कई सरकारें अपने कर्मचारियों को महीने के एक दिन का वेतन  राममंदिर के लिए देने के लिए कह रही हैं. कह रही हैं, कहना गलत है, उन का वेतन काट लिया जाता है और ऐसे अकाउंट में डाल दिया जाता है, जिस का कुआं इतना गहरा है कि सिवाए पंडों के किसी को मालूम नहीं है. यह गाज असल में उन औरतों के सिर पर पड़ती है, जो सीताराम करती नहीं थकतीं. यह पैसा असल में घर खर्च से कटता है, जबकि सरकार द्वारा वेतन में दे दिया जाता है.

राममंदिर हो या आप की गली के 10-12 मंदिर, इन सब के बारे में सोचा यही जाता है कि इन में जा कर पैसा मिलेगा, घर भरेगा, बीमारी नहीं होगी, दुख नहीं होगा, समय से पहले मृत्यु नहीं होगी, झगड़ेफसाद नहीं होंगे पर असल बात यह है कि राममंदिर की तरह हर मंदिर औरतों पर भारी पड़ता है, मर्दों पर नहीं. मर्द तो दूर से नमस्कार चलतेफिरते कर के निबटा जाते हैं पर औरतों को नहाधो कर नंगे पैर मंदिर में जाना पड़ता है, धुएं भरे गर्भगृह में पूजा करनी होती है. घुटनों के बल लेटना होता है, गांठ का, कीमती पैसा चढ़ाना होता है, यह सोच कर कि कल्याण होगा.

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राममंदिर से ऐसी ही आशा थी पर अब तो सारे देश में भाजपा के सांसद, विधायक, पार्षद, जिला परिषद सदस्य टोले बना कर घरघर पैसे जमा करने के लिए निकल पड़े हैं और जो वेतन सरकार ने काट लिया उस के अलावा भी देना पड़ रहा है. मंदिर अयोध्या में बनेगा, उस के रखवाले फिलहाल आज के मोदीशाह होंगे, वहां मौजूद पंडे चढ़ावा लेंगे, बीसियों हुंडियों में पैसा जाएगा पर सताई औरतों को क्या मिलेगा, जिन्हें न तो मुसलमानों से लेनादेना है न भगवाई राजनीति से.

औरतों को फर्क नहीं पड़ता कि राज मोदी का है, योगी का, चौहान का या ममता का. उन्हें तो अपनी सुरक्षा और अपनी जेब में 4 पैसे चाहिए पर राममंदिर ऐसा कोई वादा करने वाला है, दिखता नहीं है. कम से कम राममंदिर एक टैक्स तो न बने जो मर्दों के माध्यम से औरतों की जेबों से जाए.

असल में तो सरकार को घरघर जा कर धार्मिक टैक्स ऐंठने की साजिश पर बैन लगाना चाहिए क्योंकि यह वह देश है जहां क्व16 की धोतियों के लिए भगदड़ में 21 औरतें 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की चुनाव तैयारियों में मुफ्त मिलती साडि़यों के लिए मर गई थीं. वहां एक दिन के वेतन की कीमत भगवा कपड़े पहनने वाले क्या जानें बाबू.

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