मैं ने बूआजी के लड़के राकेश को चुपचाप शैलेंद्र भैया को बुलाने भेजा. शैलेंद्र भैया 15-20 मिनट तक नहीं आए तो मैं ने सोचा शायद वह हम से मिलना नहीं चाहते हैं. मैं अपने को कोस रही थी कि क्यों मैं ने यहां आने की जिद की. मैं फालतू ही यहां अपनी व अखिल की बेइज्जती कराने आ गई. मैं तो कितना चाव ले कर यहां आई थी पर इन लोगों को हमारे आने की जरा भी खुशी नहीं है. मैं समझ गई कि यहां कोई हमारी इज्जत नहीं करेगा. मैं ने वहां से वापस जाने की सोची.
मैं हारी हुई लुटेपिटे कदमों से अखिल के पास जा ही रही थी कि पीछे से आवाज आई, ‘‘बीनू.’’
मैं ने पलट कर देखा तो राकेश के साथ शैलेंद्र भैया खड़े थे. मैं भैया के पांव छूने झुकी तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया. मैं रोने लगी. भैया भी रोने लगे और बोले, ‘‘कैसी है री, तू? मुझे अभीअभी पता चला कि तू आ चुकी है. मैं सब की नजर बचा कर दौड़ादौड़ा तेरे पास चला आया. अच्छा हुआ, अंजु ने तुझे सही समय पर सूचित कर दिया, नहीं तो मैं सोच रहा था कि पता नहीं अंजु तुझे कहेगी भी या नहीं.’’
मैं बोली, ‘‘तो क्या आप ने अंजु को कहा था मुझे कहने के लिए?’’
भैया बोले, ‘‘हां…तू क्या सोचती है, तेरा भाई इतना निष्ठुर है कि अपनी प्यारी बहन को भूल जाए और अकेला जा कर शादी कर आए. अंजु को मैं ने ही कहा था कि वह तुझे जरूरजरूर किसी भी हालत में आने को कहे.’’
मैं बोली, ‘‘पर मुझे अंजु ने यह तो नहीं कहा था कि उसे आप ने बोला है मुझे आने के लिए.’’
भैया बोले, ‘‘उसे मैं ने ही मना किया था कि मेरा नाम नहीं ले क्योंकि मैं तुझे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. तेरे आने से मुझे तसल्ली है. तू मुझ से एक वादा कर, अब तुझे कोई कुछ भी कहे तू अपने भाई को छोड़ कर नहीं जाएगी.’’
मैं ने कहा, ‘‘ठीक है भैया, अब तो आप की खातिर सब सह लूंगी.’’
भैया बोले, ‘‘अखिल कहां हैं…मुझे उन से मिला तो सही.’’
भैया को मैं ने अखिल से मिलवाया तो भैया हाथ जोड़ कर अखिल से बोले, ‘‘अखिल, आप ने अच्छा किया जो मेरी बहन को आज के दिन ले आए. मैं आप का आभारी हूं. आप को शायद मैं अच्छी तरह अटेंड न कर पाऊं पर प्लीज, आप कहीं मत जाना, चाहे परिवार का कोई कुछ भी कहे.’’
ये भी पढ़ें- शुक्रिया दोस्त: शालू ने क्या किया था
अखिल बोले, ‘‘भाई साहब, आज तो हम आए ही आप की खातिर हैं, जैसा आप कहेंगे वैसा ही करेंगे.’’
भैया बोले, ‘‘अखिल, मैं अभी आता हूं. आप लोग यहीं रुकें.’’
फिर मैं व अखिल एकांत में कुरसी पर बैठ गए. मैं अखिल को अपने घर के बारे में, अपनी बचपन में की गई शरारतों के बारे में बताने लगी.
