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”आज टाइम से आ जाना, अमोली. कोई बहाना नहीं चलेगा. कोरोना टाइम ने तो वैसे ही बोर कर के रख दिया है, अब बड़ी मुश्किल से आज गेटटुगेदर का प्रोग्राम बना है, मिस मत करना. सोमा बता रही थी कि उस ने तुझे पिछले हफ्ते भी अपने बेटे के जन्मदिन पर बुलाया था और तू गई नहीं थी. वैसे, तू गई क्यों नहीं थी?’’

मैं ने एक ठंडी सांस ली और कहा, ”तू तो जानती है जयराज के प्रोग्राम. उन्हें अपने क्लब का प्रोग्राम अटैंड करना था और मुझे भी हमेशा की तरह टांग कर ले गए. यार, जा कर बड़ी बोर हुई. वहां क्लब की औरतें जो भजनकीर्तन शुरू कर देती हैं, मन करता है कि वहां से भाग खड़ी होऊं, पर बैठी रहती हूं. और पता है, वहां औरतें क्या करती हैं, एकदूसरे के बच्चों की शादी में इतनी रुचि लेती हैं कि पूछो मत. मुझे उन लोगों की बातों पर बहुत गुस्सा आता है.’’

“तू जीजाजी को साफसाफ कह क्यों नहीं देती कि तुझे भजनमंडली में कोई रुचि नहीं है? क्यों अपना मन मारती है?’’

“कभीकभी कह भी देती हूं तो वे मुंह लटका लेते हैं, कहते कुछ नहीं. पर अपनी नाराजगी दिखा देते हैं.’’

“यार, सच में पति अगर 12 साल बड़ा हो, तो निभाना आसान नहीं है न. कितना फर्क होता है शौकों में.’’

मेरी दोस्त आशी ने फोन रख दिया, तो मैं यों ही अपने फ्लैट की बालकनी में रखी चेयर पर आ कर बैठ गई. मुझ से 12 साल बड़े हैं जयराज. बहुत अच्छे इनसान हैं, हमारा विवाह घर वालों ने वैसे ही तय किया था, जैसे कि पुराने जमाने की सोच वाले पैरेंट्स तय करते थे, मैं 5 भाईबहनों में तीसरे नंबर की थी, जयराज अच्छा कमाते हैं, अच्छा खातापीता परिवार. बस और क्या देखना था, हो गई शादी. 2 बच्चे भी हो गए, दोनों अब विदेश में पढ़ रहे हैं, जयराज को मेरा नौकरी करना पसंद नहीं था तो नहीं कर पाई. ऊपरऊपर से देखने में सब को लगता है कि मुझ से सुखी औरत दुनिया में कोई दूसरी नहीं होगी, पर ये जो जयराज और मेरी उम्र में 12 साल का अंतर है न, इस ने मेरे जीवन पर अजीब सा प्रभाव डाला है. धीरगंभीर जयराज जैसे मुसकराना भी नहीं जानते, हंसीठहाके दूर की बात है. मेरे सजनेसंवरने में उन्हें कोई रुचि नहीं. हर गलती पर ऐसे टोकते हैं, जैसे कोई टीचर हों. हर समय ज्ञान. हर बात पर ज्ञान. हमारे जीवन में कोई रोमांस, रोमांच नहीं. सपाट दौड़ता गया है जीवन. उन्हें पूजापाठ में रुचि है, बस. मैं उन से बिलकुल उलटी. मुझे हर समय मजाक, हंसी, मस्ती सूझती है, पर करूं किस से? कभी कोई जोक मारती हूं तो ऐसे देखते हैं जैसे कितनी बकवास कर दी है. कभीकभी मैं चिढ़ कर कह भी देती हूं, “यार, जोक मारा है, थोड़ा मुसकरा सकते हो?’’

तो वे कहते हैं, “क्या बचकानी बातें कर रही हो? और फिर मुझ से उम्मीद करती हो कि मैं हंसू भी?’’
क्या किया जाए, जयराज और मेरी उम्र में जो अंतर है, वो तो है ही, हमारे स्वभाव, व्यवहार में भी बहुत अंतर है. कभीकभी सोचती हूं कि कैसे 2 बिलकुल अलगअलग लोग जीवन साथ काट जाते हैं, यह आजीवन कैद जैसा जीवन नहीं होता?

