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लेखक- जीतेंद्र मोहन भटनागर 

जो मजदूर बस में पहले घुस आए थे, उन्होंने बस की तरकीबन सभी अच्छी सीटों पर कब्जा जमा रखा था. उन्हीं में एक बांका और गठीले बदन का दिखने वाला देवा भी था. आगे से चौथी लाइन में पड़ने वाली बाईं ओर की  2 सीटों में से एक सीट पर खुद जम कर बैठ गया था और दूसरी सीट पर अपना बैग उस ने कुछ इस अंदाज से रख  लिया था कि देखने वाला समझ जाए  कि वह सीट खाली नहीं है.

बस के पास पहुंच कर हरीराम ने जैसेतैसे अटैची, बक्सा और बालटी बस की छत पर लादे जाने वाले सामान के बीच में ठूंस देने के लिए ऊपर चढ़े एक आदमी को पकड़ा दी और मुनिया की पीठ पर धौल जमा कर आगे धकियाते हुए जैसेतैसे बस के अंदर दाखिल हुआ. पीछे से लोगों के धक्के खा कर आगे बढ़ती मुनिया पास से गुजरी और आगे खड़े लोगों के बढ़ने का इंतजार कर रही थी, तभी देवा की आंखें मुनिया की कजरारी आंखों से टकराईं.

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दोनों की नजरों से एक कौंध सी निकल कर एकदूसरे के दिल में समा गई. देवा ने पास रखा बैग उठा कर अपनी जांघों पर रख लिया और मुनिया को इशारे से खाली सीट पर बैठ जाने  को कहा.  मजदूरों से भरी इस भीड़ वाली बस में बगल में बैठी कमसिन मुनिया के साथ लंबे और सुहाने सफर की सोच से देवा ने खुश होना शुरू ही किया था कि पीछे से हरीराम की आवाज आई, ‘‘अपने बैठने की बहुत जल्दी है. पति की चिंता नहीं है कि वह कहां बैठेगा,’’ कहते हुए उस ने मुनिया के सिर पर पीछे से एक धौल जमा दी.

हरीराम शायद उसे एकाध हाथ और भी जड़ता, लेकिन तब तक मुनिया खिड़की की तरफ वाली सीट पर बैठ चुकी थी और उस के बगल में देवा ने बैठ कर हरीराम को घूरना शुरू कर दिया. देवा का बस चलता तो ऐसे बेहूदा आदमी की तो वह गरदन दबा देता. तभी पीछे से किसी ने हरीराम को देख कर आवाज लगाई, ‘‘अरे ओ हरीराम, इधर पीछे आ जाओ, एक सीट खाली है.’’ यह उसी फैक्टरी में काम करने वाले जग्गू दादा की आवाज थी. वे मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के रहने वाले थे और  2 महीने बाद ही उन की रिटायरमैंट थी.

भांग के शौकीन जग्गू दादा की आवाज सुन कर हरीराम ने राहत की सांस ली और उन की बगल की सीट पर जा कर बैठ गया. हरीराम इस बात से भी खुश था कि बीड़ी तो बस के अंदर पी नहीं पाएगा, पर पानी के साथ भांग तो पी जा सकेगी. अच्छी बात यह थी कि सब ठुंसे हुए लोग अपनीअपनी सीटों पर बैठ चुके थे और कोई भी आदमी खड़ा नहीं था. बस जैसे ही स्टार्ट हुई, देवा ने अपने बाएं हाथ की कलाई पर बंधी घड़ी को देखा. शाम के 4 बज चुके थे.

बगल में बैठी मुनिया को उस की कलाई में बंधी काले पट्टे वाली घड़ी बहुत पसंद आई. उस की नजरें अपनेआप ही कलाई से हट कर देवा के चेहरे की तरफ चली गईं. इस बार नजरें मिलीं तो मुनिया सहजता से हंस दी. देवा ने सुन रखा था  कि औरत हंसी तो जानो फंसी. यही सोच कर उस के दिल की धड़कनें तेज हो गईं  मुनिया तो इस बात से इतनी खुश थी कि कम से कम उसे अपने खड़ूस पति की बगल में बैठ कर यह लंबा सफर तो नहीं तय करना पड़ेगा.

