Married Woman : विश्व की सबसे प्रमुख टैक कंपनियों में से एक ऐप्पल कंपनी ने हाल ही में भारत के अंदर अपना आईफोन प्रोडक्शन बढ़ाया है, साथ ही अपने अन्य डिवाइस के प्रोडक्शन को भी भारत में शुरू करने की योजना पर काम कर रही है. भारत में ये काम उन के प्रमुख सप्लायर फाक्सकान करती है. फाक्सकान के बारे में यह बात सामने आई है कि भारत के प्लांट में वह विवाहित महिलाओं को जौब पर नहीं रखेगी.
मार्च, 2023 में पार्वती और जानकी नाम की 2 महिलाएं ऐप्पल कंपनी में जौब के लिए गईं तो उन्हें यह कह कर लौटा दिया गया कि यह कंपनी शादीशुदा महिलाओं को नौकरी नहीं देती है. इस कंपनी में काम करने वाले 17 कर्मचारियों ने भी नाम न बताने की शर्त पर कंपनी के इस रवैए की पुष्टि की और कहा कि फाक्सकान का मानना है कि शादीशुदा महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों और संभावित गर्भावस्था के कारण जोखिम के कारक हैं.
वजह क्या है
एजेंसी ने फाक्सकान इंडिया के पूर्व ह्यूमन रिसोर्सेज ऐग्जीक्यूटिव एस. पाल के हवाले से लिखा कि कंपनी एक सिस्टम के तहत इंडिया में अपनी आईफोन असैंबली की प्रमुख फैक्टरी में शादीशुदा महिलाओं को नौकरी से बाहर रखती है. शादीशुदा महिलाओं को जौब पर न रखने की वजह है कल्चर और उन पर पड़ने वाला सामाजिक दबाव. इसलिए शादीशुदा महिलाओं को नौकरी पाने की दौड़ से बाहर कर दिया गया है.
कंपनी की नजर में महिलाएं शादी के बाद प्रैगनैंसी, फैमिली ड्यूटीज आदि समस्याओं से घिरी होती हैं. कंपनी इसे रिस्क फैक्टर बताते हुए कहती है कि शादीशुदा महिलाएं ज्वैलरी भी पहनती हैं जो प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकता है.
शादीशुदा महिलाओं को नौकरी न देने का मामला राज्य सरकार से होता हुआ केंद्र सरकार के पास चला गया. इस के बाद केंद्र सरकार ने कंपनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए रिपोर्ट मांगी. इस पर कंपनी ने सफाई देते हुए कहा कि उन की कंपनी में 75 फीसदी महिलाएं काम करती हैं और जिन में से 25 फीसदी महिलाएं शादीशुदा है.
वैसे कंपनी का कहना पूरी तरह से गलत भी नहीं है कि विवाहित महिलाओं पर सामाजिक जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं और उन के चलते वे अपने काम पर फोकस नहीं कर पाती हैं. वे औफिस में एक कर्मचारी की तरह नहीं बल्कि एक घरेलू महिला की तरह व्यवहार करती हैं जहां उन की बातों में पति बच्चे, घरपरिवार और सासससुर की बातें होती हैं.
आम परेशानियां
33 साल की दीपिका जो एक सरकारी बैंक में जौब करती है अकसर इस बात को ले कर परेशान रहती है कि उस के घर पर न रहने से घर का क्या हाल हो रहा होगा. बाई काम करने आई होगी या नहीं. उस का 4 साल का बेटा ठीक से होगा या नहीं? कहीं वह अपनी नानी को परेशान तो नहीं कर रहा होगा? रो तो नहीं रहा होगा? जैसी परेशानियों से जू?ाती हुई कईकई बार वह घर पर फोन लगा कर वहां का हालचाल लेती रहती है. पर उसे यह पता नहीं होता कि उस का यह व्यवहार औफिस में उस के काम को प्रभावित कर रहा होता है.
पदमा भी एक बड़े सरकारी बैंक में जौब करती है. प्रैगनैंसी के समय उसे काफी तकलीफों से गुजरना पड़ा. बारबार डाक्टर के पास चैकअप के लिए जाने के चलते अकसर उसे बैंक से छुट्टी लेनी पड़ी थी. जब उस की डिलिवरी हुई तब वह 2 साल की छुट्टी ले कर घर बैठ गई क्योंकि उसे अपने बच्चे की परवरिश के लिए वक्त चाहिए था.
धर्म भी जिम्मेदार
महिलाएं अकसर औफिस में आ कर भी घरपरिवारों के बीच उलझी होती हैं. शरीर तो उन का औफिस में होता है, पर दिल और दिमाग घरपरिवार पर लगा होता है. एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि विवाहित वर्किंग वूमंस अपने घर की जिम्मेदारियों के चलते औफिस में सही से काम नहीं कर पाती हैं. ऐसा नहीं है कि वे जौब नहीं करना चाहतीं या उन्हें प्रमोशन या ऊंचे पद नहीं चाहिए पर औफिस में ज्यादा जिम्मेदारी लेने से बचती हैं.
