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एक दिन रात को उस की नींद खुली, प्यास महसूस हुई तो पानी पीने के लिए उठ गई. बगल में नजर पड़ी तो बिस्तर खाली था. मम्मी शायद बाथरूम गई होंगी, सोच कर वह पानी पी कर लेट गई. थोड़ी देर तक जब मम्मी वापस नहीं आईं तो उस ने बाथरूम में झांका, वहां कोई नहीं था. वह बाहर आई, बालकनी में मम्मी कुरसी पर बैठीं, चुपचाप अंधेरे को घूर रही थीं.

‘मम्मी, आप यहां बैठी हैं, नींद नहीं आ रही है क्या?’  वह भी कुरसी खींच कर उन की बगल में बैठ गई, ‘शादी की तैयारियों के कारण आप बहुत थक गई हैं…अपना खयाल रखिए…’

कह कर उस ने मम्मी की तरफ देखा, धुंधलाती चांदनी में उन की आंखों का गीलापन उस ने लक्ष्य कर लिया.

‘क्या हुआ? मम्मी, आप रो रही थीं,’ उस ने स्नेह से पूछा, ‘मैं विदा होने वाली हूं इसलिए?’ उन का मूड ठीक करने के लिए उस ने हलका सा परिहास किया, ‘लेकिन मेरे विदा होने की नौबत नहीं आएगी…या तो अमन विदा हो कर यहां आएगा या फिर आप मेरे साथ चलेंगी.’

मम्मी की आंखों की नमी बूंद बन कर गालों पर लुढ़क गई. वह कोमलता से उन के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘मम्मी, क्या बात है?’

‘खुशी के आंसू हैं पगली…’ मम्मी हलका सा मुसकराईं, ‘हर लड़की विदा हो कर अपनी ससुराल जाती है. तू भी जाएगी. मैं तेरे साथ कैसे जा सकती हूं… मेरी शोभा तो अपने ही घर में रहने में है बेटा. यह तेरा मायका है. जबतब तू अपने मायके आएगी तो तेरे आने के लिए भी तो एक घर होना चाहिए. मेरे लिए तो यही खुशी की बात है कि तू इसी शहर में रहेगी और आतीजाती रहेगी.’

कहतेकहते मम्मी चुप हो गईं. वह साफ महसूस कर रही थी कि मम्मी अंधेरे में घूरते हुए अपने आंसू पीने का असफल प्रयास कर रही हैं.

‘मम्मी,’ वह धीरे से उन की हथेली अपने हाथों में ले कर सहलाती हुई बोली, ‘पापा की याद आ रही है न…’ कह कर उस ने मम्मी की प्रतिक्रिया देखने के लिए उन के चेहरे पर अपनी नजरें गड़ा दीं. पापा का नाम सुन कर हमेशा की तरह मम्मी इस बार भड़की नहीं, न ही कोई जवाब दिया, बस, चुपचाप अपने आंसू पोंछती रहीं.

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‘है न मम्मी…’ उन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच चुप्पी पसर गई.

‘मम्मी, एक बात कहूं?’ मम्मी ने अपनी प्रश्नवाचक नजरें उस के चेहरे पर गड़ा दीं.

‘फर्ज करो कि यदि आज पापा लौट आएं और अपने किए की माफी मांगें तो क्या आप उन्हें माफ कर देंगी?’

नाजुक समय था, कोमल मूड था सो बिना भड़के बेटी का गाल थपक कर बोलीं, ‘तू क्यों बेकार की बात सोचती है भावना…वह हमारे ही होते तो जाते ही क्यों…और आना ही होता तो अभी तक क्यों नहीं आए…इतने सालों बाद तू उस इनसान को क्यों याद कर रही है? बेटी, तेरी नई जिंदगी शुरू होने जा रही है…अमन अच्छा लड़का है, तू बहुत खुश रहेगी.’

‘मैं ही नहीं मम्मी, हम दोनों ही तो उन को याद कर रहे हैं…’

सुन कर मम्मी की आंखें एक बार फिर बरस गईं. फिर आंसू पोंछ कर बोलीं, ‘सोच रही थी भावना कि ऐसा कौन सा क्षण रहा होगा, मेरी तरफ से ऐसी कौन सी कमी रह गई होगी, जब आशीश का पैर फिसला…और उस क्षण का खमियाजा हम को ताउम्र भुगतना पड़ा…वरना तेरे पापा के व मेरे रिश्ते कड़वाहट भरे कभी नहीं रहे. हम अपने वैवाहिक जीवन से खुश थे. वह औरत अगर उन के जीवन में नहीं आई होती और तेरे पापा भटके नहीं होते तो आज हमारी जिंदगी कितनी खुशहाल होती और मेरी जिंदगी की शाम इतनी अकेली नहीं होती…कैसे कटेगी आगे की जिंदगी…जिंदगी की शाम में जीवनसाथी की कमी सब से अधिक खलती है भावना…याद रखना, तुम और अमन एकदूसरे के प्रति हमेशा ईमानदार रहना और इतने करीब रहना कि बीच में कोई तीसरा अपनी जगह बना ही न पाए.’

‘‘क्या सोच रही हैं डा. भावना, ड्यूटी का समय खत्म हो गया है, घर नहीं जाना है क्या?’’

डा. आर्या का स्वर सुन कर भावना वर्तमान में लौट आई. आंखें खोलीं तो देखा, उस की सहयोगी डा. आर्या उसे आश्चर्य से देख रही थी.

‘‘क्या बात है डा. भावना, आप रो रही थीं?’’

