जनवरी में जारी सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकौनोमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है और 2018 में इस बढ़ोतरी में और तेजी आई है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2018 में 1 करोड़ 90 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोने पड़े. पिछले आम चुनावों में रोजगार को मुख्य मुद्दा बनाने वाली भाजपा सरकार इन 5 सालों में देश के बेरोजगारों को कितना रोजगार दे पाई, जान कर हैरान रह जाएंगे आप…

2014में हुए आम चुनावों में प्रचार के वक्त नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने रोजगार को मुद्दा बनाया था. हर साल 2 करोड़ से अधिक रोजगार के अवसरों के निर्माण के वादे के तहत प्रधानमंत्री ने पिछले 4 वर्षों में कई योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत की. पिछले साल अगस्त में मोदी ने दावा किया था कि बीते वित्त वर्ष में औपचारिक क्षेत्र में 70 लाख रोजगार का निर्माण हुआ. मगर जनवरी में जारी सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकौनोमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है और 2018 में इस बढ़ोतरी में और तेजी आई है.

राजनीति में महिलाएं आज भी हाशिए पर

इस रिपोर्ट के अनुसार 2018 में 1 करोड़ 90 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोने पड़े. मोदी ने 2016 में प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत 15,000 रुपए से कम वेतन पर रखे जाने वाले नए कर्मचारियों का 12% भविष्य निधि अनुदान (ईपीएफ) केंद्र सरकार वहन करेगी. औल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सचिव तपन सेन ने बताया कि देशभर में कम से कम 40% योग्य कर्मचारी इस योजना के दायरे से बाहर हैं. टिकाऊ रोजगार नहीं अप्रैल, 2015 को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की घोषणा की. इस के तहत लक्षित 10 लाख उद्यमों को कर्ज दिया जाना था. लेकिन सार्वजनिक क्षेत्रों के आंकड़ों के अनुसार इस योजना के तहत दिया गया अधिकांश कर्ज डूब गया है.

बोल्ड अवतार कहां तक सही

इस योजना के तहत हाल तक 3 करोड़ रुपए से अधिक कर्ज दिया गया है. इस का आधा कर्ज तो केवल 2018 में दिया गया. लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने बताया कि मुद्रा योजना के तहत डूबा कर्ज 2018 में बढ़ कर 7,200 करोड़ रुपए हो गया है. महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से मिली रिपोर्ट के अनुसार मुद्रा योजना के तहत दिया जाने वाला औसत कर्ज 30,000 रुपए है, जो इन व्यवसायों को टिकाने के लिए काफी नहीं है.

इसी प्रकार प्रधानमंत्री रोजगार निर्माण के तहत दिए गए कर्ज ने भी रोजगार के टिकाऊ अवसर बनाने में मदद नहीं की है. इस योजना के तहत यूनिटों को 25 लाख रुपए और व्यवसाय या सेवा उद्यमों को 10 लाख रुपए का कर्ज दिया जाता है. बैंगलुरु स्थिति अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के टिकाऊ रोजगार केंद्र के निदेशक अमित बसोले का कहना है, ‘‘इन योजनाओं का ज्यादातर ध्यान एकदम छोटे कारखानों पर रहा. ये छोटे कर्ज हैं और इन पैसों से लगाए जाने वाले रोजाना का खर्च निकाल सकते हैं लेकिन टिकाऊ रोजगार का निर्माण नहीं कर सकते.

स्मार्ट वाइफ : सफल बनाए लाइफ

‘‘भारत के बेरोजगारी संकट के लिए इस योजना के तहत स्वरोजगार को प्रोत्साहन देना पर्याप्त नहीं है. हमें कुछ बड़ा करने की आवश्यकता है. बड़े कर्ज और बड़े उद्योगों में पैसा लगाने की जरूरत है जो विस्तार और अधिक संख्या में कर्मचारियों को रखने में सक्षम हैं. शहरी और राज्य स्तर पर स्थानीय सरकारें जब तक आधारभूत संरचना और सुविधाओं का निर्माण नहीं करतीं तब तक केंद्रीय योजनाएं प्रभावकारी नहीं हो पाएंगी.’’

बढ़ती बेरोजगारी देश में अपना धंधा चलाने वाले दूसरों के लिए रोजगार का इंतजार नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे 80 फीसदी लोग खुद मासिक तौर पर 10,000 रुपए से कम कमाई कर रहे हैं. ये लोग दूसरों को रोजगार कैसे दे सकते हैं? 2015-16 के श्रम विभाग के रोजगार बेरोजगारी सर्वे के अनुसार देश के लगभग आधे मजदूर अपना रोजगार अकेले ही कर रहे हैं. भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध शोध परिषद की फैलो राधिका कपूर के अनुसार भारतीय संदर्भ में स्वरोजगार चिंताजनक बात है. स्वेच्छा से स्वरोजगार करना और मजबूरन करने में बहुत अंतर है और भारत में अधिकांश लोग मजबूरन ऐसा कर रहे हैं.

