ऐसा बिलकुल नहीं था कि उसे लड़कों से हमेशा से नफरत थी. बचपन से ले कर इंटरमीडिएट तक वह लड़कों के साथ पढ़ी. उस के बाद विश्वविद्यालय तक लड़के ही तो उस के साथी थे. कुछ लड़के बहुत केयरिंग थे सच्चे दोस्तों जैसे पर कुछ लड़के लड़कियों से दोस्ती सिर्फ उन के शरीर तक ही रखते थे.
उस तरह के लड़के, पुरुष हर जगह टकराए, स्कूल, बाजार, रिश्तेदारी, सभी जगह चुभती निगाहें और कुहनियां.
किशोरावस्था में अपनी उम्र से दोगुने अंकल के द्वारा अपने साथ हुए यौन शोषण की भयानक यादों को कितनी मुश्किल से भुला पाई थी बीहू और अगर उस समय मां और पापा की सपोर्ट नहीं मिलती तो वह कब की आत्महत्या कर चुकी होती.
परिवार वालों का साथ पाने से बीहू मजबूत बनी रही और उस ने विश्वास रखा कि अगर उस के साथ गलत हुआ है तो उस की गलती नहीं बल्कि उस व्यक्ति की है जिस ने उस के साथ गलत किया है. सजा तो उस आदमी को मिलनी चाहिए.
बड़ी होती बीहू जानेअनजाने में लड़कों से अपनेआप को दूर ही रखने लगी. लड़कों की मौजूदगी उस के लिए दमघोटू बनने लगी. शादियों, पार्टियों में जाने से भी गुरेज करती थी बीहू और अगर जाए भी तो पापा के साए में ही खानापीना कर के वापस घर आ जाना. यही उस का पार्टी ऐंजौय करने का तरीका था.
पापा भी बीहू के चारों तरफ एक सुरक्षित सा घेरा बनाए रहते थे. धीरेधीरे युवा होती बीहू के मन में लड़कों के प्रति एक रीतापन सा छा गया जबकि लड़कियों की संगत उसे सुहाती थी.
बीहू के पापा की सरिया बनाने की फैक्टरी थी. पैसों की कोई कमी नही थी. अत:
बीहू ने पहले तो कौमर्स से ग्रैजुएशन किया और फिर अपने अंदर की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए थिएटर में काम करना चाहा जिस के लिए उस ने कोलकाता में जा कर ‘ललित स्कूल औफ ड्रामा’ में थिएटर की बारीकियां सीखने के लिए दाखिला ले लिया. यह डिप्लोमा 2 साल का था. बीहू को वहां रहने के लिए एक अच्छे कमरे की तलाश थी जो ड्रामा स्कूल से बहुत दूर न हो.
‘‘वैल तुम तो यूपी से आई है. हमारे स्कूल में यूपी का एक और लड़की है पर्सी नाम का. हम तुम्हें उस से मिलवा देंगे. तुम्हें उस से काफी मदद मिलेगी,’’ ड्रामा स्कूल के सिक्यूरिटी औफिसर ने बीहू से कहते ही मोबाइल पर एक नंबर डायल कर दिया. उधर से कोई बात करने लगा. बातचीत पर्सी से हो रही थी जिसे यह बताया जा रहा था कि अगर उसे रूमपार्टनर की जरूरत है तो वह आ कर बीहू से मिल सकती है क्योंकि बीहू भी उत्तर प्रदेश की है और पर्सी भी वहीं की है इसलिए कोलकाता में उत्तर प्रदेश वालों की आपस में खूब बनेगी.
वैसे तो बीहू को एकाकी रहना अधिक खलता नहीं था पर यहां परदेश में कोई अपने उधर का मिलना अच्छा लग रहा था उसे और अनजान पर्सी के लिए उस के दिल में पहले से ही एक सौफ्ट कौर्नर सा बन चुका था.
बीहू कुरसी पर बैठी हुई थी कि सामने से एक मौडर्न सी लड़की आती दिखाई दी, जिस ने टीशर्ट के ऊपर एक लूजर सी जैकेट डाल रखी थी. उस के बाल कटे हुए थे जोकि पूरी तरह लापरवाही से बिखरे हुए थे. पर्सी को देख कर ही एक टौमबौय जैसी फीलिंग आ रही थी.
आते ही पर्सी ने बीहू की तरफ हाथ बड़ाया, ‘‘मैं मुरादाबाद से हूं और तुम?’’
