कहानी के बाकी भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
0:00
12:24

तू ने अपनी लिस्ट बना ली… किसकिस को कार्ड भेजना है?’’ ज्योत्स्ना ने अपनी बेटी भावना से पूछा.

‘‘जी मम्मी, यह रही मेरी लिस्ट. पर एक कार्ड आप मुझे दे दीजिए, अपने एक खास दोस्त को भेजना है.’’

यह कह कर भावना ने  एक कार्ड लिया, अपना बैग उठाया, अपनी गाड़ी निकाली और अस्पताल की ओर चल दी.

भावना कार चला रही थी. उस की आंखों में अपने पापा का बीमार चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, कातर आंखें घूम रही थीं, जो शायद उस से क्षमायाचना कर रही थीं. उस के पापा कुछ समय पहले ही उस अस्पताल में दाखिल हुए थे जहां वह काम कर रही थी. उन्हें पक्षाघात हुआ था. उस के मम्मीपापा जब वह 15 साल की थी, एकदूसरे से अलग हो गए थे.

पापा तो मम्मी से अलग हो गए लेकिन उस का हृदय पापा की याद में तड़पता रहा था.

मम्मी के अथक प्रयास व कड़ी मेहनत ने उस के पैरों तले ठोस जमीन दी. वह डाक्टर बन गई. मम्मी के सामने पापा का नाम लेना भी मुश्किल था और वह इस को गलत भी नहीं समझती थी, आखिर जिस सहचर पर मम्मी को अथाह विश्वास था, जिस की उंगली पकडे़ वह जीवन डगर पर निश्ंिचत हो आगे बढ़ रही थीं, वही एक दिन चुपचाप अपनी उंगली छुड़ा कर चल देगा यह तो वह सोच भी नहीं सकती थीं. जीवनसाथी के धोखे के बाद तो मम्मी की दुनिया में उन की स्कूल की छोटी सी नौकरी और भावना के अलावा किसी के लिए भी जगह नहीं थी.

भावना गाड़ी खड़ी कर अपने केबिन में पहुंची तो बाहर मरीजों की भीड़ लगी हुई थी. उस की सहयोगी डाक्टर केबिन में बैठी हुई थी.

ये भी पढ़ें- उस रात का सच : क्या थी असलियत

‘‘हैलो, डा. आर्या, कैसी हैं आप?’’

‘‘फाइन, डाक्टर. आज आप को देर हो गई. मरीजों की भीड़ लगी है.’’

‘‘हां, शादी की तैयारी के चलते आजकल थोड़ी देर हो जाती है.’’

इस के बाद भावना कुछ घंटों के लिए तो अपनेआप को भी भूल गई. 1 बजे  तक मरीज निबटे. उस ने एक कप चाय मंगवाई, धीरेधीरे चाय पीते हुए वह अतीत के दलदल में धंसने लगी.

पापा के यों चले जाने से वह इतनी आहत हुई थी कि उस ने मन ही मन विवाह न करने का फैसला कर लिया था. उस ने सोचा कि वह डाक्टर है और मानव सेवा व मम्मी की देखभाल में अपना जीवन गुजार देगी.

डा. अमन ने कितने ही तरीकों से उस के सामने प्रणय निवेदन किया पर उस ने हर बार ठुकरा दिया. जब मम्मी को पता चला तो उन्होंने उसे विवाह करने के लिए बहुत समझाया पर वह किसी भी तरह से तैयार नहीं हुई. मम्मी के जीवन के भयावह अनुभवों से उस के अंदर वैवाहिक जीवन के प्रति भारी कड़वाहट भर गई थी, जिसे वह किसी तरह भी अपने अंदर से निकाल नहीं पा रही थी. थकहार कर मम्मी भी चुप हो गईं.

लगभग 6 महीने पहले वह अस्पताल का राउंड लगा रही थी कि उसे एक बेड पर जानापहचाना सा चेहरा नजर आया. कृशकाय शरीर, खिचड़ी दाढ़ी…दर्द से कुम्हलाया चेहरा, वह पहचानने की कोशिश करने लगी. दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि यह तो उस के पापा का चेहरा है. क्या वह इस हाल में…यहां हो सकते हैं? उस के दिमाग में जैसे भूचाल सा मच गया.

उस ने नर्स की ओर देख कर पूछा, ‘सिस्टर, इन्हें क्या हुआ है?’

‘डाक्टर…बाईं तरफ लकवा पड़ा है. अब तो कुछ ठीक हो गए हैं.’

‘क्या नाम है इस मरीज का?’ कहते हुए वह खुद सामने लटके चार्ट को देखने लगी.

‘आशीश शर्मा.’

चार्ट पर लिखा यह नाम जहर बुझे तीर की तरह उस के दिल के आरपार हो गया. संज्ञाशून्य सी वह अपने मरीजों को देख कर वापस चली आई थी.

