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मातापिता और भाइयों के हाथों सतत अपमान और अवमानना से उस में उन सब के सामने अपने वजूद की सार्थकता सिद्ध करने की चाह जगी.

वह दिनरात पढ़ाई में जुटी रहती. अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान पर आती. जहां दोनों भाई कभी 50-55% से अधिक अंक नहीं ला पाते, वह हमेशा 90% से अधिक अंक लाती.

घर में जहां उसे लड़की होने की वजह से भाइयों की अपेक्षा हेय और कमतर समझा जाता, वहीं स्कूल में उस के शिक्षकशिक्षिकांएं उस की पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं मृदु स्वभाव के कारण उसे बेहद प्यार करते. उस पर जान छिड़कते.

उस के घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत न थी. पिता एक निजी कंपनी में क्लर्क थे. उन  की तनख्वाह 5 प्राणियों के परिवार की जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च हो जाती.

उसे याद नहीं मांपिता ने उस के निजी खर्च के लिए कभी 10 रुपए उस के हाथ में रखे हों.  10वीं कक्षा के बाद से ही वह अपने खर्चों के लिए अपने पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी, जो अभी तक जारी था. पिछले कुछ वर्षों से तो वह अपनी ट्यूशन की कमाई से कुछ रुपए हर महीने मां को भी देने लगी थी, जो हमेशा पैसों की तंगी से जूझती रहती थीं.

वक्त के साथ शिक्षा का पायदान उत्तरोत्तर चढ़ते हुए उस ने अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन पूरी की और फिर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगी.  उन्ही दिनों उस के पिता का अचानक हार्ट अटैक से देहांत हो गया.

पिता की मृत्यु के बाद घर का माहौल और तंगहाल हो गया. पिता की नियमित आय बंद होने से घर में पैसों की बेहद कमी हो गई.

उन के बापदादों के जमाने के घर का एक हिस्सा किराए पर उठा था. उस के किराए से बड़ी मुश्किल से दालरोटी भर चल पाती.

उस तनाव भरे दौर में भी अपराजिता ने अपने हालात के सामने घुटने नहीं टेके और पूरी तैयारी से अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं देती रही. उन्ही दिनों उस की प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ और वह पहली बार में ही सफल रही.

तभी उस की सोच में व्यवधान डालते हुए काव्या का फोन आ गया. उस ने उस से कहा कि वह शाम के 7 बजे तक बबल्स जरूर पहुंच जाए.

बबल्स उस के घर के पास ही था. अत: 7 बजतेबजते वहां पहुंच गई.

‘‘अरे अपराजिता बिटिया, बहुतबहुत बधाई, पहली बार में ही कंपीटीशन ऐग्जाम क्लियर करने के लिए,’’ काव्या की मम्मी ने उसे बड़े स्नेह से गले लगाते हुए कहा.

‘‘थैंक यू सो मच आंटी.’’

‘‘बधाई बेटा,’’ काव्या के पापा भी बोल पड़े.

‘‘बधाई दीदी,’’ काव्या का छोटा भाई बोला.

‘‘थैंक यू सो मच अंकल. थैंक यू अभी.’’

‘‘भई, मैं तो इस बात से बहुत खुश हूं कि हमारी सीतागीता की जोड़ी यूनिवर्सिटी के बाद भी कायम रहेगी. तुम दोनों ने एकसाथ पढ़ाई की, अब नौकरी में भी दोनों साथसाथ रहोगे. बहुत बढि़या बच्चो,’’ काव्या के पापा ने कहा.

तभी काव्या की मम्मी बोलीं, ‘‘बेटा, तेरे होते मुझे काव्या की बिलकुल फिक्र नहीं होती.’’

‘‘ओ मम्मा, कम औन, अब यह अपनी इस हैलिकौप्टर पेरैंटिंग पर ब्रेक लगाओ. मैं अब बच्ची नहीं रही, जो मुझे अभी भी अपराजिता की जरूरत हो,’’ काव्या ने तनिक बनावटी गुस्से से कहा.

‘‘यह तो तू गलत कह रही है मेरी लाडो. तू तो मेरे लिए हमेशा बच्ची ही रहेगी.’’

‘‘50 साल की हो जाऊंगी तब भी,’’ काव्या ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को चौड़ा करते हुए इठलाते हुए कहा.

इस पर उस की मां ने प्यार से उसे गले से लगा लिया और बोलीं, ‘‘हां बिट्टो रानी, तू

50 साल की हो जाएगी तब भी.’’

