कहानी के बाकी भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
0:00
12:24

अपनी हवस शांत कर लेने के बाद महेश ने कहा, ‘‘उर्वशी, यह बात किसी को भी नहीं बताना, यह बात तुम अगर अपने घर पर बताओगी तो तुम्हारे मम्मीपापा तुम्हें बहुत मारेंगे.’’

महेश ने बारबार प्यार से कह कर उस के दिमाग में यह भर दिया कि यह बात किसी को भी नहीं बतानी है. कमजोर पड़ चुकी उर्वशी खुद से कपड़े भी नहीं पहन पा रही थी, वह लगातार रो रही थी, तब महेश ने खुद ही उसे कपड़े पहना दिए.

उर्वशी के कोमल होंठ नीले पड़ चुके थे, उस की ऐसी हालत देख कर महेश ने उसे समझया, ‘‘उर्वशी, अपने घर जा कर कहना कि रेस के समय तुम बहुत जोर से गिर गई थीं, इसलिए चोट लग गई है.’’

उर्वशी कितनी भी छोटी हो, किंतु वह यह तो समझ ही गई थी कि उस के साथ यह बहुत ही बुरा हुआ है. वहां से निकल कर महेश ने उर्वशी को उस के घर के पास ही छोड़ दिया और खुद तेजी से कार भगा कर चला गया.

उर्वशी किसी तरह से कराहती हुई घर पहुंची और बैल बजाई. विनीता दरवाजा खोलने आई और उर्वशी की ऐसी हालत देख कर उस के मुंह से चीख निकल गई, ‘‘क्या हुआ मेरी बच्ची को?’’

विनीता की चीख सुनते ही विवेक भी वहां आ गया और अपनी बेटी को इस हालत में देख कर वह भी घबरा गया. उर्वशी को विनीता ने गले से लगा लिया, वह जोरजोर से रो रही थी.

विवेक और विनीता हैरान थे, डरे हुए थे, ‘‘क्या हो गया बेटा?’’ वे बारबार पूछ रहे थे, किंतु उर्वशी कुछ भी नहीं बोल रही थी, केवल रोती ही जा रही थी.

आखिरकार उर्वशी ने उन्हें बताया, ‘‘मम्मी, मैं रेस के समय बहुत ज्यादा जोर से गिर गई थी. मुझे बहुत चोट आई है, सब दुख रहा है, मुझे नींद भी आ रही है, मुझे सोने दो मम्मा.’’

‘‘नहीं बेटा चलो पहले मैं तुम्हें नहला देती हूं, कपड़े बदल कर डाक्टर को भी दिखा देते हैं, तुम्हारे होंठों पर कितनी चोट लगी है,’’ कहते हुए उर्वशी का हाथ पकड़ कर विनीता उसे नहलाने ले गई.

उर्वशी को बाथरूम में नहलाते समय उस के कपड़ों पर खून के निशान देख कर विनीता चौंक कर चीख उठी, ‘‘उर्वशी बेटा यह ब्लड कैसे निकला तुम्हें?’’

विनीता घबरा गई और टौवेल में लपेट कर उर्वशी को बाहर ले आई. उस ने विवेक को उर्वशी के कपड़े दिखा कर रोते हुए कहा, ‘‘विवेक, हमारी बच्ची के साथ…’’

विवेक ने बीच में ही उसे रोक कर उर्वशी से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारे साथ क्या हुआ? किसी ने तुम्हारे साथ गंदी बात की है क्या? किस ने किया, कौन था वह बताओ?’’

उर्वशी ने डरी हुई आवाज में कहा, ‘‘मैं रेस के समय गिर गई थी इसलिए लग गई है पापा.’’

तभी विनीता ने कहा, ‘‘उर्वशी बेटा सच बताओ, गिरने से ऐसी जगह पर चोट नहीं लगती.’’

उर्वशी ने कहा, ‘‘आप मुझे मारोगी न मम्मा.’’

‘‘मैं तुम्हें बिलकुल नहीं मारूंगी बेटा, कोई नहीं मारेगा, सब सचसच बताओ, तुम्हारे साथ क्या हुआ?’’

‘‘मम्मा महेश सर ने कहा था कि यह बात किसी को भी मत बताना वरना वे लोग तुम्हें मारेंगे.’’

विनीता ने बहुत प्यार से पटा कर उस से सारी बात पूछी. उर्वशी ने रोतेरोते सबकुछ बता दिया. मांबाप की तो मानो दुनिया ही लुट गई, अपनी बेटी की ऐसी दुर्दशा पर वे दोनों फूटफूट कर रोने लगे. वे खुद को दोषी समझने लगे कि उन्होंने उस इंसान पर भरोसा ही क्यों किया? उर्वशी के दादादादी भी अपनी पोती की ऐसी हालत देख कर रोने लगे.

तभी विवेक ने कहा, ‘‘विनीता, चलो पुलिस में शिकायत दर्ज करा देते हैं, उस पापी को इस कुकर्म की सजा मिलनी ही चाहिए.’’

