मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हमेशा चहचहाने वाली बूआ कहीं खो सी गई हैं. बातबेबात ठहाका मार कर हंसने वाली बूआ पता नहीं क्यों चुपचुप सी लग रही थीं. सौतेली बेटी के ब्याह के बाद तो उन्हें खुश होना चाहिए था, कहा करती थीं कि इस की शादी कर के तर जाऊंगी. सौतेली बेटी बूआ को सदा बोझ ही लगा करती थी. उन के जीवन में अगर कुछ कड़वाहट थी तो वह यही थी कि वे एक दुहाजू की पत्नी हैं. मगर जहां चाह वहां राह, ससुराल आते ही बूआ ने पति को उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया और समझाबुझा कर सौतेली बेटी को उस के ननिहाल भेज दिया. सौत की निशानी वह बच्ची ही तो थी.
जब वह चली गई तो बूआ ने चैन की सांस ली. फूफा पहलेपहल तो अपनी बेटी के लिए उदास रहे, मगर धीरेधीरे नई पत्नी के मोहपाश में सब भूल गए. बूआ कभी तीजत्योहार पर भी उसे अपने घर नहीं लाती थीं. प्रकृति ने उन की झोली में 2 बेटे डाल दिए थे. अब वे यही चाहती थीं कि पति उन्हीं में उलझे रहें, भूल से भी उन्हें सौतेली बेटी को याद नहीं करने देती थीं. सुनने में आता था कि फूफा की बेटी मेधावी छात्रा है. ननिहाल में सारा काम संभालती है. परंतु नाना की मृत्यु के बाद मामा एक दिन उसे पिता के घर छोड़ गए. 19 बरस की युवा बहन, भाइयों के गले से भी नीचे नहीं उतरी थी. पिता ने भी पितातुल्य स्वागत नहीं किया था. मुझे याद है, उस शाम मैं भी बूआ के घर पर ही था. जैसे बूआ की हंसी पर किसी ने ताला ही लगा दिया था. मैं सोचने लगा, ‘घर की बेटी का ऐसा स्वागत?’ अनमने भाव से बूआ ने उसे अंदर वाले कमरे में बिठाया और आग्नेय दृष्टि से पति को देखा, जो अखबार में मुंह छिपाए यों अनजान बन रहे थे, मानो उन्हें इस बात से कुछ भी लेनादेना न हो. पहली बार मुझे इस सत्य पर विश्वास हुआ था कि सचमुच मां के मरते ही पिता का साया भी सिर से उठ जाता है.
‘सुनो, वे लोग इसे यहां क्यों छोड़ गए, आप ने कुछ कहा था क्या?’ बूआ ने गुस्से से पति से पूछा तो किसी अपराधी की तरह हिम्मत कर के फूफाजी ने सफाई दी, ‘इस के मामा के भी तो बेटियां हैं न… अब नाना की कमाई भी तो नहीं रही. यहीं रहेगी तो क्या बुरा है? तुम्हें काम में इस की मदद मिल जाएगी.’
‘अरे, ब्याहने को लाख, 2 लाख कहां से लाओगे? अपना तो पूरा नहीं पड़ता…’ बूआ मुझ से जब भी मिलतीं, यही कहतीं, ‘अरे गौतम, तू ही बता न कोई अच्छा सा लड़का. दानदहेज नहीं देना मुझे. किसी तरह यह ससुराल चली जाए तो मैं तर जाऊं.’ संयोग से मेरे एक मित्र का चचेरा भाई बिना दहेज के शादी करना चाहता था, आननफानन रिश्ता तय हो गया और जल्दी ही शादी भी हो गई. शादी के लगभग 2 महीने बाद मैं बूआ के घर गया तो पूछा, ‘‘क्या बात है, अब क्या परेशानी है?’’
‘‘बात क्या होगी, देवीजी वापस आ गई हैं मेरे कलेजे पर मूंग दलने. मुझे क्या पता था कि वह पागल है. ससुराल वाले बिठा गए हैं, कहते हैं, पागल को अपने ही पास रखो.’’
‘‘क्या?’’ मैं स्तब्ध रह गया.
‘‘जरा अपने दोस्त से बात तो करना,’’ बूआ का स्वर कानों में पड़ा. फिर उन्होंने सौतेली बेटी को पुकारा, ‘‘गीता, जरा चाय तो लाना, गौतम आया है.’’ गीता सिर झुकाए सामने चली आई. मैं ने तब शायद उसे पहली बार नजर भर कर देखा था. पागलपन जैसी तो कोई बात नहीं लगी. मैं सोचने लगा, ‘बूआ की गृहस्थी का बोझ संभालती, भागभाग कर सब के आदेशों का पालन करती गीता आखिर पागल कहां है?’ रिश्ता मैं ने करवाया था, इसलिए एक दिन उस के पति से मिलने चला गया. पर वह तो मुझे देखते ही भड़क उठा, ‘‘यार गौतम, तुम ने मुझ से किस बात का बदला लिया है?’’