मालविका एक सरकारी कर्मचारी है. इस साल ही वह प्रमोट हुई है. लेकिन औफिस में उस के काम करने के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया है. औफिस से ज्यादा उस का दिमाग घरपरिवार, पति, बच्चे और सासससुर में अटका होता है. एक आम गृहिणी की तरह तीज, करवाचौथ आदि त्योहारों में बढ़चढ़ कर हिसा लेती है. उस के साथ काम करने वाली विवाहित महिलाएं भी पूजाव्रत, जागरण पर खुल कर बातें करती हैं. किस व्रतउपवास में क्या करना है, कैसे रंग की साड़ी, चूडि़यां पहननी हैं, कहां किस दुकान से खरीदारी करनी है, इस सब पर चर्चा चलती है ज्यादा और औफिस के काम की कम.
खुद को बदलने की जरूरत
मीनाक्षी एक स्कूल टीचर है. वह गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर लगा कर ही स्कूल आती है. उसे देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि वह एक कामकाजी महिला है. धर्मकर्म में काफी विश्वास करती है. सुबह उठ कर सब से पहले घर के देवीदेवता की पुजा करती है, फिर सब को चाय देने के बाद परिवार के लिए खाना बना कर ही स्कूल के लिए निकलती है. हफ्ते में एक दिन उपवास भी होता है जिस में वह अन्न ग्रहण नहीं करती, केवल जूस पर रहती है. लेकिन इन सब कामों से वह नहीं थकती. थकावट तो उसे स्कूल से जानेआने पर होती है. कभीकभी मन होता है कि नौकरी छोड़ दे पर नौकरी छोड़ना भी नहीं चाहती क्योंकि अब भला महीने के क्व60-65 हजार क्यों छोड़े कोई.
महिलाएं पढ़ाई और डिगरियां तो पुरुषों की तरह प्राप्त कर लेती हैं पर असल में वे खुद को बदलना नहीं चाहतीं. कार्यक्षेत्र में भी उन का पहनावाओढ़ावा, सोचविचार एक घरेलू महिला की तरह ही होता है. आज ऊंचे पदों पर महिलाएं इसलिए भी कम हैं क्योंकि वे खुद से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचती हैं. अपने से ज्यादा उन्हें पतिपरिवार और बच्चों की फिक्र लगी होती है और जिस के चलते अपने काम से न्याय नहीं कर पाती हैं.
कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ जिस में दिखाया गया है कि एक महिला स्कूल टीचर बच्चों को पढ़ाने के बजाय स्वैटर बुन रही थी. 27 सैकंड के इस वीडियो में कई महिला टीचर स्टाफरूम में बैठ कर घरेलू बातचीत में मशगूल थीं. उन्हीं में एक टीचर खिड़की के पास कुरसी पर बैठी धूप का लुत्फ उठाते हुए स्वैटर बुन रही थी.
वीडियो देखने के बाद लोगों का रिएक्शन आया. लोगों का कहना था कि अच्छा वेतन उठाने के बाद भी टीचर पढ़ाने की जगह अन्य कामों में व्यस्त रहती हैं. ऐसे में इन पर काररवाई होनी चाहिए.
क्या कहती है रिपोर्ट
कई ऐसी महिलाएं हैं जो जौब तो करना चाहती हैं पर पारिवारिक जिम्मेदारियों से बाहर नहीं निकल पाती हैं. कोरना काल में शुरू वर्क फ्रौम होम का कल्चर आज भी कायम है खासकर महिलाएं घर से काम करना ज्यादा पसंद कर रही हैं ताकि वे घर और औफिस दोनों संभला सकें.
मिताली कहती है कि महिलाओं के लिए वर्क फ्रौम होम बहुत सुविधाजनक है. इस से समय तो बचता ही है, घरेलू काम भी डिस्टर्ब नहीं होते और नौकरी छोड़ने की बात भी मन में नहीं आती है.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम की एक हालिया रिपोर्ट भी यही कहती है कि भारत की महिलाएं वर्क फ्रौम होम को ज्यादा प्राथमिकता देती हैं.
भले ही आज महिलाएं पुरुषों के साथ बराबरी से चलना चाहती हैं जो सही भी है लेकिन वे घर, पति बच्चों की जिम्मेदारियों से खुद को आजाद नहीं कर पाई हैं. सच बात तो यह है कि महिलाएं खुद सामाजिक बेडि़यों में जकड़ी रहना चाहती हैं. अगर पुरुष औफिस में धोतीकुरता पहन कर आएंगे, तो अच्छा नहीं लगेगा वैसे ही कामकाजी महिलाएं अगर अपने औफिस में मंगलसूत्र, चूडि़यां पहन और बिंदी लगा कर जाएंगी तो सही तो नहीं लगेगा न? लेकिन कई ऐसी कामकाजी महिलाएं अपने औफिस में भी जींसटौप पर मंगलसूत्र और सिंदूर, चूडि़यां पहन कर आ जाती हैं जो काफी अजीब लगता है.