‘‘मैं नोएडा से,’’ बीहू ने जवाब दिया.
‘‘थिएटर के शौक ने हम दोनों को बड़ी दूर ला दिया, पर अब तुम मिल गई हो तो थोड़ा अकेलापन कम लगेगा,’’ पर्सी बहुत जल्दी मिक्सअप हो गई जैसे वह बीहू को पहले से जानती हो.
पर्सी एक महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. वह एक मध्यवर्गीय परिवार से थी और फिल्मों में काम करना चाहती थी, पर जहां भी ट्राई किया हर आदमी ने उस का शोषण ही करना चाहा. फिर फिल्म इंडस्ट्री में कोई गौडफादर नहीं होने के कारण पर्सी ने पैसे कमाने के लिए थिएटर की ओर रुख किया. जिस दिन पर्सी के पास खूब ढेर सारे पैसे हो जाएंगे उस दिन वह वापस अपने घर लौट जाएगी. जहां जा कर वह अपनी 2 छोटी बहनों की पढ़ाईलिखाई और मांबाप की जिम्मेदारी निभाएगी.
बीहू बहुत अधिक सामान ले कर नहीं आई थी. सिर्फ एक बड़ा सा ब्रीफकेस था जो आसानी से कैब में रख लिया गया और ड्राइवर ने जीपीएस में पहुंचने का स्थान साकेत नगर डाल दिया. बहुत दूर नहीं था साकेत नगर, मात्र 15 मिनट की ड्राइविंग के बाद ही मंजिल आ गई दोनों की.
कैब का बिल देने में खुद पर्सी ने देर नहीं करी और बीहू को ले कर फट से अपने कमरे की ओर बढ़ चली.
बीहू ने फोन पर सब ठीक होने की जानकारी अपने मांबाप को दी और उस दिन थकी होने के कारण जल्दी सो गई. अगले दिन क्लास थी, जहां पर बीहू ने बड़ी सहजता से सारे किरदार निभा लिए, उस की किरदारों में जमने की क्षमता को देख कर पर्सी भी हैरान रह गई थी. आज पहले दिन ही अपने सीनियर्स और साथी कलाकारों की वाहवाही लूटी ली थी बीहू ने. पर बीहू सिर्फ उदासी भरे किरदार ही अच्छे से निभा पाती थी जबकि उसे कई बार सर ने यह बताया कि थिएटर का एक अच्छा कलाकार बनने के लिए यह जरूरी है कि वह हर तरह का किरदार निभाए.
बीहू ने सर की बात का कोई विरोध नहीं किया और पर्सी और बीहू दोनों कौफी पी कर अपने कमरे में चली आईं.
आज मौसम खराब था. रहरह कर बिजली कड़क जाती थी. बीहू खिड़की से बाहर देख रही थी. तभी बारिश के एक झोके ने उसे खिड़की बंद कर देने पर मजबूर कर दिया.
‘‘बिलकुल इसी खिड़की की तरह तुम ने अपने को बंद कर रखा है बीहू, कम औन यार, कुछ तो खुलो कोई बौयफ्रैंड. कोई गर्लफ्रैंड,’’ पर्सी ने बीहू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा तो बीहू के अंदर का दर्द जाग उठा और वह कुछ न कह पाई. शब्द घुट कर रह गए और सिसकी निकल पड़ी.
उस की सिसकी सुन कर पर्सी समझ गई कि बीहू ने बहुत कुछ अपने अंदर छिपा रखा है. उस ने बीहू से कुछ नहीं कहा. उस पूरी रात बीहू पर्सी से लिपट कर सोई.
भले ही बीहू के मन में कुछ नहीं था पर इस तरह से लिपट कर सोने को पर्सी ने एक मौन आमंत्रण माना और अगले दिन जब बीहू सोने चली तो खुद पर्सी उस से लिपट गई और उस की पीठ को सहलाने लगी. पीठ से उस के हाथ बीहू की जांघ के आसपास हरकत करने लगे थे.
बीहू पहले तो थोड़ी असहज लगी पर जल्द ही उसे पर्सी का अपने यौननांगों के इतने निकट आना अच्छा लग रहा था. बीहू पर्सी की गरम सांसों को अपने अंगों में महसूस कर सकती थी और पर्सी के हाथ लगातार बीहू के शरीर पर हरकत करते रहे जब तक बीहू चरम पर नहीं पहुंच गई. उस के बाद पर्सी ने भी चरम सुख प्राप्त कर लिया.