किंतु विनीता ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘नहीं, विवेक हम मध्यवर्गीय लोग हैं, यदि एक बार हमारी बच्ची के विषय में यह पता चल जाएगा तो समाज में उस का जीना मुश्किल हो जाएगा. लोग उसे अलग नजरों से देखेंगे और जब वह बड़ी होगी तो कौन करेगा इस दाग के साथ उस से शादी?’’

तभी विनीता ने उर्वशी से कहा, ‘‘उर्वशी बेटा यह बात किसी को भी मत बताना, अपने होंठों पर ताला लगा लो और जितनी जल्दी हो सके इसे भूलने की कोशिश करना.’’

विवेक ने जब डाक्टर के पास चलने को कहा तो बदनामी के डर से विनीता ने मना कर दिया और कहा, ‘‘घर पर ही दवा लगा कर ठीक करेंगे.’’

उर्वशी सोचने लगी कि जो बात उसे सर ने कही थी कि किसी को भी नहीं बताना, वही बात मम्मी भी कह रही हैं

अपनी मम्मी की बात मान कर उर्वशी ने अपने होंठों को तो सिल लिया, लेकिन अपने मन का वह क्या करे, जिस से वह घटना निकलती ही नहीं? उस भयानक घटना का खौफ हर समय उस के दिल में साया बन कर मंडराने लगा.

विवेक और विनीता ने मिल कर यह निर्णय लिया कि वे देवास छोड़ कर कहीं और चले जाएंगे ताकि नए माहौल में उर्वशी यह सब भूल जाए. जल्द ही विवेक ने स्कूल जा कर उर्वशी का नाम वहां से कटवा लिया और अपना ट्रांसफर भोपाल करवा लिया. वे देवास छोड़ कर चले गए.

शारीरिक तौर पर उर्वशी धीरेधीरे स्वस्थ हो रही थी, किंतु मानसिक तौर पर वह सदमे में ही थी. भोपाल आ कर उर्वशी को स्कूल में दाखिला मिल गया. पूरा परिवार हर समय उर्वशी को खुश रखने की कोशिश में लगा रहता था. लाख कोशिश के बाद भी उर्वशी के चेहरे पर पहले की तरह मुसकान नहीं आ पा रही थी.

उधर कुछ दिनों तक महेश छुट्टी पर ही रहा. जब उसे विश्वास हो गया कि उस के खिलाफ कहीं कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है तभी उस ने पुन: स्कूल आना शुरू किया. तब उसे पता चला कि उर्वशी ने तो स्कूल छोड़ दिया है और वह लोग कहीं और चले गए हैं. अब महेश अपने द्वारा किए गए पाप के डर से मुक्त हो गया. ऐसे लोग शायद जानते हैं कि बदनामी के डर से पीडि़त लड़की का परिवार चुप्पी साध लेगा.

धीरेधीरे समय व्यतीत हो रहा था, उर्वशी अब बड़ी हो रही थी और बड़े होने के साथ ही वह यह भी समझ चुकी थी कि उस के साथ बलात्कार हुआ था. ‘किसी से भी कुछ नहीं कहना, अपने होंठों पर ताला लगा लो,’ ये शब्द उसे आज भी याद थे जो उसे परेशान कर देते थे, साथ ही उसे अपने पापा के शब्द भी याद थे कि उस पापी को इस कुकर्म की सजा मिलनी ही चाहिए. अभी तक वह अपने साथ हुई जबरदस्ती को भूल नहीं पाई थी.

वक्त के साथसाथ उर्वशी की नफरत भी बढ़ती ही जा रही थी. वह अपने मन में अब तक यह दृढ़ निश्चय कर चुकी थी कि किसी भी कीमत पर उस चरित्रहीन इंसान से बदला लेना ही है. उर्वशी की ऐसी मनोदशा से उस का परिवार अनजान था. वे सब इस भ्रम में थे कि उर्वशी उस घटना को भूल चुकी है, लेकिन नफरत और बदले का ज्वालामुखी जो उर्वशी के अंदर धधक रहा था, उस का शांत होना इतना आसान नहीं था.

धीरेधीरे 12 वर्ष बीत गए अब तक उर्वशी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अपने कालेज के कैंपस में चयनित होने के उपरांत नौकरी के लिए उर्वशी ने देवास का चयन किया जहां वह इस खौफनाक घटना का शिकार हुई थी.

उर्वशी का यह निर्णय देख कर विवेक चिंताग्रस्त हो गए और फिर उर्वशी से पूछा, ‘‘बेटा उर्वशी देवास ही क्यों?’’

उर्वशी ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘पापा वही तो सब से पास है, जब भी मन करेगा आसानी से यहां आप के पास आ सकूंगी.’’

उर्वशी से बात करने के बाद रात में विवेक ने विनीता से कहा, ‘‘उर्वशी ने वही शहर क्यों पसंद किया, उस के पास और भी चौइस थी? मुझे चिंता हो रही है.’’

‘‘नहीं विवेक ऐसी तो कोई बात नहीं है, 12 वर्ष बीत गए हैं, तब वह बहुत छोटी थी, तुम बेकार में चिंता कर रहे हो.’’

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...