धार्मिक गुट द्वारा अहमियत
गोवा के एक कालेज में पौलिटिकल साइंस की एक महिला प्रोफैसर की फेसबुक पर की गई पोस्ट में मंगलसूत्र की तुलना कुत्ते के गले में बंधी बेड़ी से की गई थी. पितृसत्ता और रूढि़वाद के संदर्भ में की गई इस पोस्ट के लिए प्रोफैसर का कहना था कि वह बचपन से ही यह सम?ाने की कोशिश करती रही है कि अलगअलग परंपराओं में शादीशुदा औरतों के लिए खास सूचक क्यों है और पुरुषों के लिए क्यों नहीं? हालांकि अपने विचार प्रकट करने के लिए उस महिला प्रौफैसर को राष्ट्रीय हिंदू युवा वाहिनी की शिकायत के बाद माफी मंगनी पड़ी थी.
गोवा के मामले के बाद लेखक और ऐक्टिविस्ट राम पुनियानी ने रेखांकित किया कि औरतों पर नियंत्रण दिखाने वाले ये सूचक भारत की परंपराओं का हिस्सा हैं और सभी धार्मिक गुट इन्हें बहुत अहमियत देते हैं. एक लेख में उन्होंने कहा कि इस वक्त दुनियाभर में धार्मिक राष्ट्रवाद लोकप्रिय हो रहा है और ऐसी रीत को और प्राथमिकता और सामाजिक स्वीकृति दी जा रही है.
‘नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2023’ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में केवल 32% विवाहित महिलाएं ही कार्यरत हैं. इतना ही नहीं 2004-05 और 2011-12 के बीच चौंकाने वाली बात तो यह रही कि 20 मिलियन भारतीय महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी इसलिए कि उन पर सामाजिक जिम्मेदारियां ज्यादा थीं और उन की वे अनदेखी नहीं कर सकती थीं.
आदर्श औरत बनने की आशा
अकसर औरतों से एक आदर्श औरत बनने की आशा की जाती है. कुछ साल पहले कर्नाटका हाई कोर्ट ने एक आदर्श स्त्री की परिभाषा दी कि जो शादी के बाद गले में मंगलसूत्र और माथे पर सिंदूर लगाती हैं, वही आदर्श स्त्री की गिनती में शामिल हैं. कुछ साल पहले वाराणसी के एक स्टार्टअप ने लड़कियों को आदर्श बहू बनने की ट्रेनिंग देने की पेशकश की थी. ऐसी ट्रेनिंग गीता प्रैस वाले कई सालों से दे रहे हैं. जैसे नारी धर्म, स्त्री के लिए कर्तव्य दीक्षा, भक्ति नारी, नारी शिक्षा, दांपत्य जीवन का आदर्श, गृहस्थ में कैसे रहें आदिआदि. लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि महिलाएं यह शिक्षा ले भी रही हैं.
भारतीय शादीशुदा महिलाओं को यह सम?ा नहीं होती कि पुरातनपंथी घर से औफिस के लिए निकलते समय पोशाक और मस्तिष्क दोनों बदलने की जरूरत है. जींसटौप या औफिशियल पैंटशर्ट पहन कर, गले में मंगलसूत्र और चूडि़यां पहन कर औफिस नहीं जाया जाता. पुरुष घर और दफ्तर दोनों जगह मर्दों सा व्यवहार करते हैं, लेकिन औरतें दोनों जगह संस्कारी बहू और पत्नी की तरह पेश आती हैं. काफी समय औरतें अपने औफिस में मां, बहन, सहेली की बातों में लगी रहती हैं. आए दिन उन का उपवास चलता है और दूसरा हर महीने पीरियड्स का रोना जिस के लिए वे दफ्तर में काम करने वाले पुरुषों से सिंपैथी चाहती हैं.
व्रत उपवास का ढकोसला
जौब करने वाली स्मार्ट युवतियों को भी यह कहते सुना जाता है कि आज उन का गुरुवार का व्रत है और आज मंगलवार का और इन सब व्रतों को एक अच्छे पति की कमाना से करती हैं. तो क्या आज की स्मार्ट पढ़ीलिखी युवतियों को अपने ऊपर भरोसा नहीं रहा जो वे अच्छे पति की कमाना के लिए व्रतउपवास कर रही हैं? कहीं न कहीं लड़कियां खुद ही खुद को गिराने का काम करती हैं और कहती हैं कि उन्हें बराबरी का हक नहीं मिल रहा है.
बदलाव तब नहीं आएगा, जब लोग हमें बदलेंगे. बदलाव तो तब आएगा जब हम खुद बदलना चाहेंगे. समान काम समान वेतन का जो ढिंढोरा पीटा जा रहा है न इस के लिए भी महिलाओं को पहले खुद को बदलना होगा. पुरातनपंथी रीतिरिवाजों से बाहर निकलना होगा. खुद को साबित करना होगा कि वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं.बदलाव तभी संभव है.