देख इंग्लिश में सच उगल दिया कि यस आई किल हर. श्रद्धा के पिता को मालूम था कि वह आफताब के साथ रह रही है 2021 में वह मां की मौत के बाद घर गई थी, लेकिन बाप बेटी के बीच खटास कम नहीं हुई. विकास ने कुछ दिन पहले उसे ताना सा मारते आफताब के बारे में पूछा भी था जिस का सीधा और सच्चा जवाब श्रद्धा ने देना जरूरी नहीं सम?ा था क्योंकि पिता उसे अपनाने नहीं बल्कि अपमानित करने आए थे कि देखो हमारी बात न मानने पर तुम्हारी क्या दुर्गति हो रही है.

असल में घर छोड़ते वक्त श्रद्धा ने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि अब मैं 25 साल की हो गई हूं और अपने फैसले खुद ले सकती हूं. तब तक श्रद्धा को उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल आफताब शादी के लिए राजी हो ही जाएगा.

अब हादसे के बाद विकास व्यथित हो कर कह रहे हैं कि श्रद्धा अगर उन की बात मान लेती तो यह नौबत नहीं आती. पर यह वे नहीं सोच पा रहे कि अगर वे ही श्रद्धा की बात मान लेते तो भी यह नौबत नहीं आती. बहरहाल, श्रद्धा अब इस दुनिया में नहीं और आफताब पुलिस हिरासत में रहते अपना जुर्म स्वीकार करते जो बताता रहा उसे मीडिया ने श्रद्धा और आफताब से जुड़ी हर बात को एक धमाके की तरह पेश किया ताकि लोग उन का चैनल देखते रहें. इस कांड को धारावाहिक की तरह चलाया और दिखाया गया ताकि टीआरपी बढ़े.कुछ सबक कुछ सावधानियां

श्रद्धा की गलती आफताब से प्यार करना तो कतई नहीं थी, लेकिन उस की पहली बड़ी गलती लगातार जल्दबाजी में फैसले लेने की थी जिस की कीमत उसे जान दे कर चुकानी भी पड़ी. अगर वक्त रहते वह ठंडे दिमाग से सोचती तो इस हादसे से खुद को बचा भी सकती थी. ये गलतियां आए दिन लिव इन में रहने वाले करते हैं और बाद में पछताते नजर आते हैं. खासतौर से लड़कियों को तो इन बातों पर काफी सोच सम?ाकर फैसला लेना चाहिए.

-पैसा जीने के लिए अहम है इसलिए घर से अलग होने और लिव इन में रहने के लिए खुद के पास खासे पैसों का इंतजाम कर लेना चाहिए. सेविंग में सालभर के खर्च का पैसा होना चाहिए. यह फंड अपने पार्टनर पर उजागर करना जरूरी नहीं क्योंकि कभी भी अलगाव की नौबत आ सकती है. ऐसे में जमा पूंजी ही आप का सब से बड़ा सहारा और आत्मविश्वास रहेगी.

– प्यार कितना ही ज्यादा हो अपने पार्टनर से घर खर्च की बाबत यह पहले तय कर लेना चाहिए कि कौन किस काम पर कितना खर्च करेगा.

-प्यार में अंधे हो कर फैसले लेने से बचना चाहिए. जिंदगी जज्बातों से नहीं बल्कि व्यावहारिकता से चले तो ज्यादा सफल रहती है. लिव इन की जिंदगी तो वैसे भी दुधारू तलवार होती है. पार्टनर का ?ाकाब किसी दूसरी की तरफ होता दिखे तो उस पर रोकटोक ज्यादा कारगर साबित नहीं होती यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता लिव इन में अहम होती है.

-पार्टनर अगर किसी नशे का आदी हो तो उस के साथ ज्यादा दिनों तक चैन से रहना मुमकिन नहीं रह जाता. अगर वह नशे की लत न छोड़ पाए तो उसे ही छोड़ देना बेहतर होता है साथ ही खुद भी नशे से बच कर रहना चाहिए.

– अगर शादी करने की शर्त पर लिव इन में रहा जा रहा है तो शादी की डेट लाइन तय होनी चाहिए. इस के बाद भी पार्टनर शादी से नानुकुर करने लगे तो उस पर ज्यादा दबाव बनाने से

कोई फायदा नहीं होता. फिर उस के सामने यह रोना रोने के भी कोई माने नहीं रह जाते कि देखो तुम्हारे लिए मैं ने सबकुछ छोड़ दिया, सबकुछ तुम्हें सौंप दिया. अगर वह शादी के अपने वादे से मुकर रहा है तो निश्चित ही वेबफा है और वेबफाओं के साथ हंसीखुशी जिंदगी नहीं गुजारी जा सकती.

-सैक्स संबंध लिव इन में आपसी रजामंदी से बनते हैं, इसलिए इन्हें एहसान की तरह पार्टनर पर न थोपें क्योंकि इस में आप की सहमति भी शामिल थी. कोई भी बौयफ्रैंड इस आधार पर शादी के लिए वाध्य नहीं होता कि उस से आप के सैक्स संबंध रहे हैं.

– लिव इन में एकदूसरे की जिंदगी में आदतों और इच्छाओं पर नियंत्रण की एक सीमा होती है जो दोनों जानते हैं. इसलिए इस लक्ष्मणरेखा को न खुद क्रौस करें और न ही पार्टनर को यह अधिकार दें.

– किसी भी मुद्दे पर विवाद हो और कुछ कोशिशों के बाद भी न सुल?ो तो बजाय कलह और तूतू, मैंमैं करने के शांति से अलग हो जाना ज्यादा अच्छा रहता है और विवाद तभी होते हैं जब दोनों एकदूसरे की आजादी में दखल देने लगते हैं, एकदूसरे के विचारों से सहमत नहीं होते और अपने हिस्से के खर्चों से बचने की कोशिश करने लगते हैं.

– किसी के भी साथ कुछ ही दिन सही गुजारने के बाद किसी भी वजह से अलग होने का फैसला भावनात्मक रूप से तकलीफदेह हो सकता है, लेकिन यकीन मानें अगर अलग न हुआ जाए तो यह काफी विस्फोटक साबित होता है जैसाकि श्रद्धा और आफताब के मामले में हुआ.

कोई मिल गया इस का यह मतलब नहीं कि बाकी लोगों से रिश्ते खत्म हो गए. लिव इन अगर शादी न हो तो एक अस्थायी व्यवस्था है, इसलिए परिवारजनों और भरोसेमंद दोस्तों से संपर्क बनाए रखना अच्छा रहता है. अपने पार्टनर की भी बात उन से करवाते रहना चाहिए.

इन की प्रौब्लम धर्म या जाति नहीं थी बल्कि उस की जड़ में पैसे की कमी थी. शादी पर दोनों की सहमति न बनने ने इस में घी डालने का काम किया. इस हादसे से जुड़े कुछ सवालों के जबाब तो विशेषज्ञ मनोविज्ञानी भी नहीं दे पाएंगे कि क्यों श्रद्धा शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहने के बाद भी आफताब से चिपकी रही और क्यों आफताब ने उसे इतने डरावने तरीके से मार डाला, जबकि इस का अंजाम वह जानता था. साफ दिख रहा है कि चाहे लिव इन हो या शादीशुदा जिंदगी मतभेद अगर दूर न हों तो अलग हो जाना सब से बेहतर रास्ता और फैसला होता है ताकि प्यार के रास्ते में कोई हादसा न हो.

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