लेखक- जीतेंद्र मोहन भटनागर
वहां से उठ कर तीनों प्राइवेट रूम में आए. लंबी डिलिवरी के बाद की थकान,
लेकिन आसपास बच्चियों के नन्हे दिलों की धड़कन और छोटेछोटे मुलायम हाथपैरों की हलचल ने नलिनी को गहरी नींद न सोने दिया था. इसलिए पारस को नलिनी के बैड के पास रखी कुरसी पर बैठा कर राबर्ट को साथ लिए मैस्सी कल फिर मौर्निंग वाली औनलाइन क्लास निबटाने के बाद आने की कह कर चली गई.
उस के बाद के दिनों में राबर्ट तो क्रिश्चियन वैलफेयर सोसाइटी का चेयरमैन होने के कारण अगले माह होने वाले सोसायटी के सालाना फंक्शन के आयोजन में व्यस्त हो गया, लेकिन मैस्सी नलिनी के डिस्चार्ज होने तक लगातार हौस्पिटल के चक्कर लगाती रही और डिस्चार्ज
के बाद वही उसे अपनी कार से ले कर मां के
घर आई.
वह जानती थी कि अपनी मां के पास रह कर ही नलिनी की सही देखभाल हो पाएगी.
उस के बाद मां के घर में जब भी मैस्सी नलिनी से मिलने पहुंची तो पारस को उस ने बहुत ही गंभीर और अपने में ही खोया हुआ पाया.
पारस ने अपना ज्यादातर समय बैंक में बिताना शुरू कर दिया था. मैनेजर पद के दायित्व का निर्वहन करने के बाद जब वह घर लौटता तो मैस्सी को नलिनी के पास ही पाता. बच्चियों को गोद में लेना तो दूर उसे उन के पास बैठना तक गवारा नहीं था.
समय एक एक दिन कर के बीत रहा था. दोनों बच्चियां भी मैस्सी के स्पर्श को पहचानने लगी थीं और पहचानती भी क्यों नहीं. आखिर मैस्सी उन की सगी मौसी थी, जो बचपन में मानसी के नाम से पुकारी जाती थी. यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में एमए करने के दौरान हंसमुख काला राबर्ट उस के जीवन में आया और मां तथा बड़े ताऊ के तमाम विरोध के बाद मानसी ने राबर्ट से शादी कर के क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिया.
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पिता तो बहुत पहले ही इस जगत को छोड़ गए थे. उस के बाद संयुक्त परिवार में एकमात्र बच्चे के विदेश जा कर बस जाने के गम में ताई भी ज्यादा समय तक जिंदा न रही. अपनी दोनों बच्चियों के साथ ही अब उन्हें अकेले बूढे़ जेठ का भी खयाल रखना पड़ता.
इस का एक कारण यह भी था कि नलिनी और मानसी के पिता की मृत्यु के बाद से उन्होंने भी बिना किसी लागलपेट के अपने दायित्व का निर्वहन बखूबी किया था. इसलिए मानसी का मैस्सी बन जाना उन्हें शुरू में तो बहुत अखरा
पर जब अपने अल्सर के औपरेशन के लिए नलिनी ने मैस्सी से परामर्श लिया तो राबर्ट ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अपनी सोसाइटी के चैरिटेबल हौस्पिटल में स्वयं ले जा कर उन का सफल औप्ररेशन करवा दिया तब से मैस्सी और राबर्ट का इस घर में आनाजाना बढ़ गया. हालांकि उस के बाद ताऊजी भी ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहे.
पारस बैंक में प्रोविशनरी औफिसर चयनित होने के बाद शुरू के दिनों में राबर्ट की वैलफेयर सोसाइटी के गैस्टहाउस में ही रहता रहा.
एक दिन जब राबर्ट मैस्सी के साथ नलिनी को एमएससी
की डिगरी हासिल करने की बधाई देने आया तो मैस्सी की मां ने कहा, ‘‘मैस्सी बेटी, तू नलिनी के लिए भी राबर्ट जैसा कोई लड़का ढूृंढ़ दे ताकि मेरी जब आंखें मुंदें तो उस समय कोई ख्वाहिश न हो वरना सुना है कि मरते समय अगर मन में कोई इच्छा रह जाती है तो मन भटकता रहता है.’’
यह सुन कर राबर्ट जोर से हंसा फिर बोला, ‘‘मांजी मैं शर्त लगा सकता हूं कि जीव मरने के बाद अपने मन को भी साथ ले जाता है फिर जब मन भी साथ चला गया तो भटकेगा कौन?’’
‘‘अरे तुम तो मां से भी शर्त लगाने में जुट गए… तुम्हारी नजर में कोई लड़का हो तो बताओ.’’
जब मैस्सी ने कहा तो राबर्ट ने नलिनी की तरफ गौर से देखा.
अपनी ओर यों घूरते देख नलिनि बोली, ‘‘जीजाजी आप मुझे ऐसे क्यों घूर रहे हैं?’’