‘‘नहींनहीं, बस, ऐसे ही…कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं…’’ वह अपनी गीली आंखें पोंछती हुई बोली. उस ने अपना बैग खोल कर अंदर रखा कार्ड दोबारा देखा, उस परची को भी देखा जिस पर उस ने पापा का पता लिखा था और जिसे उस ने अस्पताल के रिकार्ड से हासिल किया था. बैग कंधे पर डाल कर वह बाहर निकल गई.

आशीश शर्मा का पता ढूंढ़तेढूंढ़ते जब भावना उन के घर पहुंची तो शाम गहरा रही  थी. धड़कते हृदय से उस ने घंटी बजा दी. अंदर की आवाज पास आती हुई लग रही थी. थोड़ी देर बाद दरवाजा खुल गया. आशीश शर्मा उसे आश्चर्य व खुशी से भौचक हो निहार रहे थे.

‘‘तुम…तुम डा. भावना हो न?’’

‘‘हां, पापा,’’ वह कठिनाई से बोल पाई. बरसों बाद पापा बोलने के लिए उसे काफी प्रयास करना पड़ा.

‘‘आओ…अंदर आओ, बेटी…’’ आशीश शर्मा की खुशी का वेग उन के हावभाव से संभल नहीं पा रहा था. शायद वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें.

हृदय में उठते तूफान को थामते हुए हाथ का कार्ड पकड़ाते हुए वह बोली,   ‘‘यह मेरी शादी का कार्ड है. आप जरूर आइएगा.’’

‘‘तुम्हारी शादी हो रही है…’’ वह खुशी से बोले. फिर कार्ड पकड़ते हुए धीरे से बोले, ‘‘तुम्हारी मम्मी जानती हैं सबकुछ…’’

‘‘हां…’’ वह झूठ बोल गई, ‘‘आप जरूर आइएगा,’’ कह कर वह बिना एक क्षण भी रुके वापस मुड़ गई.

आशीश शर्मा अंदर आ गए, थके हुए से वह कुरसी में धंस गए.

भावना एक आशा की किरण उन के दिल में जगा कर गुम हो गई थी. वह ही जानते हैं कि अपने परिवार से बिछड़ कर वह कितना तड़पे हैं…अपनी बड़ी होती बेटी को देखने के लिए उन्होंने कितनी कोशिश नहीं की…कितना कोसा उन्होंने खुद को, जब वह दामिनी के चंगुल में फंस गए थे…कैसा जाल फेंका दामिनी ने उन्हें फंसाने के लिए…उन की पत्नी एक शांत नदी की तरह थी और दामिनी थी बरसाती उफनता नाला, जो अपने सारे कगारों को तोड़ कर उन की तरफ बढ़ता रहा और वह स्वयं भी उस में बह गए.

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उस समय तो बस, दामिनी को पाना ही जैसे उन का एकमात्र लक्ष्य रह गया था. क्यों इतना आकर्षित हो गए थे वह उस समय दामिनी की तरफ…दामिनी की तड़कभड़क, अपने में समा लेने वाले उद्दाम सौंदर्य के पीछे वह उस की चरित्रहीनता और बददिमागी को नहीं देख पाए.

दामिनी के सामने उन्हें अपनी शांत सौम्य पत्नी बासी व श्रीहीन लगी थी. लगा, उस के साथ जीने में कोई मजा ही नहीं है. एकरस दिनचर्या…तनमन का एकरस साथ…तब नहीं समझा अपनी सीमाओं में रहने वाली नदी की तरह ही उन की पत्नी ने भी उन के जीवन को व उन के परिवार को सीमाओं में बांधा हुआ है.

दामिनी का साथ बहुत लंबे समय तक नहीं रह पाया. शुरू में तो वह दामिनी के सौंदर्य के सागर में डूब गए, लेकिन दामिनी के रूप का तिलिस्म अधिक नहीं रह पाया. धीरेधीरे प्याज के छिलकों की तरह परत दर परत दामिनी का असली चेहरा उन के सामने खुलने लगा. अपनी जिस तनख्वाह में पत्नी व बेटी के साथ वह सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे, उसी तनख्वाह में दामिनी के साथ गृहस्थी की गाड़ी खींचना मुश्किल ही नहीं दूभर हो रहा था. उस के सैरसपाटे, बनावशृंगार व साडि़यों के खर्चे से वह परेशान हो गए थे. बात इतनी ही होती तो भी ठीक था. दामिनी परले दर्जे की झगड़ालू व बददिमाग थी. उन को हर पल दामिनी की  तुलना में ज्योत्स्ना याद आ जाती. धीरेधीरे उन के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं. वह कब, कहां और क्यों जा रही है यह पूछना भी उन के बस की बात नहीं रह गई थी. पति की तरह वह उस पर कोई भी अधिकार नहीं रख पा रहे थे.

वे दोनों लगभग 5 साल तक एकसाथ रहे. इन 5 सालों में वह इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे कि दामिनी के जीवन में फिर कोई आ गया है. वह उस को रोकना चाह कर भी रोक नहीं पाए या फिर शायद उन्होंने रोकना ही नहीं चाहा. तब पहली बार नकारे जाने का दर्द उन की समझ में आया था. सामाजिक मानमर्यादा के लिए इतने सालों तक वह किसी तरह दामिनी से बंधे रहे थे, लेकिन जब दामिनी ने उन्हें खुद ही छोड़ दिया तो उन्होंने भी रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश नहीं की…दामिनी ने उन्हें तलाक दे दिया.

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