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इंटर की परीक्षा पास कर नलिनी ने जिस कालेज में प्रवेश लिया, इत्तफाक से उस की हमशक्ल ज्योति नाम की एक लड़की ने भी उसी कक्षा में दाखिला लिया. शुरूशुरू में तो लोग समझते रहे कि दोनों सगी जुड़वां बहनें होंगी परंतु जब धीरेधीरे पता चला कि ये बहनें नहीं हैं तो सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ.

लोगों के आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा जब ज्योति ने बताया कि वह इस वर्ष ही कानपुर से यहां आई है और नलिनी को जानती तक नहीं. इस चर्चा के कारण दोनों गहरी मित्र बन गईं. ज्योति तो बहुत मेधावी व चंचल थी परंतु नलिनी थोड़ी संकोची व अपने में सिकुड़ीसिमटी. ज्योति जीवन की भरपूर हिलोरे लेती नदिया सी लहराती बहती दिखती थी, वहीं नलिनी शांत, स्थिर जल के समान थी. यही अंतर दोनों में भेद रख सकता था वरना यदि दोनों को समान वेशभूषा व समान बालों की बनावट कर खड़ा कर दिया जाता तो उन के अभिभावक तक धोखा खा सकते थे.

धीरेधीरे यह बात उन के घरों तक भी पहुंची. नलिनी के घर में कोई तवज्जुह न दी गई. हंसीहंसी में बात उड़ गई. शायद विपुला की स्मरणशक्ति भी धूमिल पड़ चुकी थी. वकील साहब यानी नलिनी के पिता ने एक कान से सुनी, दूसरे से निकाल दी. वैसे भी वे बेटियों को महत्त्व ही कब देते थे.

किंतु ज्योति के पिता डा. प्रशांत ने जब यह सुना तो उन्हें थोड़ा ताज्जुब हुआ चूंकि उन की एकमात्र संतान ज्योति ही थी, वे उस की खुशियों का इतना अधिक खयाल रखते थे कि उस की छोटीछोटी बातों को भी पूरा कर के उन्हें संतोष मिलता था. पत्नी नवजात शिशु को जन्म देते ही इस दुनिया से चल बसी थी. वे इसी बच्ची को चिपकाए रहे. उन्होंने दूसरी शादी नहीं की. उन की सारी खुशियां ज्योति के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थीं.

ज्योति के कालेज में  वार्षिकोत्सव था. डा. प्रशांत हमेशा की भांति वहां गए. ज्योति अपनी सहेली नलिनी को अपने पिता से मिलवाने ले गई. नलिनी ने दोनों हाथ जोड़ कर उन का अभिवादन किया. डा. प्रशांत तो यह समानता देख ठगे से रह गए. वे एकटक निहारते रहे. यह देख ज्योति उन की आंखों के आगे हाथ से पंखा करती हंसती हुई बोली, ‘‘पिताजी, कहां खो गए? है न बिलकुल मेरी तरह?’’

वे मानो उस को देखते ही अपनी सुधबुध क्षणभर को खो बैठे थे. सामान्य होते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

सकुचाते हुए वह बोली, ‘‘नलिनी.’’

‘‘तुम्हारे मातापिता भी आए हैं?’’

नलिनी दुखी स्वर में बोली, ‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पता नहीं, शायद दिलचस्पी नहीं ली है.’’

वे एक कटु मुसकान छोड़ उसे पुचकारते से स्वर में बोले, ‘‘अच्छा बेटा, जाओ.’’

ज्योति नलिनी का हाथ पकड़ उछलतेकूदते छात्राओं की पंक्ति में जा कर बैठ गई. डा. प्रशांत कार्यक्रम तो जरूर देख रहे थे पर उन का ध्यान कहीं दूसरी ओर था. बैठेबैठे उन्हें ध्यान आया कि नलिनी के घर का पता व फोन नंबर पूछना तो वे भूल ही गए. ज्यों ही समारोह समाप्त हुआ उन की बेटी ज्योति पास आई और बोली, ‘‘पिताजी, नलिनी को भी ले चलें. उस के घर पर छोड़ देंगे.’’

‘‘क्यों, क्या उस के घर से उसे लेने कोई नहीं आया?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है, उस का भाई आया होगा. परंतु मैं उस का घर देखना चाहती हूं.’’

‘‘अच्छा, ठीक है.’’

नलिनी का भाई सचमुच मोटरसाइकिल लिए खड़ा था. परंतु ज्योति ने हठ कर के उसे अपने साथ कार में बैठा लिया. नलिनी भी कुछ न बोली. इसी बहाने डा. प्रशांत ने भी उस का घर देख लिया. वह उतरने लगी तो उन्होंने पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारे यहां फोन है?’’

‘‘घर पर नहीं है, पिताजी के दफ्तर में है.’’

‘‘जरा नंबर बताना,’’ डा. प्रशांत ने जेब से छोटी डायरी निकाली और नंबर नोट किया.

नमस्ते व धन्यवाद कह कर नलिनी घर में चली गई.

डा. प्रशांत रातभर ठीक से सो न सके. बड़ी उथलपुथल सी उन के हृदय में मची रही. 2 लड़कियों की शक्लसूरत व उम्र की इतनी समानता देख वे दुविधा में पड़ गए थे. अगले दिन उन्होंने नलिनी के पिता को फोन किया. उन्होंने फोन पर ही अपना पूरा परिचय दिया और पूछा, ‘‘क्या आप की बेटी नलिनी का जन्म 4 जनवरी, 1974 को कानपुर के भारत अस्पताल में हुआ था?’’