हमारे यहां रस्म है कि दोपहर में दूल्हे की एक आरती उस की बड़ी बहन करती है. वह रस्म जब होने जा रही थी तो मैं व अखिल चुपचाप कुरसी पर बैठे उसे देख रहे थे. मेरे पापा ने उस रस्म के लिए मेरी छोटी बहन शालिनी को आवाज लगाई तो शैलेंद्र भैया बोले, ‘‘पापा, बीना के यहां होते शालिनी कैसे आरती करेगी? क्या कभी शादीशुदा बहन के होते छोटी बहन आरती करती है? आरती तो बीना ही करेगी,’’ ऐसा कह कर भैया ने मुझे आवाज दी, ‘‘बीनू, यहां आओ, तुम्हें कसम है.’’
मैं डरती हुई भैया के पास आई. भैया ने आरती की थाली मुझे सौंपनी चाही कि ताऊजी व पापा ने मुझ से वह थाली छीन ली और बोले, ‘‘यह लड़की इस घर का कोई शुभ कार्य नहीं करेगी. इस से हमारा कोई नाता नहीं है. हमारे लिए यह मर चुकी है और इस के लिए हम मर चुके हैं.’’
यह सुन कर मेरी एकदम रुलाई फूट गई. मुझे यों अपमानित होते देख अखिल मेरे पास आए और बोले, ‘‘चलो, बीना, चलो यहां से. मैं तुम्हारी और बेइज्जती होते नहीं देख सकता.’’
यह सुन कर पापा बोले, ‘‘हां, हां…चले जाओ यहां से. वैसे भी यहां तुम्हें बुलाया किस ने है?’’
अखिल बोले, ‘‘आप ने हमें नहीं बुलाया लेकिन हम यहां इसलिए आए हैं क्योंकि बीना अपने भाई को दूल्हा बने देखना चाहती थी और मैं यहां इस की वह इच्छा पूरी करने आया था, पर मुझे क्या पता था कि यहां इस की इतनी बेइज्जती होगी.
‘‘अरे, आप को बेइज्जती करनी थी तो मेरी की होती. गुस्सा निकालना था तो मुझ पर निकाला होता, दोषी तो मैं हूं. इस मासूम का क्या कुसूर है? आप लोगों के लिए पराया तो मैं हूं, यह तो आप लोगों की अपनी है. आप के घर की बेटी है, आप का खून है. क्या खून का रिश्ता इतनी जल्दी मिट जाता है कि अपनी जाई बेटी पराई हो जाती है?
ये भी पढ़ें- हम साथ साथ हैं: क्या जौइंट फैमिली में ढल पाई पीहू
‘‘मैं इस के लिए पराया हो कर भी इसे अपना सकता हूं और आप लोग इस के अपने हो कर भी इसे दुत्कार रहे हैं. मैं पराया हो कर भी इस की खुशी, इस की इच्छा की खातिर अपनी बेइज्जती कराने यहां आ सकता हूं और आप लोग इस के अपने हो कर भी इस की बेइज्जती कर रहे हैं. इस की खुशी, इस की इच्छा की खातिर थोड़ा सा समझौता नहीं कर सकते. यह बेचारी तो कितने सपने संजो कर यहां आई है. कितने अरमान होंगे इस के दिल में अपने भाई की शादी के, पर आप लोगों को इस से क्या? आप लोग तो अपनी झूठी इज्जत, मानमर्यादा के लिए उन सब का गला घोटना चाहते हैं.
‘‘मैं पराया हो कर भी इसे 2 साल में इतना प्यार दे सकता हूं और आप जिन्होंने इसे बचपन से अपने पास रखा उसे जरा सा प्यार नहीं दे सकते. इस का गुनाह क्या है? यही न कि इस ने आप लोगों की इच्छा से, आप की जाति के लड़के से शादी न कर मुझ जैसे दूसरी जाति के लड़के से शादी की. इस का यह गुनाह इतना बड़ा तो नहीं है कि इसे हर पल, हर घड़ी बेइज्जत किया जाए. इस ने जो कुछ अपनी खुशी, अपनी जिंदगी के लिए किया वह इतना बुरा तो नहीं है कि जिस के लिए बेइज्जत किया जाए और रिश्ता तोड़ दिया जाए.’’
मैं आज अखिल को ऐसे बेबाक बोलते पहली बार देख रही थी. मैं अखिल को अपलक देखे जा रही थी.
आगे पढ़ें- खानापीना छोड़ कर खुद अपने को…