पढ़ेलिखे और नेता भी शामिल हैं

यह किस्सा है भूपेंद्र सिंह चूडास्मा का, जो गुजरात के शिक्षा मंत्री हैं और आत्माराम परमार, जो राज्य के सामाजिक न्याय मंत्रालय का जिम्मा संभाले हैं, दोनों पिछले दिनों अचानक सुर्खियों में आए. वजह थी कि वह वीडियो वायरल हो गया, जिस में एक तांत्रिक अपना कारनामा दिखा रहा था और जनता ही नहीं, बल्कि गुजरात के ये दोनों मंत्री भी उस नजारे को देख रहे हैं.

भक्ति और पूजा के बीच लोगों में अंधविश्वास इस कदर फैला हुआ है जिस की कोई सीमा नहीं.

विज्ञान के युग में भी अंधविश्वास पूरी तरह लोगों पर हावी है. लोग सचाई के विपरीत बाबाओं के चक्कर में पड़ कर कुछ भी कर रहे हैं. कोई गुरदे की पथरी निकलवा रहा है, तो कोई पेट में कीलें होने का दावा करते तांत्रिक से उन का इलाज करवा रहा है. इन बातों को सुन या देख कर सामने वाले व्यक्ति की बुद्धि पर तरस आता है. अगर भगवान का नाम लेने या पंडेपुजारी के पास जाने और पूजा करने से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, सुखसमृद्धि मिल जाती है तो दुनिया में इतना दुख ही क्यों होता है.

रा      धेराधे… राधेराधे… राधेराधे… जय श्रीराम… जय श्रीराम… जय श्रीराम… रमाकांत पूरी श्रद्धा के साथ भक्ति में लीन थे. पूरी मंडली साथ में घंटी भी बजा रही थी. ये आवाजें बच्चे को पढ़ने नहीं दे रही थीं. वह बारबार जा कर अपनी मां से कहता, ‘‘मां प्लीज पापा को बोलो ना कि सब लोग थोड़ी हलकी आवाज में पूजा करें. मेरा कल बोर्ड का पेपर है और मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं.’’

जब वह अपने गुस्से को जाहिर कर रहा था तभी रमाकांत ने सुन लिया और फिर गुस्से से बोले, ‘‘यह कोई पढ़ने का टाइम है? अगर कल परीक्षा है तो आज तो तुम्हें भगवान के आगे नतमस्तक होना चाहिए.’’

बोलो जय सियाराम… जय सियाराम… फिर रमाकांत अपने बच्चे की परेशानी से बेखबर… उलटा अपनी पत्नी को झिड़कते हुए कि अकल नहीं है क्या तुझ में… महात्मा बैठे हैं पूजा कर रहे हैं तू यहां बच्चे में लगी हुई है. बेवकूफ औरत जाओ सभी के लिए गरम दूध बना कर ले आओ. बेचारी करती भी क्या. डरते हुए , ‘जी’ बोला और लग गई सेवाटहल में.

बीचबीच में उस की सास की भी आवाजें आती रहीं कि प्रसाद बना कि नहीं? बहू बिस्तर लगाया  कि नहीं… देखो महात्मा की सेवा में कोई कमी न रह जाए. जितनी मन से सेवा कर लेगी उतनी ही मेवा मिलेगा… बहुत भाग्य से महात्मा घर में पधारते हैं… कितने लोगों का निमंत्रण गया होगा… लेकिन हमारा ही स्वीकारा और आज हम जो भी हैं वह इन्हीं की वजह से हैं आदिआदि.

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पूरा दिन और आधी रात तो इस सेवा के चक्कर में ही निकल जाती. मुश्किल से 2 घंटे ही लेट पाती कि 4 बजे से ही आवाजें लगने लगतीं कि महात्मा के नहाने का टाइम हो गया है… इंतजाम हुआ कि नहीं… फिर वे सुबह 6 बजे प्रभात फेरी के लिए जाएंगे… याद है न कि तुम्हें उठ कर सब से पहले स्नान करना है.

