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डा. बत्रा की टेबल पर पड़ी उस की रिपोर्ट्स मानो उस से अब तक की लाइफस्टाइल का हिसाब मांग रही हों. डा. बत्रा की एकएक बात उस के कानों में गूंज रही थी. ‘‘इट्स टू लेट मिस कनिका, नाउ यू हैव टू गिव बर्थ टू दिस चाइल्ड. वी कांट टेक रिस्क.’’ डाक्टर बत्रा ने सीधे शब्दों में जब उस से कहा तो वह गिरतेगिरते बची. रोनित ने बड़ी मुश्किल से उसे संभाला. कुछ चैतन्य होने पर उस ने फिर डाक्टर से कहा, ‘‘डाक्टर, कोई उपाय तो होगा. मैं इन सब  झं झटों में नहीं पड़ना चाहती. ऐंड आई कांट अफोर्ड दिस चाइल्ड, प्लीज एनी हाउ अबौर्ट इट.’’

‘‘नहीं मिस कनिका, आप का अबौर्शन नहीं हो सकता. इट्स टू लेट नाउ. दूसरे, आप को फिजिकली इतनी प्रौब्लम्स हैं कि अबौर्शन से आप की जान को खतरा हो सकता है. आप की बौडी अबौर्शन नहीं सह सकती. मैं ने दवाएं लिख दी हैं, आप इन्हें लेती रहेंगी तो समस्या कम होगी,’’ कह कर डाक्टर अपने केबिन से बाहर राउंड पर चली गईं.

उस ने रोनित की ओर देखा, पर उस की आंखों में भी कुछ न कर पाने की बेबसी  झलक रही थी. उस ने सहारा दे कर कनिका को उठाया और बाहर आ कर एक टैक्सी को आवाज लगाई. टैक्सी में दोनों ने आपस में कोई बात नहीं की. घर पहुंच कर रोनित ने उस से कहा, ‘‘तुम आराम करो, मैं औफिस जा रहा हूं. दवाइयां टेबल पर रखी हैं.’’ और उस के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वह घर से चला गया. जरूरी दवाइयां ले कर कनिका बिस्तर पर लेट गई.

आंखें बंद करते ही वह आज से 8 वर्ष पूर्व की यादों में जा पहुंची जब उस का बीए कर के टीसीएस कंपनी में प्लेसमैंट हुआ था. अपौइंटमैंट लैटर हाथ में आते ही उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उसे लग रहा था आज ही जा कर नौकरी जौइन कर ले. पर जौइनिंग 3 माह बाद की थी. घर में घुसते ही मां के गले लिपट गई थी वह.

‘मां, मां, कहां हो? जल्दी से मिठाई बांटो.’

‘क्या हुआ? क्यों इतना खुश हो रही है?’ मां ने कमरे से बाहर आते हुए पूछा.

‘मां, आप की बेटी की नौकरी लग गई, यह देखो अपौइंटमैंट लैटर.’ कनिका ने अपना नियुक्तिपत्र मां के हाथों में रख दिया. मां की खुशी का पारावार नहीं था. पिताजी के आने पर मां ने उन का मुंह मीठा कराते हुए उस की सफलता की सूचना दी. पिताजी ने बिना कोई उत्साह दिखाए मिठाई खा ली और अपने कमरे में चले गए. पिता की ऐसी प्रतिक्रिया देख कर कनिका हैरान हो कर उन के पीछेपीछे चल दी और उन के गले में बांहें डाल कर बड़े लाड़ से बोली, ‘पापा, आप मेरी सफलता से खुश नहीं हैं क्या?’

‘नहीं बेटा, ऐसा नहीं है कि मैं खुश नहीं हूं, पर मैं चाहता हूं कि तू पीजी कर ले ताकि और अधिक अच्छे पैकेज वाली नौकरी मिले क्योंकि यह नौकरी ऐसी है कि घर छोड़ कर इतनी दूर रहना पड़ेगा. यहां इंदौर में ही मिल जाती तो ठीक था. इतनी सैलरी से तो पुणे में तेरा ही खर्च नहीं निकलेगा,’ पापा ने प्यार से उसे सम झाते हुए कहा.