‘‘आखिर ऐसी क्या बात है उस में, अच्छीभली तो है?’’
‘‘उस ने मुझे हाथ तक नहीं लगाने दिया. उसे सजाने के लिए तो यहां नहीं लाया था. पागल लड़की…’’ ‘‘क्या बकते हो? हाथ नहीं लगाने दिया? इस का अर्थ यह तो नहीं कि वह पागल…’’
‘‘बसबस गौतम, तलाक के कागजों पर वह हस्ताक्षर कर गई है. उस की वकालत की अब कोई जरूरत नहीं है. यह शादी तो टूटी ही समझो.’’
‘‘शादीब्याह मजाक है क्या?’’
‘‘मजाक नहीं, मगर कोई तो नाता हो, जो दोनों को बांध सके. उस ने तो कभी मुझे नजर भर कर देखा तक नहीं. बर्फ की शिला जैसी ठंडी. न कोई हावभाव, न कोई उत्साह.’’
‘‘अरे, सारी उम्र सामने है, इतनी जल्दी ऐसा निर्णय मत लो. उस गरीब पर जरा तो तरस खाओ.’’ ‘‘नहीं गौतम, मुझ से अब और इंतजार नहीं होता.’’ सचमुच एक दिन वह नाता टूट गया. एक तो सौतेली और उस पर परित्यक्ता, बूआ का सारा आक्रोश उस गरीब पर ही उतरता. उस के पिता मूक बने सब देखते रहते. मैं अकसर जाता और उस की दशा पर कुढ़ता रहता. जी चाहता कि उस से कुछ बात करूं कि आखिर क्यों वह पति से निभा नहीं पाई. चंद महीनों में ही क्यों सब समाप्त हो गया? मैं उस से बात करने की कोशिश करता, मगर वह कभी मौका ही न देती. एक दिन पता चला कि उस ने किसी स्कूल में नौकरी कर ली है, पर बूआ प्रसन्न नहीं हुईं, क्योंकि अब घर का काम उन्हें करना पड़ता था.
एक शाम औफिस से आतेआते मैं बारिश में घिर गया. स्कूटर भी खराब हो गया, इसलिए उसे मैकेनिक के पास छोड़ा और पैदल ही चल दिया. पर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब बसस्टैंड पर गीता को भी खड़े पाया. थोड़ी देर बाद जब अंधेरा घिर आया तो मैं ने कहा, ‘‘टैक्सी कर लेते हैं गीता, मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगा.’’
‘‘जी नहीं, अभी बस आ जाएगी.’’
‘‘आओ न, कहीं चाय पीते हैं, उस के बाद…’’
‘‘इस की जरूरत नहीं. मैं चली जाऊंगी.’’
‘‘गीता, अंधेरा हो रहा है. अच्छा, चाय रहने दो. अब चलो मेरे साथ.’’ अनमनी सी वह टैक्सी में मेरे साथ आ बैठी. घर पहुंचने पर बूआ ने तीखी नजरों से हम दोनों को देखा. तीसरे ही दिन पता चला कि बूआ ने मेरे पिताजी के कानों में अच्छी तरह यह बात भर दी है कि अब मेरी शादी कर देनी चाहिए. साथ ही अपनी सहेली की बेटी भी सुझा दी थी. मां और पिताजी लड़की भी देख आए. मैं सब देखसुन रहा था, मगर पता नहीं क्यों, निर्णय नहीं ले पा रहा था. एक दिन बूआ के घर गया तो उन्हें ऊंचे स्वर में चीखते सुन सहम गया. ‘‘अरी, यही लच्छन वहां भी दिखाए होंगे, तभी तो वह वापस पटक गए तुझे. तेरी उम्र गुड्डेगुडि़यों से खेलने की है क्या?’’ और ‘छनाक’ की आवाज के साथ एक डब्बा मेरे पैरों के पास आ गिरा. तभी आंखों में विचित्र सा भाव लिए गीता ने डब्बा उठा लिया. असमंजस में पड़ा मैं दोनों को निहार रहा था.
‘‘इसे मत फेंको मां, इसे मत फेंको,’’ गीता ने करुण स्वर में कहा.
‘‘खबरदार, जो मुझे मां कहा. पागल कहीं की,’’ एक झटके से बूआ ने उस के हाथ से वह डब्बा झपटा और सामने गली में फेंक दिया. उसी पल एक स्कूटर डब्बे के ऊपर से गुजर गया. टूटे खिलौनों को देख कर गीता वहीं पछाड़ खा कर गिर पड़ी. यह दृश्य मेरे अस्तित्व को पूरी तरह हिला गया. किसी तरह गीता को उठा कर मैं ने बिस्तर पर लिटाया.
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