उधर वकील साहब का स्वर गूंजा, ‘‘बिलकुल सही फरमाया आप ने. तारीख और सन मुझे इसलिए भी याद है क्योंकि मेरे बेटे की जन्मतिथि भी वही है. समय मैं बता देता हूं, रात के करीब 12 बज कर 10 मिनट.’’

डा. प्रशांत फोन पर ही चकित हो उठे. इसी समय के आसपास तो उन की बेटी भी पैदा हुई थी. उन्होंने मन ही मन सोचा, ‘अभी तक किस्सेकहानियों में ही ऐसी बातें पढ़ने को मिलती थीं लेकिन क्या वास्तविक जीवन में भी ऐसा हो सकता है?’ उन का जिज्ञासु वैज्ञानिक मन यह मानने को बिलकुल तैयार नहीं था कि समान कदकाठी के चेहरेमोहरे की 2 लड़कियां 2 भिन्न परिवारों में पैदा हो सकती हैं.

डा. प्रशांत बड़े चुपचाप से रहने लगे, कहीं खोएखोए से. घंटों सोचा करते, पर कोई निष्कर्ष निकालने में सफल न हो पाते. ज्योति भी पिता की इस स्थिति से अनभिज्ञ न थी. परंतु उन के दुख व चिंता का कारण भी वह न समझ पा रही थी. एक दिन पिता के गले झूलते हुए बोली, ‘‘क्या मुझ से कोई गलती हो गई, पिताजी?’’

‘‘नहीं, बेटे.’’

‘‘फिर आप इतना गुमसुम क्यों रहते हैं? मुझे आप का इतना गंभीर होना बहुत खलता है, पिताजी.’’

डा. प्रशांत बेटी के गाल थपथपा कर हंस दिए और बोले, ‘‘बेटा, तुम अपनी सहेली को इतवार के दिन घर ले आना, हम सब बैडमिंटन खेलेंगे.’’

ज्योति खुशीखुशी चली गई. डा. प्रशांत का वैज्ञानिक दिमाग कुछ परीक्षण कर लेना चाहता था.

इतवार को गाड़ी ले ज्योति अपनी सहेली के घर उसे लाने गई तो डा. प्रशांत लौन में ही बेचैनी से टहलते रहे और सोचते रहे, अपने परीक्षण के विषय में. इंतजार में घडि़यां बीत रही थीं और ज्योति का कहीं अतापता न था. अंत में गाड़ी बंगले में दाखिल हुई.

परंतु यह क्या? नलिनी तो उस के साथ नहीं थी. यह तो कोई और ही लड़की थी.  ज्योति को क्या मालूम कि उस के पिता के दिमाग में क्या गूंज रहा है या वह किस विशेष सहेली को लाने को बोले थे. वह पास आते हुए बड़ी शान से बोली, ‘‘चलिए, अब खेलते हैं. गीता बेजोड़ है बैडमिंटन में.’’

डा. प्रशांत इस पर क्या बोलते, उन का तो तीर खाली चला गया था. वे धीरे से बोले, ‘‘और वह तुम्हारी सहेली क्या नाम बताया था, हां, नलिनी, उसे क्यों नहीं लाईं?’’

ज्योति हंस दी, ‘‘पिताजी, उसे खेलने में विशेष दिलचस्पी नहीं है.’’

डा. प्रशांत ने मन ही मन अपने को कोसा. चूंकि वे बेटी से वादा कर चुके थे. इसलिए बड़े मरे मन से बैडमिंटन खेलने लगे. बच्चों के साथ खेलतेखेलते थोड़ी देर को वास्तव में भूल गए अपने परीक्षण व परिणाम को और उन के साथ नोकझोंक करते खेलने लगे.

एक दिन इत्तफाक से नलिनी स्वयं अपने भाई के साथ डा. प्रशांत के क्लीनिक पहुंच गई. उस के गाल में सूजन आ गई थी. अंदर की दाढ़ में काफी दर्द था. डा. प्रशांत को तो मानो बिना लागलपेट के परीक्षण करने का सुराग हाथ लग गया था. कहां तो उन्होंने सोचा था कि ज्योति जब नलिनी को ले कर घर आएगी तो खेल तो एक बहाना होगा, वास्तव में तो उस का दंत परीक्षण मजाकमजाक में कर अपनी शंका दूर करेंगे.

उन्होंने नलिनी का मुख खोल कर परीक्षण किया. उस का इलाज तो किया ही साथ ही, यह भी नोट किया कि नलिनी के पीछे संपूर्ण दांत न हो कर केवल 2 ही दांत हैं. सुबह उन्होंने ज्योति को बुलाया और उस का दंत परीक्षण किया. वे दंग रह गए. उस के भी पीछे केवल 2 ही दांत थे. उन्हें विश्वास हो गया कि ज्योति व नलिनी दोनों जुड़वां ही हैं. जरूर किसी ने बीच में शरारत की है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उन की एक बेटी किसी ने चुराई हो? उन का मन व्याकुल हो उठा. डा. प्रशांत तो पत्नी के प्रसव से 8 माह पूर्व ही विदेश चले गए थे. उन्हें तो जब पत्नी के निधन का समाचार मिला था तब भागे चले आए थे.

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