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लेखक- जीतेंद्र मोहन भटनागर 

हरीराम उर्फ हरिया मुनिया का हाथ पकड़ कर तकरीबन खींचता हुआ राहत शिविर से बाहर आया. कई हफ्तों से उस जैसे कई मजदूरों को उन शिविर में ला कर पटक दिया गया था. न तो खानेपीने का उचित इंतजाम था, न जलपान कराने की कोई फिक्र. शौचालयों की साफसफाई का कोई इंतजाम नहीं.

2 बड़े हालनुमा कमरों में दरी पर पड़े मजदूर लगातार माइक पर सुनते रहते थे, ‘प्रदेश सरकार आप सब के लिए बसों का इंतजाम करने में जुटी हुई है. इंतजाम होते ही आप सब को अपनेअपने प्रदेश भेज दिया जाएगा. कृपया साफसफाई का ध्यान रखें और एकदूसरे से दूरदूर रहें.’ कोरोना की तबाही के मद्देनजर लौकडाउन का ऐलान किया जा चुका था. फैक्टरिया बंद होनी शुरू हो गई थीं.

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फैक्टरी मुलाजिमों से उन के कमरे खाली करा के उन्हें गेट से बाहर कर दिया गया था. वहां से वे पैदल ही अपनाअपना बोरियाबिस्तर समेट कर राहत शिविरों तक चल कर आए थे. जिस ऊन फैक्टरी में हरीराम उर्फ हरिया काम करता था और अभी 2 साल पहले वह अपने से 12 साल छोटी मुनिया को गांव से ब्याह कर लाया था, वह मुनिया चाहती और हरिया की बात मान कर फैक्टरी के मैनेजर के घर रुक जाती तो शायद आज हफ्तेभर से इस राहत केंद्र में उन्हें मच्छरों की भिनभिन न सुननी पड़ती. पर मुनिया जिद पर अड़ गई थी, ‘‘जब सब अपनेअपने गांव जा रहे हैं, तो हम भी यहां नहीं रहेंगे. मुझे तो गांव जाना है.’’

उस रात हरीराम जब मुनिया की जिद को न तोड़ सका, तो उस ने मुनिया को मारना शुरू कर दिया, लेकिन पिटने पर भी मुनिया ने जिद नहीं छोड़ी, तो हरीराम हार गया. उस की सांसें फूलने लगीं. उसे लगातार खांसी आनी शुरू हो गई. अपनी हार और कमजोरी को छिपाने के लिए उस ने कोने में पड़ी हुई शराब की बोतल निकाली.

बड़ेबड़े घूंट भरे, फिर बीड़ी का बंडल खोल कर एक बीड़ी सुलगाई और सामने घर का सामान समेटती मुनिया को गरियाता रहा, ‘‘करमजली, जब से शादी कर के लाया हूं, चैन से नहीं रहने दिया इस चुड़ैल ने…’’ बड़बड़ाते हुए वह न जाने कब बिना खाना खाए बिस्तर पर ही लुढ़क गया, पता ही नहीं चला. मुनिया ने एक अटैची और एक बक्से के अलावा बाकी सामान गठरी में बांधा और खाना खा कर बची रोटियां और अचार को छोटी पोटली में समेट कर खुद भी लेट गई.

मुनिया के दिमाग में पिछले 2 सालों का बीता समय और नामर्द से हरीराम के बेहूदे बरताव के साथसाथ फैक्टरी के मैनेजर का गंदा चेहरा भी घूम गया. उस का मन करता कि वह यहां से कहीं दूर भाग जाए, पर हिम्मत नहीं जुटा पाई. बेहद नफरत करने लगी थी वह हरीराम से. उसे हरीराम के शराबी दोस्तों खासकर मैनेजर का अपने घर आनाजाना बिलकुल भी पसंद नहीं था, वह इस का विरोध करती तो भले ही हरीराम से पिटती, पर जब उस ने हार नहीं मानी तो हरीराम को ही समझौता करना पड़ा.

