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देवरानी किसी महारानी की तरह सजधज कर मैगजीन पढ़ रही थी. सुधा अपनी मामूली सी साड़ी की सिलवटें ठीक करने लगी. एक कृत्रिम मुसकराहट के साथ देवरानी गले लग गई. देवर बाहर गए थे. औपचारिक बातचीत होती रही. लंच के समय देवर भी आ गए. भाभी को अभिवादन कर भाई के बारे में पूछने लगे. सुधा ने जब दोस्तों के साथ गोवा जाने की बात कही, तो हैरान हो गए, बोले, ‘‘मैं तो भैया के सारे दोस्तों को जानता हूं. वे सब तो यहीं शहर में हैं. अभीअभी तो बाजार में ही मिले थे. पता नहीं कौन से दोस्त साथ गए हैं?’’

तभी खाना लग गया. घर में एक स्थायी मेड रखी थी. वह सारा काम देखती थी. उस ने कई तरह के व्यंजन टेबल पर सजा दिए. सुधा हैरान रह गई. शाम को देवर सुधा को कार से घर छोड़ने जाने लगा तो सुधा के मन में एक टीस सी उठी, वह घर पर अकेली थी, एक बार भी रात को रुकने को नहीं कहा. निराश सी कार में बैठ गई. जिस देवर को छोटे भाई की तरह रखा, वह समय के साथ कैसे बदल गया. इन लोगों के लिए मैं ने अपना जीवन कुरबान कर दिया. कोई मेरा न हुआ.

घर आ कर चाय बना कर बैठी ही थी कि मुंबई से बेटे अतुल का फोन आ गया. कुछ नाराज सी आवाज में बोला, ‘‘मम्मी, पापा क्या गोवा गए हैं?’’ सुधा ने हामी भरी तो वह बोला, ‘‘पापा ने मुझे एक फोन तक नहीं किया, मिलना तो दूर. और मां, वे किस के साथ गए हैं? मेरा दोस्त मनीष, पापा को जानता है. वह कह रहा था कि उन के साथ कोई महिला थी. जब उस ने पापा को दूर से अभिवादन किया तो वे उठ कर बाहर चले गए.’’

सुधा बोली, ‘‘किसी दोस्त की बीवी होगी या टेबल शेयर किया होगा.’’

बेटे के फोन से सुधा तनावग्रस्त हो गई. रातभर सोचती रही. दिन काटे नहीं कट रहे थे. 2 बार राजेश्वर को फोन लगाया पर फोन स्विचऔफ था. अगले दिन शहर में रहने वाली भतीजी को बुला लिया. वह वकील थी, फिर भी दोपहर बाद अपना लैपटौप ले कर आ गई. यहीं से काम करती रही, बूआ से बातचीत भी करती रही.

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सुधा ने अपने मन की दुविधा अंजू को कह सुनाई. अंजू बोली, ‘‘बूआजी, फूफाजी ऐसा कुछ करेंगे, लगता तो नहीं पर आजकल कोर्ट में ऐसेऐसे केस आ रहे हैं कि कभीकभी शादी जैसे पवित्र बंधन पर प्रश्नचिह्न लग जाते हैं. आप अपनी किसी हौबी को फिर से शुरू करो. इस प्रकार खाली रहने से मन आशंकाओं से घिर जाता है. फिर भी कभी मेरी जरूरत पड़े तो याद करना. मैं शहर में ही हूं.’’

सुधा का मन कुछ शांत हुआ. बूआभतीजी मिल कर बाजार गईं, चाटपकौड़ी खाई. सुधा ने अपना सालों पुराना हारमोनियम ठीक करवाया. सालों बाद सुर लगाने की कोशिश करने लगी. पर सुर ठीक नहीं लग पा रहे थे. सुधा मायूस हो गई. भतीजी अंजू ने समझाया, ‘‘बूआ, कोईर् भी हुनर हो, सालोंसाल छोड़ दो तो यही होता है. मन शांत कर अभ्यास करिए, सब हो जाएगा.’’

अगले दिन सवेरे अंजू चली गई. शाम तक राजेश्वर आ पहुंचे. सुधा भरी बैठी थी. चाय दे कर मौके की तलाश में बैठ गई. चाय पी कर राजेश्वर सुस्ताने बैठे ही थे कि सुधा का रोष फूट पड़ा, बोली, ‘‘क्या मैं पूछ सकती हूं आप किन दोस्तों के साथ गोवा गए थे.’’

