कहानी के बाकी भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

जब निशानिका दंपती ने पार्टी में प्रवेश किया, तो पार्टी के मेजबान शांतलू ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘समय से पहले ही आ गए तुम लोग.’’

निशानिका ने अनायास कहने की कोशिश की, ‘‘हम लोगों ने सोचा कि …’’

शांतलू ने उसे बीच में ही काट दिया, ‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. बिलकुल सही किया तुम ने. सभी दोस्त मदद करने में लगे हैं.’’

पार्टी शांतलू के घर के पिछवाड़े के आंगन में थी, जो बहुत बड़ा था. घर से आंगन में प्रवेश करने के दरवाजे पर नीले रंग के गुब्बारों का झंड लगा था. ऐसे ही नीले रंग के गुब्बारों के सैट

2-3 और जगहों पर लगे थे. बच्चों के खेलने के लिए कृत्रिम फिसल पट्टी रखी हुई थी. शांतलू के 2 दोस्त स्टेज बना रहे थे, जिन पर उन्होंने माइक्रोफोन रखने का इंतजाम किया था. शायद कोई गीत गाएगा या फिर पार्टी में तरहतरह की घोषणाएं की जाएंगी. बीचबीच में प्लास्टिक की मेजें और कुरसियां रखी हुई थीं. एक जगह पर भोजन की बडी टेबल व्यवस्थित की जा रही थी. पानी का बड़ा पारदर्शी कनस्तर इस टेबल के एक कोने पर रखा था.

शांतलू का एक मित्र, जेवन अपनी एक बच्ची के बाल ठीक कर रहा था. उस की दूसरी बच्ची आंगन में टेबलों के चारों ओर दौड़दौड़ कर चक्कर लगा रही थी. इक्कादुक्का और बच्चे दिख रहे थे. वे शायद स्टेज सजाने वाले मित्रों के बच्चे थे.

शांतलू स्वयं डैकोरेशन की ?िल्लियां लगा रहा था. उस ने ?िल्लियों को नीचे रखते हुए वेकाश सुमेरा से कहा, ‘‘अब वेकाश आ ही गया है तो वही इन ?िल्लियों को लगाएगा.’’

निशानिका ने एक क्षण के लिए अपने पति वेकाश को देखा, फिर अपने साथ लाए बड़े टिफिन को उठा कर दिखाते हुए शांतलू से कहा, ‘‘मैं इस टिफिन को अंदर किचन में रख कर आती हूं.’’

निशानिका के घर के अंदर जाने के बाद शांतलू ने स्टेज सजाते हुए अपने मित्रों को जोर से आवाज दी, ‘‘देखो कौन आया है.’’

स्टेज की व्यवस्था करते रोमकेश और भार्तेंदभ ने दूर से ही हाथ हिलाते हुए वेकाश का स्वागत किया और वहीं से चिल्लाते हुए कहा, ‘‘आज पार्टी में बहुत मजा आएगा.’’

वेकाश ने अपने हाथ में अपने साथ लाए गिफ्ट के बक्से को उन्हें दिखाते हुए जवाब दिया, ‘‘बिलकुल.’’

घर के अंदर शांतलू की पत्नी ने निशानिका का स्वागत किया, ‘‘अच्छा हो गया जो तुम लोग थोड़ा जल्दी आ गए. छुटका कहां है?’’

निशानिका ने थके हुए स्वर में कहा, ‘‘पहले तो मैं ने सोचा कि अपनी मां को ही बुला लेती हूं कि घर पर निशांधेता का ध्यान रखे. फिर सोचा कि पार्टी में उस को मजा आएगा, इसलिए ले कर आ गई.’’

निशांधेता का जन्म हुए कुछ ही महीने हुए थे. लेकिन उस के लिए नर्म गद्दों वाली ट्रौली आ चुकी थी, जिस के अंदर रह कर अपनी बोतल चूसते हुए मजे से बाहरी संसार को अपने अंदर ग्रहण करने की उस ने शुरुआत कर दी थी.

शांतलू की पत्नी ने चिंता व्यक्त करते हुए निशानिका से उस की मां के बारे में पूछा, ‘‘माताजी की तबीयत कैसी है? दवा दी जा रही थी उन को?’’

निशानिका ने दुखी स्वर में जवाब दिया, ‘‘बहुत भुगतना पड़ रहा है उस को. लेकिन अभी तो ठीक है. मैं भी अपनी छोटी सी गिफ्ट शौप खोलने के चक्कर में हूं.’’

शांतलू की पत्नी ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘‘जल्द ही सभी लोग आने शुरू हो जाएंगे. मुझे बच्चों को फैंसी ड्रैस पहनानी है,’’ और फिर हड़बड़ी में बच्चों को पोशाक पहनाने निकल गई.

बाहर आंगन में वेकाश ?िल्लियां लगाते हुए अपने चारों ओर महिमामंडित उत्पादकता को निहार रहा था. इस शहर के अमीरों के घरों में बच्चों की फैंसी ड्रैस पार्टी ऐसी विलासिता के साथ होती है, इस बात का उसे पता नहीं था.