तभी देवा को लगा कि मुनिया उस से कुछ कह रही है, लेकिन बस के इंजन का शोर इतना तेज था कि वह क्या कह रही है, देवा सुन नहीं पा रहा था, इसलिए मुनिया के पास खिसक कर, थोड़ा झुकते हुए उस ने अपना कान मुनिया के होंठों से मानो चिपका सा दिया. मुनिया का मन तो हुआ कि इसी समय वह देवा के कानों को अपने होंठों से काट ले, पर लाजशर्म भी कुछ होती है, इसलिए उस ने अपने शब्द दोहराए, ‘‘पता नहीं, यह सीट न मिलती तो हम कहां बैठ कर जाते…’’ ‘अरे, सीट न मिलती तो हम तुम को अपने दिल में बैठा के ले चलते,’ देवा ने यह तो मन में सोचा, पर कहा कुछ यों, ‘‘अरे, हमारे होते सीट क्यों न मिलती तुम को.’’ ‘‘तो तुम को मालूम था कि हम ही यहां आ कर बैठेंगे? और मान लो, हमारे पति यहां बैठने की जिद पकड़ लेते तो…?’’ ‘‘तब की तब देखी जाती, पर यह पक्का जानो कि हम अपने बगल में उसे कभी न बैठने देते.

हमें जो इंसान पसंद नहीं आता है, उसे हम अपने से बहुत दूर रखते हैं,’’ देवा ने अपने सीने पर एक हाथ रखते हुए कहा, तो मुनिया उस के चेहरे पर उभर आए दृढ़ विश्वास से बहुत प्रभावित हुई. उस कैंपस से बाहर निकल कर वह बस सड़क पर एक दिशा में जाने को खड़ी हो गई थी. उस का इंजन स्टार्ट था. बीचबीच में ड्राइवर हौर्न भी बजा देता  था और कंडक्टर बस के अगले गेट  पर लटकता हुआ चिल्लाता, ‘‘भोपाल, भोपाल…’’ आखिरकार बस अपनी दिशा की तरफ चल दी.

मुनिया ने गरदन घुमा कर पीछे की तरफ देखा, तो वह निश्चिंत हो गई. जग्गू दादा के साथ हरीराम आराम से बैठा बतिया रहा था. हां, बीचबीच में उस की खांसी उठनी शुरू हो जाती थी. बस ने अब थोड़ी रफ्तार पकड़ ली थी. स्टेयरिंग काटते हुए जब बस झटका खाती और मुनिया का शरीर जब देवा से टकराता तो उसे वह छुअन अच्छी लगती. फिर तो देवा ने अपनी बांहें उस की बांहों से चिपका दीं और पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ मुनिया ने हंसते हुए कहा, ‘‘पहले तुम अपना नाम बताओ, तब हम अपना नाम बताएंगे.’’ हमारा तो सीधासादा नाम है, ‘‘देवा’’. ‘‘तो हमारा कौन सा घुमावदार नाम है. वह भी बिलकुल सीधा है मुनिया…’’ होंठों को गोल कर के कजरारी आंखें नचाते हुए जब मुनिया ने अपना नाम बताया, तो देवा तो उस की इस अदा पर फिदा हो गया.

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आज 2 साल बाद मुनिया को अपना मन बहुत हलका लग रहा था. खुद को इतना खुश होते देख उसे एक अरसा बीत गया था. वह समझ नहीं पा रही थी कि कैसे वह देवा से इतनी जल्दी घुलमिल कर बातें किए जा रही है. इतने अपनेपन से तो मुनिया से कभी हरीराम ने भी बातें नहीं की थीं. सुहागरात वाले दिन भी नहीं.