बेटों से आगे निकलती बेटियां

भारत में बहुत सा स्वरोजगार संकटकालीन रोजगार है. मोदी के उस दावे के संदर्भ में जिस में उन्होंने कहा था कि पकौड़े तलने वाला एक आदमी दिन में 200 रुपए से अधिक की कमाई करता है और इसलिए वह बेरोजगार नहीं है, ऐसे में कपूर की बात बहुत स्पष्ट हो जाती है. मोदी के इस दावे के जवाब में पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने पूछा था कि इस लिहाज से तो भीख मांगना भी एक काम है. मोदी ने 200 रुपए तो गिन लिए पर जिस दिन ग्राहक न आएं या बारिश, आंधी आ जाए या फिर वह खुद बीमार हो जाए तो क्या होगा नहीं गिना.

जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की कि 2022 तक ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ यानी स्किल इंडिया के तहत 40 करोड़ लोगों को प्रशिक्षण दिया जाएगा. लेकिन संसद की श्रम मामलों की स्थाई समिति की मार्च, 2018 की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी, 2016 में इस योजना के आरंभ से ले कर नवंबर 2018 तक योजना के तहत 33 लाख 93 हजार लोगों को प्रमाणपत्र दिए गए, जिन में से सिर्फ 10 लाख 9 हजार लोगों को काम मिला. विकास दर कम हुई कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के मुताबिक मार्च, 2018 से कुशल उम्मीदवारों की प्लेसमैंट दर 15% है, जो बेहद कम है.

ऐसी खबरें भी हैं कि सरकारी सब्सीडी प्राप्त करने के लिए इस योजना के लोग बोगस प्लेसमैंट कर रहे हैं. स्किल इंडिया के डेटा पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन को जांचने की कोई प्रामाणिक प्रक्रिया नहीं है और ये कौशल विकास केंद्रों द्वारा उपलब्ध आंकड़े हैं. नाम न बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया, ‘‘ऐसी भी व्यवस्था नहीं है जिस से जाना जा सके कि प्रशिक्षण दिया भी जा रहा है या नहीं.’’ मोदी की कर्णधार योजना के तहत लक्षित क्षेत्रों में हाल के दिनों में बेरोजगारी में बढ़ोतरी देखी गई है.

मोदी ने 2014 में ‘मेक इन इंडिया’ का आरंभ भारत को वैश्विक डिजाइन और विनिर्माण का केंद्र बनाने के उद्देश्य से किया था. मगर पिछले 4 सालों में इस क्षेत्र ने कोई विकास नहीं किया है. श्रम ब्यूरो सर्वे के अनुसार अप्रैल और जून 2017 की तिमाही में इस क्षेत्र में 87,000 नौकरियां खत्म हो गईं. एमएसएमई मंत्रालय के अनुसार कर्ज योजना के अंतर्गत रोजगार और लाभ में 2014 से कमी आई है. उत्पादन और निर्यात में 24 से 35% की गिरावट पिछले 4 सालों में रिकौर्ड की गई है.

हाशिए पर रोजगार गारंटी कानून उत्पादन क्षेत्र में कागजी खानापूर्ति, इंस्पैक्टर राज, नियमों, कानूनों के पचड़ों का समाधान न कर सकने के चलते मेक इन इंडिया फेल हो गया. दुनिया का बाजार अभी मंदी से बाहर नहीं निकला है, इसलिए भारतीय निर्यात भी हद से आगे नहीं जा सकता. हमें घरेलू बाजार पर ध्यान देना चाहिए. सीएमआईई की रिपोर्ट में महिला मजदूरों की घटती तादाद पर चिंता जताई गई है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2018 में ज्यादातर महिलाओं ने खासकर 40 से कम या 60 से अधिक आयु की दिहाड़ी और खेतों में मजदूरी करने वाली ग्रामीण महिलाओं ने काम खोया.

उद्यमशीलता और स्वरोजगार पर जोर देने के चलते महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून हाशिए पर चला गया जो एक ऐसा सरकारी कार्यक्रम था, जिस में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी थी. स्वरोजगार मनरेगा योजना की कीमत पर कतई नहीं होना चाहिए. -निलीना एम एस द्य

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...