अचानक राजेश्वर बौखला गए, बोले, ‘‘क्यों? मेरे हर दोस्त को तुम जानती हो जो बताऊं?’’ अपना पक्ष मजबूत करते हुए आगे बोले, ‘‘तुम्हें सारे दिन किचन में रहना अच्छा लगता, तो मैं भी घर में कैद हो जाऊं?’’

सुधा आक्रोश से भर उठी, ‘‘आप के दोस्त तो सारे यहीं थे, आप किस के साथ गए थे? अतुल के दोस्त ने आप को किसी महिला के साथ देखा था, वह कौन थी?’’

पोल खुलती देख स्वर को ऊंचा कर के राजेश्वर बोले, ‘‘रही न कुएं की मेढक, तुम जैसी औरतों से तो बस दालसब्जियों के मोलभाव करवा लो, बाहर की दुनिया क्या जानो. एक मित्र मिल गया था, उस की पत्नी थी वह, समझीं.’’ वे आगे बोले, ‘‘मेरी जासूसी करने से अच्छा है कुछ रहनेसहने व पहनेओढ़ने के तौरतरीके सीख लेतीं तो पढ़ीलिखी महिलाओं के बीच खड़ी होने योग्य हो जातीं.’’ यह कह कर राजेश्वर बाहर निकल गए.

सुधा के स्वाभिमान पर गहरी चोट लगी थी, बेबसी पर आंसू छलक आए. आहत सी वह डिनर बनाने लग गई. रात के 12 बज गए. पति का अतापता नहीं था. सुधा समझ गईर्, दाल में कुछ काला है. थोड़ी देर में राजेश्वर आ गए. कपड़े बदल, तकिया उठा दूसरे बैडरूम में चले गए.

सुधा रातभर अपने बैडरूम में लेटी सोचती रही, समय के साथ मैं ही न बदली, सब बदल कर उस से दूर हो गए. अब अपने को बदल के खुद को पति के मुकाबले का बनाऊंगी. पूरी रात सुधा ने रोते हुए काटी. सवेरे उठ किचन में लग गई. राजेश्वर बड़े बेमन से नाश्ता कर औफिस निकल गए.

सुधा ने पति की अटैची खोली. कपड़े धोने के लिए निकालने लगी. अचानक रामेश्वर के टौवल में से एक पीला सिल्क का ब्लाउज गिरा. सुधा ने ब्लाउज को अपनी अलमारी में रख दिया.

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शाम को जब चाय पी कर राजेश्वर टीवी देखने लगे तो सुधा भी वहीं आ गई. वह बोली, ‘‘आप को जो दोस्त की पत्नी वहां मिली थी वह क्या अपना ब्लाउज भी आप की अटैची में डाल गई थी.’’ यह कह उस ने ब्लाउज उन के आगे रख दिया.

ब्लाउज देख राजेश्वर शर्मिंदा हो गए पर ऊंची आवाज से सुधा को डांटने लगे. लेकिन जब बदले में सुधा ने खरीखोटी सुनाई तो स्वर बदल कर बोले, ‘‘देखो सुधा, तुम मेरे योग्य न कभी थीं. न भविष्य में होगी. तुम ने सारी जिंदगी किचन में गुजार दी. अब मैं अपने अनुसार जीना चाहता हूं. मैं तुम्हें घर से जाने को नहीं कहता. जैसे पहले रहती थीं, रहती रहो. पर मुझे मेरे अनुसार जीने दो.’’ यह कह कर उठ खड़े हुए.

सुधा बोली, ‘‘लेकिन मैं ने तो अपना सारा जीवन आप के परिवार पर कुरबान कर दिया.’’ इस पर राजेश्वर बोले, ‘‘यह करने को मैं ने तुम्हें मजबूर नहीं किया था. गरिमा मेरी पुरानी मित्र हैं. उन्होंने शादी नहीं की थी. वे और मैं बचपन से एकसाथ पढ़े और बड़े हुए. पिताजी ने मेरी मंशा जाने बिना न जाने क्यों तुम से मेरा रिश्ता तय कर दिया. अब मैं गरिमा का साथ चाहता हूं.’’

यह सुनते ही सुधा के दिल में सैकड़ों तीर एकसाथ घुस गए, बेहोशी सी आने लगी, किसी तरह लड़खड़ाती बिस्तर तक पहुंची और कटे पेड़ सी गिर पड़ी.

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