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रीना के पिता गिरधारी लाल सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायरमैंट के पहले इलाहाबाद में ही एक छोटा सा मकान बनवा लिया था. बड़े बेटे की नौकरी भी लगवा दी थी. लेकिन शेष दोनों बेटे और बेटी बेरोजगार ही रह गए थे. रीना बीए कर चुकी थी. वह उन की तीसरी संतान थी. उस की मां अधिक पढ़ीलिखी नहीं थी, साधारण गृहिणी थीं.

बड़े बेटे की शादी के बाद रीना की शादी के बारे में सोचा, जबकि उस से बड़ा एक भाई अभी तक अविवाहित था. परंतु वह बेरोजगार था. रिटायरमैंट के बाद उन्हें जो पैसा मिला था, उस से बेटी की शादी कर के निश्ंिचत हो जाना चाहते थे.

रीना के पिता सरकारी नौकरी में बहुत अच्छे पद पर नहीं थे, लेकिन चालाक किस्म के इंसान थे. रीना के लिए उन्होंने अनिल को पसंद किया था. वह सिविल इंजीनियर था और लोक निर्माण विभाग में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर तैनात था. उस के पिता नहीं थे. घर में बस उस की मां थीं. उस की चारों बहनों की शादी हो चुकी थी.

इस से अच्छा लड़का रीना के लिए कहां मिलता.

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डाक्टरइंजीनियर लड़कों की दहेज की मांग बड़ी लंबी होती है. लेकिन गिरधारी लाल ने अपने दामाद और उस के रिश्तेदारों को पता नहीं क्या घुट्टी पिलाई कि रीना की शादी बिना दहेज के हो गई.

रीना जब ब्याह कर ससुराल आई, तो पति का बड़ा मकान देख कर दंग रह गई. पता चला, ससुरजी ने बनवाया था. वे भी राज्य सरकार में किसी अच्छे पद पर थे.

शादी के बाद रीना जब दूसरीतीसरी बार ससुराल आई, तो पता चला कि उस के पति की आय के कई स्त्रोत थे. हर तीसरेचौथे दिन अनिल नोटों की मोटी गड्डियां ले कर घर आता था.

उस की सास भी उस की मां की तरह बहुत पढ़ीलिखी नहीं थीं, सीधी थीं. धीरेधीरे उस ने महसूस किया कि सासुजी का झुकाव अपनी बेटियों की तरफ कुछ ज्यादा ही था. कोई न कोई बेटी सदा घर में बनी रहती, जैसे सभी ननदों ने आपस में तय कर रखा था कि बारीबारी से वे मायके आती रहेंगी.

यहां तक तो सब ठीक था. रीना को ननदों के अपने मायके आने पर एतराज नहीं था, परंतु उस ने महसूस किया कि जब भी कोई ननद आती, तो पैसों की डिमांड ले कर आती और जाते समय 10-20 हजार रुपए ले कर ही जाती. सासुजी बेटियों को पैसा देते समय यह न सोचतीं कि बेटियों की मांग जायज है या नाजायज.

उस की ननदों के बहाने भी वही गढ़ेगढ़ाए से होते, ‘वो कह रहे थे कि  इस बार एक कमरा बनवा लें. 50 हजार रुपए जोड़ कर रखे हैं. अम्मा, आप कुछ मदद कर दो तो कमरा बन जाएगा.’

‘बेटे का ऐडमिशन दून स्कूल में करवाना है. कई लाख लगेंगे. अम्मा, आप कुछ मदद कर देना.’

‘बहुत दिनों से घर में एसी लगवाने की सोच रही थी. अम्मा, आप कहो तो लगवा लूं.’

‘अम्मा, एक नई कार आई है. 8 लाख रुपए की है. दामादजी का बड़ा मन है लेने का. वैसे तो बैंक से फाइनैंस करवा रहे हैं, परंतु 2 लाख रुपए अपनी तरफ से देने पड़ेंगे.’

सभी का आशय यही होता था कि अम्माजी पैसे दें, तो ननदों के काम हो जाएं और अम्मा भी इतनी उदार कि उन के मुंह से, बस, यही निकलता-

‘ठीक है, कर दूंगी.’ यह वे ऐसे कहतीं जैसे कि उन के पास पैसों का कोई गड़ा हुआ खजाना हो. सच भी था. अनिल सारा पैसा ले कर मां के ही हाथ में देता था. रीना का तो जैसे वहां कोई अस्तित्व ही नहीं था या वह उस घर की सदस्य ही नहीं थी.