कुछ ही महीने हुए थे उसे और निशानिका को इस शहर में आए हुए. निशांधेता का जन्म इसी शहर में हुआ था. 2 नई शुरुआतें एकसाथ, नया शहर, नया रूप, पिता का रूप. नई प्रकार की जिम्मेदारियां. जब बच्चे का जन्म हुआ था, तो निशानिका ने बहुत जोर किया कि बच्चे का नाम उन दोनों के नाम को मिला कर ‘निशाकाश’ रखा जाए. उस ने दलील भी दी कि चूंकि निशा का अर्थ ‘रात्रि’ होता है, इसीलिए ‘निशाकाश’ का अर्थ हो जाएगा ‘रात्रि का आकाश’ जो बच्चे के लिए बेहद उपयुक्त साबित होगा क्योंकि उस का जन्म भी रात के 9 बजे हुआ था. लेकिन वेकाश दृश्य था कि ‘निशा’ नाम से स्त्रीलिंग का बोध होता है, अत: ‘निशांधेता’ अधिक उपयुक्त होगा. वेकाश हिंदी साहित्य का विशेषग्य नहीं था अन्यथा उसे पता होता कि ‘अंधेता’ का अंधे होने से संबंध है.

आज निशांधेता अपनी घूमने वाली घुमक्कड़ गाड़ी में फैंसी ड्रैस पहने हुए किलकारियां मारते हुए डोल रहा था. जेवन अपनी एक बच्ची के बाल ठीक कर, टेबल पर रखा जूस पी रहा था

कि आंगन में बेतहाशा दौड़ती हुई पीले रंग की ड्रैस पहने, चश्मा लगाए उस की दूसरी बच्ची तेज गति से चिल्लाते हुए उस के पास आ पहुंची, ‘‘पापा… पापा…’’

जेवन ने अपना जूस का गिलास वापस रख दिया और अपनी दूसरी बच्ची को वेकाश की घुमक्कड़ गाड़ी की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘इस का नाम निशांधेता है. इस के साथ खेलो.’’

निशानिका ने घर के अंदर से ही अपने पति को आवाज दी, ‘‘वेकाश, एक मिनट सुनो.’’

वेकाश ने अपने नन्हे को देखा तो जेवन ने उस से कहा, ‘‘तुम जाओ अंदर. मैं इस को देख लूंगा.’’

वेकाश ने जेवन को धन्यवाद दिया और

घर के अंदर चला गया. जेवन ने निशांधेता को अपनी बच्चियों को सौंप दिया कि उस के साथ खेलें और उस का मन बहलाएं. बच्चियां और खुश हो गईं. उन्हें खेलने के लिए एक और खिलौना मिल गया. वे दोनों आपस में निर्णय लेने लगीं कि सब से पहले कौन सा गीत निशांधेता को सुनाना चाहिए.

कुछ दिनों के बाद जब वेकाश अपने काम पर था तो दोपहर करीब 12 बजे अचानक उस का मोबाइल बजा. दूसरी ओर से बिलखती हुई आवाज में निशानिका ने कहा, ‘‘मैं अस्पताल में हूं. निश को बुखार आ रहा था, इसलिए ले कर आई थी. लेकिन अब वे लोग कोरोना टैस्ट कराने को कह रहे हैं.’’

वेकाश के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह दौड़ादौड़ा अस्पताल पहुंचा, जहां उसे अपने पूरे बदन को ढकने के लिए प्लास्टिक के रेनकोट की तरह का आवरण दिया गया. निशानिका भी उसी तरह के आवरण में थी. अपनी पूरी जिंदगी में इस तरह का डर वेकाश ने कभी महसूस नहीं किया था जैसा इस वक्त उसे लग रहा था.

निशानिका की मां भी मौजूद थी और नर्स से कह रही थी, ‘‘अब तो बहुत समय हो गया बच्चे को ले गए हुए. इतनी देर क्यों लग रही है?’’

नर्स ने शांति से उत्तर दिया, ‘‘आजकल तुरंत टैस्टिंग हो जाती है. बस अभी आते ही होंगे.’’

नर्स का इतना कहना ही था कि उस का मोबाइल बजा और टैस्टिंग के स्थान से किसी ने उसे स्थिति से अवगत कराया. नर्स ने धैर्यपूर्वक सुना और बच्चे के मातापिता को जानकारी दी, ‘‘टैस्टिंग हो गई है और खून जांच का भी प्रारंभिक विश्लेषण हो चुका है.’’

निशानिका ने डर और आतुरता के मिश्रण से पूछा, ‘‘क्या नतीजा निकला है?’’

नर्स ने चिंतित स्वर में बताया, ‘‘ऐसा लगता है कि करीब 1 हफ्ता पहले इन्फैक्शन हुआ है.’’

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...