‘नहीं पापा, पीजीवीजी करना तो अब मेरे बस का है ही नहीं. क्योंकि अब और पढ़ाई मु झ से नहीं होगी. अब तो बस मैं नौकरी कर के महानगर में रह कर लाइफ एंजौय करना चाहती हूं,’ कह कर मानो उस ने अपना निर्णय सुना दिया था.

‘जैसी तुम्हारी मरजी,’ कह कर पापा कमरे से बाहर चले गए थे. यों भी पापा कभी किसी से अपनी बात जबरदस्ती नहीं मनवाते थे. सो, उस ने इतना ध्यान नहीं दिया. फिर मां तो पूरी तरह उस के साथ थीं. 3 माह बाद पापा की इच्छा के विरुद्ध वह पुणे जैसे महानगर में नौकरी करने आ गई. यहां आ कर शहर की चकाचौंध ने तो उसे अभिभूत ही कर दिया था. आते समय मां के कहे शब्द आज उसे बारबार याद आ रहे थे.

‘बेटी, अभी तक तू छोटे शहर में रही है. इतने बड़े शहर में जा कर वहां की चकाचौंध में भटक मत जाना. बड़े नाजों से पाला है तु झे. कहीं भी रहना, पर अपने परिवार के मानसम्मान और संस्कार कभी मत भूलना.’

उफ, वह कैसे यहां आ कर सब भूल गई और आज इस स्थिति में आ गईर् कि उस का अपना जीवन ही दांव पर लग गया है. उसे याद है वह दिन जब उस की अपने औफिस के सहकर्मी रोनित से दोस्ती हुई थी. शाम के साढ़े 5 बजे वह औफिस से होस्टल जाने के लिए बसस्टौप पर खड़ी हुई थी कि तभी रोनित की बाइक उस के सामने आ कर रुकी. ‘आइए, मैं आप को होस्टल छोड़ देता हूं.’

‘नहीं, मैं चली जाऊंगी, आप निकल जाएं.’ कनिका ने सकुचाते हुए कहा तो रोनित बोला, ‘‘पानी बरस रहा है. भीग जाएंगी. संकोच मत करिए. आइए, बैठ जाइए. औफिस का ही बंदा हूं, विश्वास तो कर ही सकती हैं आप.’ जब रोनित ने इतना आग्रह किया तो वह टाल न सकी और उस के पीछे सट कर बैठ गई.

किसी पुरुष के पीछे इस प्रकार बैठने का उस का यह पहला अनुभव था. उस का रोमरोम उस समय खिल उठा था, मन कर रहा था यह सुहाना सफर कभी समाप्त ही न हो. पर कुछ ही देर बाद रोनित ने बाइक रोक दी तो मानो वह नींद से जागी थी. हड़बड़ा कर नीचे उतर कर खड़ी हो गई. होस्टल के बाहर उसे छोड़ते समय रोनित मुसकराते हुए बोला, ‘जब भी जरूरत पड़े, याद करिएगा. बंदा हाजिर हो जाएगा.’

कनिका ने खुशी से हुलसते हुए ‘जी’ कहा और पर्स को हवा में  झुलाते हुए अपने कमरे में पहुंची. आज न जाने क्यों उसे मन ही मन बहुत अच्छा और अलग सा महसूस हो रहा था. पूरी रात वह रोनित के बारे में ही सोचती रही. अगले दिन जब वह औफिस पहुंची तो रोनित गेट पर ही मिल गया.

‘हैलो, गुडमौर्निंग मैडम, रात में नींद आई कि नहीं या मेरे बारे में ही सोचती रहीं.’ उस ने खिलखिलाते हुए कहा तो वह भी हंस पड़ी.

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