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सुनता रहा विजय सब. बस, जरूरत की बात करता रहा जिस के बिना गुजारा नहीं चल सकता था.

‘‘अब तुम्हारे घर पर ही देख लो. मिन्नी की शादी के बाद तुम भी अकेले रह जाओगे. घरबाहर, मांबाप सब को अकेले ही तो देखना होगा. मिन्नी का पति घुलमिल गया तो ठीक. नहीं तो एक असुरक्षा की भावना तो है ही न. जैसे मुझ में है… किसी अपने को ही खोजता रहता हूं… कोई अपना ऐसा जिस पर भरोसा कर सकूं. तुम्हारी तो एक बहन है भी, मेरे पास तो वह भी नहीं है.’’

मेरे इस वाक्य से उसे एक झटका सा लगा. गाड़ी के स्टेयरिंग पर उस के हाथ घूम गए और पैर बे्रक पर जम गए. बहुत गौर से उस ने मुझे देखा.

‘‘क्या हुआ, विजय? रुक क्यों गए?’’ इतना कह कर मैं सोचने लगा कि सामने कोई वाहन भी नहीं था जिस वजह से उस ने गाड़ी कच्चे पर उतार दी थी. परेशान सा हो गया सहसा जैसे कुछ नया ही सुन लिया हो, कुछ ऐसा जो अविश्वसनीय हो.

विजय स्वयं ही मुसकरा भी पड़ा. हंस कर गरदन हिला दी मानो मैं ने कोई बेवकूफी भरी बात कर दी हो. कहीं वह मुझे ‘इमोशनल फूल’ तो नहीं समझ रहा. अकसर लोग मुझ जैसे इनसान को एक भावुक मूर्ख की संज्ञा भी देते हैं. ऐसा इनसान जिस की जिंदगी में भावना का स्थान सब से ऊपर आता है, ऐसा इनसान जो सोचता है कि एक मानव दूसरे मानव के बिना अधूरा है, ऐसा इनसान जो रिश्तों को तोड़ना नहीं, निभाना चाहता है.

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विजय के व्यवहार से मैं किसी निष्कर्ष तक पहुंचने लगा था, कहीं कुछ ऐसा है अवश्य जिस की वजह से उस में इतना बदलाव है वरना विजय तो ऐसा नहीं था, खुश रहता था, भावुक था, 20 साल की उम्र तक तो हम निरंतर मिले ही थे, वह तो इंजीनियरिंग करने के लिए मुझे इतना दूर जाना पड़ा था, जिस वजह से मेरा ननिहाल छूट गया था. मेरी शादी में मामा अकेले आए थे क्योंकि तब मिन्नी के एम.सी.ए. के इम्तहान थे. विजय तब भी नहीं आया था क्योंकि उस के पास छुट्टी नहीं थी.

घर चले आए थे हम. घर के बाहर पार्क में रात को महिला संगीत का कार्यक्रम था. खासी चहलपहल थी. नताशा की सहेलियां, सीमा की सहेलियां, सभी पढ़ीलिखी, सुंदर, स्मार्ट. मेरी तो भावनाएं अब पत्नी तक सीमित हैं लेकिन विजय तो कुंआरा है, वह एक बार भी बाहर भीड़ में नहीं आया. उस ने एक बार भी किसी चेहरे पर नजर टिकाना नहीं चाहा. कपड़े बदल कर वहीं अपने कमरे में चुपचाप किसी किताब में लीन था.

‘‘आओ विजय, नीचे आ जाओ न. देखो, कितनी रौनक है. इतने पराए से क्यों हो गए हो भाई. क्या हो गया है तुम्हें? तुम तो ऐसे नहीं थे.’’

मेरे होंठों से निकल ही गया. बड़ी चाह से मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया. किताब हाथ से छीन ली.

मेरा मान रख लिया था विजय ने. कोट पहन नीचे चला आया. बहुत सुंदर और शालीन है विजय. लंबा कद और आकर्षक व्यक्तित्व. आंखों पर चश्मा, इंजीनियरिंग कालिज में पढ़ाने वाला एम-टेक नौजवान. क्या कमी है इस में? सुनने में आया था, शादी ही नहीं करना चाहता. चला तो आया था मेरे साथ लेकिन भीड़ से अलग एक तरफ जा बैठा था जहां सोफे पर नताशा की बेटी सो रही थी. प्यारी सी गुडि़या, बुखार में तपती हुई.

‘‘खाना खा ले बेटा.’’

मौसी के अनुरोध पर मैं खाने की तरफ चला आया. आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. नताशा की प्यारी सी गुलाबी कपड़ों वाली बिटिया विजय के गले से लिपटी हुई थी और वह बड़े ममत्व से उस से बातें कर रहा था.