मुनिया इन 2 सालों में फैक्टरी मैनेजर के हावभाव और उसे घूरने के अंदाज से परिचित हो चुकी थी. उधर हरीराम जानता था कि जो सुखसुविधाएं उसे यहां मिलती हैं, वे गांव में कहां? फिर मैनेजर भी उस का कितना खयाल रखता है. मैनेजर का वह इसलिए भी एहसानमंद था कि शादी से कुछ समय पहले ही उन की उस फैक्टरी में काम करते हुए, सांसों द्वारा शरीर में जमने वाले रुई के रेशों ने उस के फेफड़ों को संक्रमित कर डाला था और जब उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी, तब इसी मैनेजर ने फैक्टरी मालिक से सिफारिश कर के उस का उचित इलाज कराया था, फिर ठीक होने के बाद उसे प्रोडक्शन से हटा कर पैकिंग महकमे में भेज दिया था.

उन्हीं दिनों फैक्टरी से छुट्टी ले कर हरीराम अपने गांव आया था, जहां आननफानन वह मुनिया से शादी कर के उसे अपने साथ फैक्टरी के कमरे में ले आया था. मुनिया की बिलकुल भी इच्छा नहीं थी हरीराम से शादी करने की. 8वीं जमात पास कर के वह घर में बैठी थी. वह चाहती थी कि और पढ़े, लेकिन 8वीं से आगे की पढ़ाई के लिए दूर तहसील वाले इंटर स्कूल में दाखिला करा पाना उस के बापू श्रीधर के बस में नहीं था. भला दूसरों के खेतों को बंटाई पर जोतने वाला श्रीधर उसे आगे पढ़ाता भी तो कैसे?

उधर मां अपने दमे की बीमारी से परेशान रातरातभर खांसा करती. न खुद सोती, न किसी को सोने देती. 8वीं पास मुनिया उसे शादी लायक दिखाई देने लगी थी. वह अकसर श्रीधर से कह बैठती, ‘‘अरे मुनिया के बापू, अपनी जवान हो गई छोकरी को कब तक घर में बैठाए रखोगे… कोई लड़का ढूंढ़ो और हमारी सांस उखड़ने से पहले इस के हाथ पीले कर दो.’’ मुनिया के शरीर की उठान ही कुछ ऐसी थी कि वह अपनी उम्र से बड़ी दिखती थी.

आंखें खूब बड़ीबड़ी और उन में वह हमेशा काजल डाले रखती. गांव के माहौल में सरसों के तेल से सींचे काले बाल. हफ्ते में वह एक बार ही बालों में जम कर तेल लगाती, फिर उन्हें अगले दिन रीठे के पानी से धोती और जब वह काले घने लंबे बालों की  2 चोटियां बना कर आईने में अपना चेहरा देखती, तो खुद ही मुग्ध हो उठती. आईने के सामने खड़े हो कर अपनी देह को देखना उसे बहुत पसंद था. उसे लगता था कि कुछ आकर्षण सा है उस के शरीर में, पर मां को उस का यों आईने के सामने देर तक खड़े रहना बिलकुल पसंद नहीं था.

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2 चोटियां गूंथने के बाद मुनिया कुछ लटें अपनी दोनों हथेलियों की मदद से माथे पर गिराती और आंखों में मोटा सा काजल लगा कर झट आईने के सामने अपनी छवि को निहार कर हट जाती, फिर घर के कामों में जुट पड़ती. साफसफाई, चौकाबतरन, कपड़ों की धुलाई, खाना बनाना, सब उसी के जिम्मे तो था. मां तो बीमार ही रहती थी. उन्हीं दिनों जब हरीराम गांव आया हुआ था, तो किसी ने श्रीधर को बताया कि वह इस बार शादी कर के और दुलहन ले कर ही शहर जाएगा, तो उस ने कोशिश कर के मुनिया से हरीराम की शादी को अंजाम दे ही दिया.

मुनिया ने भरपूर विरोध किया, पर मां की कसम ने उसे मजबूर कर दिया. मुनिया की शादी के तकरीबन  4 महीने बाद ही मुनिया की मां चल बसी और श्रीधर भी ज्यादा दिन जी नहीं पाया.  मां के मरने की खबर तो हरीराम ने उसे दे दी थी, पर बहुत कहने पर भी उसे गांव नहीं ले कर गया. वही हरीराम मुनिया का हाथ पकड़े जब राहत केंद्र से बाहर आया तो सामने 8-10 बसें कतार में आ कर खड़ी हो गई थीं.