उस का हृदय अपने पापा की ऐसी हालत देख कर करुणा से छटपटा गया था. यद्यपि वह उस के मरीज नहीं थे पर वह उन के केश में दिलचस्पी लेने लगी. वह जब भी डाक्टर से उन के बारे में बात करती तो इस बात का ध्यान रखती कि डाक्टर को यह न लगे कि वह इस मरीज में इतनी रुचि क्यों ले रही हैं. उस ने अपने पापा को भी यह आभास नहीं होने दिया कि वह उन को पहचान गई है.

उस के पापा लगभग डेढ़ महीना अस्पताल  में रहे. कई बार सोचा कि मम्मी को उन के बारे में बताए पर कहने की हिम्मत न जुटा सकी. उस को यह देख कर आश्चर्य होता कि पापा के 1-2 दोस्त ही उन से मिलने आते थे. एक दिन वह अस्पताल पहुंची तो उन का बिस्तर खाली था.

‘यह मरीज कहां गया, सिस्टर…’

‘उन को डिस्चार्ज कर दिया गया, डाक्टर. अब उन का इलाज घर से ही होगा…डाक्टर, आप के नाम मिस्टर आशीश एक पत्र दे गए हैं. क्या वह आप के जानने वाले थे?’

सिस्टर ने डा. भावना को एक पत्र थमा दिया. पत्र पकड़ते ही उस की टांगें थरथरा गईं. अपने को संभाल कर वह अपने केबिन में आ कर कुरसी में धंस गई. कांपते हाथों से उस ने पत्र खोला. लिखा था :

‘प्रिय भावना,

ये भी पढ़ें- सीलन-उमा बचपन की सहेली से क्यों अलग हो गई?

तुम ने मुझे पहचाना हो या न पहचाना हो पर मैं तो तुम्हें पहले ही दिन पहचान गया था कि तुम मेरी बेटी, भावना हो. तुम्हें अपनी बेटी कहने का हक तो मैं बहुत पीछे छोड़ आया, लेकिन तुम्हारा पिता तो मैं ही हूं और यह मेरे लिए फख्र की बात है. बदनसीब हूं मैं…जो तुम जैसी बेटी को अपना नहीं कह सकता.

जिस के कारण तुम दोनों को छोड़ आया था वह तो मुझे छोड़ कर कभी की चली गई थी. भला अपनों का दिल दुखा कर किसी को सुख मिल सकता है कभी…यह भूल गया था मैं…तुम दोनों को अकेला छोड़ आया था, आज खुद भी अकेलेपन की सजा भुगत रहा हूं.

तुम दोनों मांबेटी का अपराधी हूं मैं…मेरा अपराध क्षमा के योग्य तो नहीं पर हो सके तो मुझे माफ कर देना…’

आगे के शब्द उस की आंसू भरी आंखों में धुंधला गए.

उस ने आंखें बंद कर पीछे सिर टिका दिया. आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. मम्मी का इतने सालों का अकेलापन, उन की छटपटाहट, अपने युवा हो रहे मन का बिना पापा के अजीब सा अकेलापन, भय सबकुछ मानसपटल पर उभर आया था. जिंदगी के वे सब लम्हे याद आ गए जब पापा की कमी शिद्दत से खली थी. बिना पुरुष के साथ के मम्मी को कई बार कमजोर पड़ते भी देखा था.

पापा के इतने बडे़ अपराध के बाद भी उस का मन उन्हें प्यार करता था लेकिन उन्हें माफ करने या न करने का अधिकार सिर्फ मम्मी को ही था. मम्मी यदि उन्हें माफ कर दें तो उस के लिए उन्हें फिर से अपनाना मुश्किल नहीं था.

पापा के माफीनामे को पढ़ने के बाद विवाह के प्रति जो नफरत की शिला उस के दिल पर पड़ी थी वह धीरेधीरे पिघलने लगी थी. उस ने डा. अमन को अपने आसपास आने की ढील  दे दी और अंत में उन का प्रणय निवेदन उस ने स्वीकार कर लिया था.

मम्मी उस की विवाह की स्वीकृति या खुशी से बौरा सी गईं. मां की बेरौनक जिंदगी में उस की खुशियां व सफलता ही तो रंग भर सकते थे, बाकी था ही क्या… पर पापा के बारे में जान कर उसे मम्मी की जिंदगी फिर भी अच्छी लग रही थी कि उन की जिंदगी में उस से जुड़ी खुशियां तो थीं. पापा की जिंदगी में तो कुछ भी नहीं था सिवा भीषण अकेलापन, अपने परिवार को छोड़ देने का दर्द और साथ में उन की इस बीमारी के, लेकिन  कैसे बताए मम्मी को…वह कई दिन तक इसी कशमकश में रही थी.

मम्मी उत्साहित हो उस की शादी की तैयारियों में लग गई थीं. वह दिनभर अस्पताल से थक कर चूर हो कर घर आती और बेसुध सी बिस्तर पर पड़ जाती. मम्मी की वह जरा भी मदद नहीं कर पा रही थी.

आगे पढ़ें- मम्मी की तरफ देखा, धुंधलाती चांदनी में…

ये भी पढ़ें- बुजदिल : कलावती का कैसे फायदा उठाया

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...