ऐसा हर साल होता था. जब से वह इस घर में आई थी यही सब देख रही थी. उसे इस बात का बहुत दुख था कि किसी गरीब या जरूरतमंद को तो मांगने पर भी क्व10 नहीं दिए जाते. लेकिन महात्माओं पर लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते. शुरूशुरू में तो जब शादी कर के आई तब सिर्फ एक स्वामीजी आते थे. वह भी 2 या 3 घंटों के लिए. लेकिन जैसेजैसे महात्माओं पर विश्वास और उतनी ही तेजी से आदमी की आमदनी बढ़ती गई, वैसे ही एक स्वामी के साथ 2 लोग… और… फिर अब तो महात्मा अपनी पत्नी और पूरे 11 लोगों की मंडली के साथ आते हैं. एक व्यक्ति की सेवाटहल किर भी आसान थी, लेकिन पूरी मंडली की सेवा, ऊपर से पासपड़ोस और रिश्तेदारों का मेला सभी को महात्मा से मिलना होता है और काम करने वाली वह अकेली.

अभी हाल ही की तो बात है जब पड़ोस में साक्षी गोपाल महाराज आए थे, कितने दिनों तक सुबहशाम उन के प्रवचन और सुबह 5 बजे प्रभात फेरी में वे बिना नागा शालमल होते रहे. कामधाम की कोई चिंता नहीं थी. चिंता थी तो बस बिजनैस को बढ़ाना है, महात्मा की सेवा करनी है.

यह कैसा अंधविश्वास

विश्वास या आस्था अपनी जगह है. लेकिन अंधा विश्वास यह मेरी समझ से परे है. ऐसा भी कैसा अंधा विश्वास हो गया जो आप अपने परिवार की दुखतकलीफ न समझ सको. छोटीछोटी बातों के लिए पंडेपुजारियों और महात्माओं के चक्कर लगाते हुए लोगों को देखती हूं तो खून खौलता है.

जैसेजैसे हम ग्लोबलाइजेशन की तरफ बढ़ रहे हैं वैसेवैसे ही लोगों में अंधविश्वास भी बढ़ता जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अंधविश्वास के मामले में पूरी दुनिया में सब से आगे हैं. सच में जिस देश ने सैटेलाइट जैसे वैज्ञानिक दावे किए हों वह नया भारत अंधश्विस की तरफ बढ़ रहा है.

दान क्यों

अकसर नुकसान के डर से पुण्य कमाने को या मनौती मांगने व पूरी होने के एवज में दान दिया जाता है. चढ़ावा चढ़ाया जाता है. कभी कुछ समस्याएं दूर करने के लिए अनापशनाप उपाय बताए जाते हैं. तरहतरह से दान होते हैं . धर्मगुरु, धार्मिक संस्थाएं सभी इसी तरह धन इकट्ठा करने में लगी रहती हैं जैसे राजनीतिक पार्टियां अपना फंड इकट्ठा करने के लिए चंदा उगाही करती हैं.

हकीकत में तो भक्त व श्रद्धालु भले ही गरीब और कंगाल हों, लेकिन जन्म से मरण तक कर्मकांड कर के उन से वसूली बराबर होती रहती है. प्रायश्चित्त करने, ग्रह चाल ठीक कराने, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने, बहुत सी समस्याओं के हल के बहाने भी मोटी दानदक्षिणा होती है. सोचने की बात यह है कि जिस धर्म पर भगवान के नाम पर लोगों को डराया जाता है उस के नाम पर चलनेठगने व गलत काम करने में खदु पंडितपुजारी क्यों नहीं डरते?

दिखावे से किस का भला

उदाहरण: एक ऐक्सपोर्टर हैं शौक और स्वाद सब पाले हुए हैं. लेकिन साल में 2 बार बांके बिहारी मंदिर वृंदावन जा कर भंडारा कर के आते हैं. पंडों को खुश रखते हैं और यह सोच कर मस्त रहते हैं कि जितना मैं कमा रहा हूं उस का एक हिस्सा भगवान को दे रहा हूं और अब कोई परेशानी नहीं आएगी और नाम होगा वह अलग. घर की महिलाएं भी पूजापाठ में लगी रहती हैं.

मंदिर तो मंदिर लोग घरों में भी बहुत सी मूर्तियां रख लेते हैं और सुबहशाम उन की पूजा की जाती है. घरों में महात्माओं को प्रवचन के लिए बुलाना शान की बात समझी जाती है. जितना बड़ा महात्मा और उस की टोली, उतनी ही समाज में प्रतिष्ठा की बात मानी जाती है.

गरीबों को धन की और अमीरों को यश की इच्छा रहती है. इसलिए मंदिरों में पत्थर लगाए जाते हैं या घरों में इन महात्माओं को बुलाया जाता है. अब दानपुण्य दिखावे की भेंट चढ़ चुका. सब को जताने का जमाना है, अपनी वाहवाही के लिए लोग दान देते हैं या इन महात्माओं को निमंत्रण. ऐसे भी लोग हैं जो काली कमाई तो बहुत करते हैं, लेकिन पाप से डरते हैं, इसलिए वे इस तरह के दान बेफिक्री से करते हैं ताकि उन्हें उतना ही पुण्य मिल जाए. झूठी शान और दिखावा चाहे कैसा भी हो एक बुरी आदत है.