‘‘मैं इसलिए घूर रहा हूं कि इतनी सुंदर और गोरीचिट्टी होने के बाद भी कोई बांका छोरा तुम्हें फंसा क्यों नहीं पाया.’’
‘‘मेरा नाम नलिनी है, मानसी नहीं जिसे कोई भी फंसा ले.’’
‘‘ठीक, एक लड़का तो है मेरी नजर में. अच्छे घर का है बैंक में पीओ है और वह भी यही कहता है कि उसे कोई भी लड़की फंसा नहीं सकती, जबकि मजेदार बात यह है कि वह बेहद स्मार्ट है, गुड लुकिंग है. मैस्सी उसे अच्छी तरह जानती है.’’
‘‘तो उस से बात कर के देखो शायद उसे नलिनी पसंद आ जाए,’’ मां प्रसन्न होते हुए बोली.
‘‘मांजी मुझे पूरा विश्वास है कि नलिनी को वह रिजैक्ट कर ही नहीं सकता.’’
और यही सच भी हुआ. पारस को नलिनी पहली भेंट में पसंद भी आ गई. दोनों की शादी कराने में राबर्ट ने अपनी भूमिका बड़ी कुशलता से निभाई और शादी के बाद नलिनी कुछ दिन तो अपने सासससुर के पास रही, फिर पारस उसे अपने बैंक से मिले औफिसर्स फ्लैट में ले आया.
राबर्ट और मैस्सी का अकसर मिलनेजुलने आना हो ही जाता था. कभीकभी राबर्ट अकेला ही अपनी साली के हाथ से बनी कौफी पीने चला आता था.
बातबात पर किसी से भी शर्त लगाने को तैयार हंसमुख स्वभाव वाले राबर्ट से जीजासाली वाला तो रिश्ता था ही और जब से राबर्ट ने पारस से शादी करवाने में नलिनी की मां के साथ उस पर भी एक उपकार किया था तब से वह उन का और ज्यादा सम्मान करने लगी थी.
समय बीता नलिनी की कोख भारी हुई और डाक्टर डिसूजा ने शुरुआती परीक्षण में ही नलिनी के साथ आए पारस को बता दिया कि योर वाइफ इज कैरिंग ट्विंस.’’
तब से ही पारस एक अजीब सी मिश्रित प्रक्रिया से गुजर रहा था. नलिनी उसे
समझाती, ‘‘अरे तुम तो ऐसे घबरा रहे हो जैसे कोख मेरी नहीं तुम्हारी भारी हो गई हो.’’
‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है और मैं चितिंत हूं कि तुम इकहरे बदन की हो… यह 2-2 कैसे तुम्हारी छोटी सी कोख संभाल पाएगी.’’
‘‘कोख के बारे में मैं बस इतना जानती हूं कि जरूरत के हिसाब से वह अपना आकार एडजस्ट कर लेती है, फिर मैं इस संसार में अकेली थोड़े ही हूं जो जुड़वां बच्चों की मां बनूंगी.’’
9 महीने कब में पूरे हो गए पारस को पता ही न चला. हां नलिनी ने 1-1 दिन अपने गर्भ में होने वाली हलचल और मीठीमीठी पीड़ा का अनुभव करा.
अब नतीजा सामने था. दोनों नन्ही किलकारियों को साथ ले कर वह अपनी अनुभवी मां के पास आ गई थी. मैस्सी रोज चक्कर लगा लेती.
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बच्चियों के शरीर का आकार बढ़ना शुरू हो गया. मां की देखरेख में नलिनी और रातिकादिनिका पलनेबढ़ने लगीं.
राबर्ट भी आ कर सब का मन बहला जाता. पर जबतब नलिनी से पूछता, ‘‘पारस बैंक से कब लौटता है?’’
उस का उतरा चेहरा देख कर वह मां से पूछता, ‘‘मां इधर जब भी मिलने आया हूं पारस से मुलाकात नहीं हुई.’’
‘‘हां बेटे वह हफ्ताभर पहले जब आया था तो बता रहा था कि आजकल बैंकों में वर्क प्रैशर बहुत बढ़ गया है. सरकार की इतनी फाइनैंस स्कीमें आ गई हैं कि लोन वितरण करने और लाभार्थियों के खाते में सरकारी अनुदान का लेनदेन स्टाफ से करवाने के बाद इतना थक जाता हूं कि वहीं पास में अपने बंगले में सो जाता हूं.’’
‘‘और खाना वगैरह?’’
‘‘वहीं बैंक कैंटीन में खा लेते है,’’ इस बार नलिनी बोल पड़ी.
‘‘अच्छा,’’ कहते हुए उस ने दोनों बच्चियों को बारीबारी से गोद में उठा कर प्यार किया
और फिर नलिनी के हाथ से बनी कौफी पी कर चला गया.
आगे पढ़ें- 10 दिन पहले ही तो मैस्सी से…
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