नताशा की सास पास ही खड़ी खाना खा रही थी. पता चला पिछले 2 घंटे से बिटिया ने विजय को इसी तरह पकड़ रखा है. नताशा का पति देखने में ऐसा ही लगता है न, मासूम बच्ची पिता समझ यों लिपट गई थी कि बस. सारा बुखार उड़न छू हो गया था. विजय के हाथ से ही उस ने दूध की बोतल पी थी और विजय के हाथों में ही अब वह सोने भी जा रही थी. नताशा को भी चैन की सांस आई थी.

‘‘विजय भैया ने मेरी बेटी बचा ली,’’ नताशा बोली, ‘‘मुझे तो लगता था यह बुखार इस की जान ही ले लेगा.’’

आंखें गीली थीं नताशा की. मैं ने स्नेह से पास खींच लिया था. उदास थी नताशा. विजय ने भी हाथ बढ़ा कर उदास नताशा का माथा सहला दिया.

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‘‘अब कितनी बार रोएगी पगली, बच्ची तो नासमझ है जो बस, पापापापा ही बोल पाती है. तुम ने मामा कहना सिखाया ही नहीं वरना मुझे मामा कह कर ही पुकारती. बेचारी पापा कहना ही जानती है इसलिए पापा कह कर ही मेरी गोद में आ गई…चल, फोन लगा अमेरिका…अभी इस के पापा से बात कर.’’

जेब से मोबाइल निकाल विजय ने नताशा की तरफ बढ़ा दिया था.

‘‘आज उन का फोन आया था. पूछ रहे थे बिटिया के बारे में. अभी मैं बात नहीं कर…’’

इतना कह नताशा पुन: रोने लगी थी. क्षण भर में फूट पड़ी थी नताशा जिसे विजय ने किसी तरह समझाबुझा कर बहलाया था.

रात अपने कमरे में सोने गए तब बिटिया विजय की बगल में ही थी. मिन्नी पास नहीं थी, वह शायद सीमा के साथ थी. उस की जगह मैं लेट गया. प्यारी सी बच्ची हम दोनों के बीच में सो रही थी. विजय उस का माथा सहला रहा था. ढेर सा प्यार था उस पल विजय की आंखों में, सहसा पूछने लगा, ‘‘भाभी का हाल पूछा कि नहीं. वह ठीक हैं न?’’

हां में सिर हिला दिया मैं ने. ऐसा लग रहा था जैसे विजय किसी खोल में से बाहर आ गया है. बिटिया का नन्हा सा हाथ चूमते हुए मानो भीतर की सारी ममता वह उस पर बरसा रहा था.

‘‘इनसान को भूख हर पल तो नहीं लगती न. इस पल इस जरा सी जान को पिता के प्यार की भूख है. पिता पास नहीं हैं, नताशा को पति का प्यार चाहिए, पति पास नहीं है, मां इस पल यही सोच कर बेचैन हैं…अगर मर गईं तो बेटा आग भी दे पाएगा या नहीं, बुढ़ापे को जवान बेटा चाहिए जो दूर है. आज ये सब लोग उस इनसान के भूखे हैं कल नहीं रहेंगे. आदत पड़ जाएगी इन्हें भी उस के बिना जीने की. इन की भूख धीरेधीरे मर जाएगी. यह जीना सीख जाएंगे. ऐसा ही होता है सोम जब भूख हो तभी कुछ मिले तो संतुष्टि होती है. हर भूख का एक निश्चित समय होता है.’’

सांस रोके मैं उसे सुन रहा था.

‘‘ऐसा ही होगा इस बच्ची के साथ भी. धीरेधीरे पिता को भूल जाएगी. नताशा का भी पति से बस उतना ही मोह रह जाएगा जितना डालर का भाव होगा. आज वह इन के मोह को पीठ दिखा कर चला गया कल जब उसे जरूरत होगी इन लोगों के मन मर चुके होंगे. किसी के प्यार का तिरस्कार कभी नहीं करना चाहिए सोम. बदनसीब है वह पिता जो आज इस बच्ची का प्यार नकार कर चला गया. मैं होता तो इतनी प्यारी बेटी को छोड़ कभी नहीं जाता. रुपया रुपया होता है, सोम. वह भावना का स्थान कभी नहीं ले सकता.’’

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‘‘तुम शादी क्यों नहीं करते विजय. पता चला था तुम ने फैसला ही कर लिया है…क्या मिन्नी का इंतजार कर रहे हो. उस की हो जाए उस के बाद करोगे.’’

‘‘मिन्नी का तो मम्मीपापा जानें… मुझे अपना पता है. बस, शादी नहीं करना चाहता.’’

‘‘मिन्नी के लिए मम्मीपापा क्यों जानें? तुम भाई हो न.’’

‘‘मिन्नी से बात किए मुझे शायद 5-6 साल हो गए. हम आपस में बात ही नहीं करते. तुम तरस रहे हो तुम्हारी कोई बहन होती. मेरी है न, मैं उस से बोलता ही नहीं.’’

आगे पढ़ें- धीरेधीरे बच्ची की आंखों के किनारे…

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