हकीकत में जरूरी क्या है

यदि कोई अनपढ़ ऐसा करे तो भी समझ में आता है, लेकिन कोई पढ़ालिखा व्यक्ति पैसे को पानी की तरह बहाए तो शर्म की बात है. पैसा कमाना ही नहीं बचाना भी एक कला है, क्योंकि जो बचाया समझो बस वही काम आया. इसलिए फुजूलखर्ची कर के दान देने या चढ़ावा चढ़ाने से बेहतर है बचत करना. उस पैसे से दूसरी जरूरतों को पूरा करना. यदि दान देना व चढ़ावा चढ़ाना बंद हो जाए तो मुफ्तखोरी जैसी समस्या ही खत्म हो जाए. लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है.

हम आज भी अंधविश्वास तथा बेडि़यों की पगडंडी पर घिसट रहे हैं. गरीबी,गंदगी और अशिक्षा विकास के रास्ते का रोड़ा है. ऐसे में दान और चढ़ावा रास्ते के गड्ढे हैं. रोशनी की मशाल नहीं अब पुरानी जंजीरों को तोड़ कर उन से छुटकारा पाने का वक्त आ गया है. अत: दिखावा और मन का वहम छोड़ें.

पढ़ेलिखे भी जिम्मेदार

अगर ढोंगी पंडेपुजारियों की दुकानें चल रही हैं तो इस का एक कारण वे पढ़ेलिखे लोग भी हैं, जो इस जाल में फंस कर अपना बहुत कुछ लुटा देते हैं. बौलीवुड भी अछूता नहीं इस से. कोई भी दुकान तभी चलती है जब ग्राहक उस में जाए पंडेपुजारियों की दुकान है. अगर फूलफल रही है तो इस में जितना हाथ गरीब का है उतना ही इन अमीरों का भी. सोचने वाली बात है कि जिस धर्म, भगवान का नाम ले कर लोग पंडों के पास जाते हैं, उसी भगवान के घर में काम करने वाले कर्मचारियों के मन में गलत हरकत करने की बात क्यों और कैसे आती है?

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नाजायज मांगें

उदाहरण: एक दंपती को कई वर्षों से कोई औलाद नहीं थी. वे अकसर अपने बाबा से इस विषय पर मिलते थे. उस बाबा ने भी मौके का फायदा उठाया और पति से कहा कि रात भर के लिए अपनी पत्नी को मेरे पास छोड़ जाओ. पति ने इस बाबा पर ऐसी अंधभक्ति दिखाई कि उस ने खुद अपनी पत्नी को रातभर के लिए बाबा को सौंप दिया. उस बाबा ने पूरी रात महिला के साथ दुष्कर्म किया.

हैरानी तो यह बात सोच कर होती है कि पढ़ेलिखे लोगों और नेताओं के सामने धर्म का गणुगान करने वाले ये बाबा, महात्मा या तांत्रिक जब कोई आपत्तिजनक मांग रखते हैं तो वे उन्हें तमाचा मारने के बजाय उस नाजायज मांग को पूरा करते हैं. साथ ही अंधी आस्था रखते हैं.

उदाहरण

यूपी का एक बाबा दावा करता हैं कि वह गठिया को ठीक कर सकता है. वह मरीज का खून निकाल कर उसे एक तांबे के बरतन में रख देता है और फिर उसे मरीज को पिलाता है. हुआ यों कि एक फिजिशियन की खुद की बहन उन के द्वारा दी गई चेतावनियों के बाद भी इस बाबा के चक्कर में पड़ गई और किर बहुत बीमार भी हो गई, क्योंकि उस का हीमोग्लोबिन लैवल 2 हो गया (नौर्मल  15 या 12). ऐसे उदाहरण हमें रोज देखने को मिलते हैं. इस लड़की को कई दिन आईसीयू में बिताने पड़े.

कई डाक्टरों व नर्सों ने उस की जान बचाने के लिए बहुत मेहनत की. उसे बचाने के लिए फैमिली ने 5 लाख रुपए खर्च किए. जबकि यदि गठिया का इलाज रूटीन से कराया जाए तो महीने में केवल 1 हजार रुपए तक का खर्च आता है.

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