आखिर हरीराम ने उसे कौन सा सुख दिया है? जिस्मानी सुख भी तो वह ढंग से नहीं दे पाया. पता नहीं उस के बापू ने क्या देख कर उसे जबरदस्ती हरीराम के पल्ले बांध दिया. मुनिया को इस समय अपनी मां पर भी गुस्सा आया. वह पीछे न पड़ती तो अभी बापू शादी न करता. उस की शादी तो देवा जैसे किसी बांके जवान के साथ होनी चाहिए थी.

कितने प्यार से बातें कर रहा है… और एक हरीराम है… लगता है, अभी खा जाएगा. पता नहीं, कितनी खुरदरी जबान पाई है हरीराम ने. मीठा तो बोलना ही नहीं जानता. बातबात पर हाथ अलग उठा देता है. ऐसे ब्याही से तो बिन ब्याही रहना ही अच्छा था. मुनिया को बस की खिड़की से बाहर कहीं खोया देख कर देवा ने मुनिया के घुटने पर थपकी देते हुए पूछा, ‘‘कहां खो गई थी? क्या सोच रही थी?’’ चेहरे से गंभीरता हटा कर मुनिया ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं. सोचने लगी थी कि तुम्हारी पत्नी तो बहुत सुखी रहती होगी तुम्हारा प्यार पा कर.

वह अपने को धन्य समझती होगी.’’ ‘‘अरे मुनिया, क्या मैं तुम्हें शादीशुदा लगता हूं? मैं शादी लायक जरूर हो गया हूं, पर अभी तक इस बारे में कुछ सोचा नहीं. मैं अभी तक कुंआरा हूं.’’ ‘‘तो हरियाणा में अकेले ही रहते हो? काम क्या करते हो? और मध्य प्रदेश में कहां के रहने वाले हो?’’ ‘‘बाप रे, एकसाथ इतने सवाल. इतने सवाल तो फिटर के रूप में मेरी नौकरी लगने पर भी नहीं पूछे गए थे,’’ कहते हुए देवा खिलखिलाया और इस अदा पर मुनिया उस की ओर ताकती रही.

उस का मन हुआ कि वह अपनी बांहें फैला कर देवा के सीने से लिपट जाए. तभी देवा ने बताना शुरू किया, ‘‘मैं देवास के पास का हूं. मेरे पिता किसान हैं और 2 बहनें भी हैं, जो शादीशुदा हैं और अपनीअपनी ससुराल में रहती हैं.  ‘‘मुझे गांव में बुढ़ापे की औलाद कहा जाता है, क्योंकि मैं अपनी दूसरी बहन के पैदा होने के 10 साल बाद पैदा हुआ था. ‘‘मैं जब बड़ा हुआ, तो इंटर के बाद मेरे बड़े पापा यानी ताऊजी मुझे अपने साथ देवास ले आए.

वहीं से मैं ने पौलिटैक्निक कालेज से मेकैनिकल का डिप्लोमा किया और फिर हरियाणा में चारा काटने वाली मशीन के पार्ट बनाने वाली कंपनी में फिटर का काम मिल गया. अभी तकरीबन 2 साल से यहां हूं. ‘‘अब कुछ तुम अपने बारे में बताओ. देखो, बातोंबातों में समय अच्छा कट जाता है. तुम रास्तेभर मुझ से ऐसे ही बतियाती रहना, समय आराम से कट जाएगा.

‘‘और हां, यह गठरी कब तक यों पकड़े रहोगी, मुझे दो. मैं इसे ऊपर रख देता हूं,’’ कह कर देवा चलती हुई बस में खड़ा हुआ और गठरी अपने बैग के बगल में ठूंस दी. खड़े होते समय उस ने हरीराम की सीट की तरफ भी नजर डाली थी. वह शायद सो गया था, क्योंकि बस के साथ उस का और उस के साथी का सिर भी इधरउधर झूल रहा था. ‘इंसान जब शरीर से कमजोर होता है, तो किसी भी सवारी से वह सफर करे, जल्दी ही ऊंघने लगता है,’ हरीराम को देख कर देवा को अपने ताऊजी यानी बड़े पापा के कहे शब्द याद आ गए थे.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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