उस दिन रविवार था. मैं ने सुबह ही कह दिया था कि बहुत दिन हो गए हैं, आज शाम को चाट खाने चलेंगे. हम गए भी, वहां जा कर एक कोने में खड़े हो कर बोले, “तुम्हारे साथ आ तो गया हूं, पर कुछ खाऊंगा नहीं.’’

“क्यों…?’’

“मुझे अपनी हेल्थ का ध्यान रखना है. तुम्हारा क्या है, तुम्हें तो सब हजम हो जाता है, सबकुछ खाती घूमती हो.’’

यह सुन कर मेरा मन खराब हो गया. इस से अच्छा तो मैं किसी फ्रैंड को ले कर आ जाती, ये दूर खड़े अपने फोन में व्यस्त हो गए, मैं अकेली गोलगप्पे खाने लगी. उस दिन सिर्फ तीखे पानी से मेरी आंखों से आंसू नहीं निकले थे, अजीब से क्षोभ से भरे आंसू थे वे. कभीकभी मुझे अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आता है कि बस निबटाने के चक्कर में मेरी शादी करवा दी. कुछ भी तो नहीं मिलता हम में. कुछ भी तो एकजैसा नहीं है.

अभी कुछ सालों से तो जयराज ने क्लब ज्वाइन कर लिया है और साथ में मेरी मैंबरशिप भी ले ली है, अब यह क्लब वो क्लब नहीं हैं, जहां वीकेंड में जा कर मस्ती की जाती है, इन का ग्रुप क्लब में जा कर सत्संग, भजन करता है. ये चाहते हैं कि मैं भी आंखें बंद कर तालियां बजाते हुए भक्ति रस में डूबी रहूं, पर मुझे श्रृंगार रस और हास्य रस सूझता है, मूवी देखने का मन करता है, खिलखिलाने का मन करता है, शारीरिक रूप से सब ठीक ही चल रहा है, पर मन की भी तो एक जरूरत है, मानसिक स्तर पर भी तो संगसाथ चाहिए होता है. आजकल हम दोनों सुबह की सैर पर एकसाथ जाने लगे हैं, वहां जा कर ये उन लोगों में शामिल हो जाते हैं, जो लाफ्टर योगा के नाम पर बहुत जोरजोर से हंसते हैं, ये वही लोग हैं, जिन पर मैं अब तक मन ही मन हंसती थी कि यहां झूठेमूठे हंस रहे हो, घर जा कर कभी घर वालों से हंसीठट्ठा कर लो, तो इस की जरूरत नहीं पड़ेगी, घर में तो ऐसे सड़े मूड में रहेंगे, यहां आ कर पता नहीं क्यों होहो करना है. अब क्या, जयराज भी तो यही कर रहे हैं, इस से अच्छा तो मेरे जोक्स पर हंस सकते हैं. हुंह.

मैं अभी मन ही मन अपने खयालों में डूबी हुई थी कि जयराज का औफिस से फोन आ गया, ”क्या कर रही हो?’’

“आप के बारे में सोच रही थी.’’

“क्या? बताओ तो जरा.’’

“नहीं, कुछ खास नहीं.’’

“अच्छा, सुनो, इस वीकेंड सुनील ने क्लब में एक पार्टी रखी है. उन की मैरिज एनिवर्सरी है. पहले पूजा है, फिर डिनर.’’

“तो, मैं डिनर के टाइम ही जाऊंगी.’’

“अमोली, ऐसा नहीं कहते, पूजा में भी बैठना चाहिए.’’

“मुझे वीकेंड में मूवी देखनी है.’’

“फिर से कोरोना का नया वैरिएंट सुनने में आ रहा है, भीड़ से बचना चाहिए.’’

“क्लब में आप की भजन पार्टी में भीड़ नहीं होती क्या?’’

“अरे, वो तो धर्मकर्म की चीज है.’’

मैं कुछ नहीं बोली, फिर थोड़ा ज्ञान आया, “अमोली, मना मत किया करो, सोशल सर्किल जरूरी है.’’

मेरे शरारती मन ने अंगड़ाई सी ली, कहा, “वहां कोई मुझ पर मरमिटा तो…?’’

“फिर तुम ने फालतू बातें शुरू कर दीं?’’

थोड़ी देर मुझे समझा कर जयराज ने फोन रख दिया. पर, अब मुझे शरारत सूझ चुकी थी, मुझे नहीं जीनी है बोरिंग लाइफ. कुछ तो थ्रिल होना ही चाहिए.

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