अब इन में से मध्य प्रदेश की ओर जाने वाली बस कौन सी है, यह हरीराम  को समझ में नहीं आ रहा था. उस ने गुस्से में मुनिया की चोटी को अपने दाएं हाथ में भर कर जोरों से खींचा, फिर चिल्लाया, ‘‘उस डंडा लिए खाकी वरदी वाले से पूछती क्यों नहीं? पूछ कौन सी बस हमारे प्रदेश की तरफ जाएगी…’’ अचानक चोटी के खिंचने के दर्द से मुनिया चीख उठी. मुनिया ने एक हाथ में अटैची पकड़ी हुई थी और दूसरे में बक्सा. हरीराम के बाएं कंधे पर हलकी गठरी थी और उसी हाथ में उस ने बालटी पकड़ी हुई थी. हरिया का दायां हाथ खाली था, जिस से वह चोटी खींच सका.

सभी घर लौटने वाले मजदूरों में अपनीअपनी बस पकड़ने की आपाधापी मची हुई थी. ज्यादातर बसों के गेट पर अंदर घुस कर बैठने की जैसे लड़ाई चल रही थी. लाउडस्पीकर पर क्या बोला  जा रहा है, किसी की समझ में नहीं आ रहा था. चारों ओर अफरातफरी का माहौल था. ड्यूटी पर लगे लोग जैसे अंधेबहरे थे. किसी के भी सवाल का जवाब देने से कतराने की कोशिश करते हुए वे उन्हें अगली खिड़की पर भेज देते. परेशान हरीराम ने इस बार मुनिया की गरदन अपने चंगुल में ले कर हलके से दबाते हुए कहा, ‘‘पूछती क्यों नहीं? बस भर जाएगी तब पूछेगी क्या.’’ लेकिन इस बार मुनिया ने अटैची और बक्सा जोरों से जमीन पर पटके और खाली हुए अपने दाएं हाथ से हरीराम के हाथ को इतनी जोर से झटक कर दूर हटाया कि वह गिरतेगिरते बचा.

उस की खांसी फिर उखड़ गई. उस ने लगातार खांसना शुरू कर दिया. उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए मुनिया चिल्लाई, ‘‘तुम्हारे मुंह में जबान नहीं है क्या? हम नहीं पूछेंगे, तुम्हीं पूछो…’’ मुनिया इतनी जोर से चीखी थी कि आसपास के सभी इधर से उधर भटकते लोग उस की तरफ घूम पड़े और वह वरदी वाला उन्हीं के पास आ कर अपना डंडा जमीन पर पटकते हुए बोला, ‘‘क्या बात है? क्यों झगड़ रहे हो? पता है, यहां तेज चिल्लाना मना है. अंदर बंद कर दिए जाओगे.’’ ‘‘अरे भई, समझ में नहीं आ रहा है कि मध्य प्रदेश की तरफ कौन सी बस जाएगी,’’ हरीराम ने ही अपनी खांसी को काबू में करते हुए पूछा.

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सिपाही तो खुद ही अनजान था. उसे क्या पता कि कौन सी बस किधर जाएगी. उसे तो एक कमजोर से डंडे के सहारे भीड़ को काबू करने की जिम्मेदारी मिली थी और वह खुद ही नहीं समझ पा रहा था कि इस जिम्मेदारी को कैसे निभाए. तभी उसी भीड़ में से कोई बोल पड़ा, ‘‘वह जो लाल रंग वाली, नीली पट्टी की बस देख रहे हो, वह जा रही है तुम्हारे प्रदेश की तरफ.’’ मुनिया और हरीराम ने अपनेअपने हाथों का सामान उठाया और उधर लपक गए, जिधर वह बस खड़ी थी. उस खटारा सी दिखने वाली सरकारी बस में कई मजदूर घुस कर बैठ चुके थे. अंदर ज्यादातर सीटों की रैक्सीन उखड़ी पड़ी थी. फोम नदारद थी. एकाध सीटों के नीचे लगी छतों के नटबोल्ट ढीले पड़े थे.

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