रीना को यह अच्छा नहीं लगता था कि कोई उस के पति की कमाई पर इस तरह ऐश करे. परंतु उस की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे इसे रोके, यह सिलसिला अपनेआप रुकने वाला नहीं था. पति से कहने में डरती थी, कहीं वे बुरा न मान जाएं. वह कशमकश में जी रही थी. शादी को अभी अधिक दिन भी नहीं हुए थे कि घर में अपना पूरा अधिकार जताए. घर के माहौल को समझने और उसे अपने पक्ष में करने के लिए सब से पहले पति को अपने काबू में करना होगा.

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वह अपने पिता की तरह चालाक तो थी, परंतु खूबसूरती में थोड़ा कम थी, इसलिए अपने पति से दबती थी. अकसर वह सोचा करती, पति ने उस के साथ शादी करने के लिए हां कैसे कर दी, जबकि वे अच्छे पद पर थे और उस से ज्यादा गोरे व खूबसूरत भी. परंतु अब वह उस की पत्नी थी और इस घर की बहू.

अनिल का स्वभाव बहुत अच्छा था. किसी चीज में मीनमेख निकालने की उस की आदत नहीं थी. फिर भी पति से रीना ने कोई बात नहीं की. अगली बार जब वह मायके गई तो अपनी मम्मी से घर की एकएक बात विस्तार से बताई और अपने संशयों का समाधान पूछा.

उस की मम्मी चिंतित हो कर बोलीं, ‘‘बेटी, हम ने इसलिए नहीं तुम्हारे लिए इतना अच्छा कमाऊ पति ढूंढ़ा था कि तुम उस की संपत्ति को दूसरों के ऊपर लुटते हुए देखोगी. वह तुम्हारा घर है. वहां की हर चीज पर तुम्हारा अधिकार है. दामादजी अच्छे पद पर हैं, अच्छा कमाते हैं, परंतु वे बहुत भोले हैं. उन के इसी भोलेपन का फायदा उन की बहनें उठा रही हैं. वे अपनी मां को पटा कर अपना उल्लू सीधा कर रही हैं. ऐसा ही चलता रहा, तो तुम्हारे पति की सारी कमाई तुम्हारी ननदों के घर चली जाएगी और एक दिन तुम कंगाल हो जाओगी.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ रीना ने अनजान बन कर पूछा.

‘‘अरे, तुम एक स्त्री हो. अपने स्त्रीहठ का प्रयोग करो. पति को काबू में करो और जो भी वे कमा कर लाएं, उस को अपने हाथों में रखो. सास के हाथ में गया, तो समझो बरसात का पानी है. कहीं भी बह कर चला जाएगा.’’

‘‘उन्हें कैसे काबू में करूं?’’

‘‘हाय दहया, तू जवान है. शादीशुदा है. पति के साथ रह चुकी है. अभी भी बताना पड़ेगा कि तुझे पति को कैसे काबू में रखना है. अरे, दोचार दिन उस से दूर रह. जब भी वह पास आने की कोशिश करे, मुंह बना कर उस से दूर चली जाओ. रात में भी उसे पास मत आने दो. बस, जब वह उतावला हो जाए, तो जो चाहे करवा लो.’’

रीना हौले से शरमाते हुए मुसकराई और मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया.

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इस बार जब वह ससुराल गई तो बहुतकुछ सीख कर गई थी. उस के तेवर बदले हुए थे. वह पति से बात तो करती, परंतु उस के मुख से हंसी गायब हो गईर् थी, स्वर में रुखापन आ गया था. काम की व्यस्तता के चलते पति अनिल ने महसूस नहीं किया. परंतु जब रात में उस ने उसे अपनी आगोश में लेना चाहा, तो वह छिटक कर परे हो गई. अनिल को आश्चर्य हुआ. वह एक पल रीना को देखता रहा, जो बिस्तर के किनारे मुंह दूसरी तरफ कर के लेटी थी, परंतु उस का बदन हिलोरें मार रहा था, जैसे वह किसी बात को ले कर बहुत उत्तेजित हो. अनिल ने उस की कमर को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाने का प्रयास किया, परंतु रीना जैसे बिस्तर के किनारे चिपक गई थी.

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