तभी काव्या के पापा बोले, ‘‘हां तो भई, हमारी यह सीतागीता की जोड़ी बैंक पर धावा बोलने कब जा रही है?’’

उन की इस बात पर इस बार अपराजिता मुसकराते हुए बोली, ‘‘अंकल हम दोनों की जौइनिंग एक ही दिन है. पहली मार्च की

जौइनिंग है.’’

‘‘बढि़या, बहुत बढि़या. शायद इन बैंक वालों को भी खबर लग गई कि ये दोनों इकट्ठी अपनी बैस्ट परफौर्मैंस देती हैं.’’

इस पर अपराजिता ने तनिक मुसकराते हुए उन्हें जवाब दिया, ‘‘जी अंकल, साथसाथ तो हम अच्छेअच्छों की छुट्टी कर दें.’’

तभी काव्या की मां अपराजिता से बोलीं, ‘‘बेटा, तेरे होते हुए मुझे इस की बिलकुल चिंता नहीं होती. फिर भी बेटा, इस का ध्यान रखना. तुझे तो पता है तेरी यह सहेली खाने की बड़ी

चोर है. दोनों एकसाथ लंच करना और यूनिवर्सिटी की तरह इस से इस का पूरा लंच खत्म करवा दिया करना.’’

‘‘जी… जी… आंटी, मेरे होते हुए आप को बिलकुल चिंता करने की जरूरत नहीं है. आई प्रौमिस, मैं इस का पूरापूरा ध्यान रखूंगी.’’

अपराजिता की वह पूरी शाम गप्पों, हंसीमजाक में बेहद खुशगवार गुजरी.

वह जब काव्या के परिवार से मिलती, तो जहां एक ओर उन सब का अपने प्रति गर्मजोशी भरा आत्मीय व्यवहार उसे भीतर तक अभिभूत कर देता, वहीं दूसरी ओर काव्या के प्रति उन सब का बेशर्त, भरपूर लाड़दुलार देख मन ही मन एक अजीब से खालीपन की अनुभूति से भी भर उठती.  आज भी यही हुआ था.

काव्या की फैमिली के बारे में सोचतेसोचते रात को कब वह नींद के आगोश में समा गई, उसे पता भी नहीं चला.

बैंक जौइनिंग का वक्त करीब आता जा रहा था और नियत दिन उस ने अपनी नौकरी जौइन  कर ली. उसे नौकरी करते 1 माह होने को आया.

उस दिन वह बहुत खुश थी. उस के अकाउंट में उस की पहली तनख्वाह आई थी. वह और काव्या दोनों साथसाथ अपनी  पहली सैलरी से अपनेअपने घर वालों के लिए गिफ्ट्स लेने बाजार गईं.

अपराजिता और काव्या दोनों ने अपनेअपने पेरैंट्स और

भाइयों के लिए बढि़या कपड़े खरीदे और फिर दोनों खुशीखुशी अपनेअपने घर लौटीं.

‘‘लो मां, यह साड़ी आप के लिए, हां बड़े भैया, यह शर्टपैंट आप के लिए, छोटे भैया, यह आप के लिए.’’

‘‘अरे वाह छुटकी, तेरे तो ठाट हो गए. अब हर महीने तेरे बैंक में 70 हजार रुपए आ जाएंगे?’’

‘‘हां भैया, वह तो है. भैया जरा मन लगा कर पढ़ाई कर लो, तो आप की भी जिंदगी बन जाएगी.’’

‘‘बस, बस कर छुटकी, ज्यादा भाषण मत झाड़. नौकरी ही लगी है, कोई खजाना हाथ नहीं लगा, जो सुबह से प्रवचन दे रही है.’’

‘‘आप दोनों 30 बरस के होने को आए और अभी तक मां को और मुझे आप दोनों के खर्चे उठाने पड़ते हैं. अपने दिल पर हाथ रख कर बोलिए, क्या यह सही है?’’

‘‘बस कर छुटकी. जल्द ही हमारे दिन भी आएंगे. ऐग्जाम दे रहे हैं न हम दोनों भी. अब हम दोनों मांगलिक हैं तो इस में हमारा क्या कुसूर?’’

‘‘भैया, फालतू के बहानेबाजी तो करो मत. पढ़ाई करो पढ़ाई,’’ लेकिन उन दोनों को अकल  नहीं आनी थी और नहीं आई.

अपराजिता की नौकरी लगे 1 साल होने को आया. दोनों भाइयों की यारीदोस्ती, मौजमस्ती बदस्तूर जारी रही.

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