बड़ी भाभी बंबई में पलीबढ़ी थीं. खातेपीते अच्छे परिवार से आई थीं. ऐसा नहीं था कि हम लोग उन के मुकाबले कम थे. पिताजी बैंक में मैनेजर थे. मां जरूर कम पढ़ीलिखी थीं किंतु समझदार थीं.
बड़ी भाभी बंबई से आई थीं, शायद इसी कारण हम सभी को गंवार समझती थीं क्योंकि हम जौनपुर जैसे छोटे शहर में रहते थे. हां, भैया को वे जरूर आधुनिक समझती थीं. कारण, घर के बड़े बेटे होने के नाते उन का लालनपालन बड़े लाड़प्यार से हुआ था. कौन्वैंट में पढ़ने के कारण धाराप्रवाह अंगरेजी बोल लेते थे. सुबह से ही बड़ी भाभी का बड़बड़ाना चालू था, ‘जाने क्या समझते हैं सब अपनेआप को. आखिर हैं तो जौनपुर जैसे छोटे शहर के…रहेंगे गंवार के गंवार. किसी को आगे बढ़ते देख ही नहीं सकते. हमारे बंबई में देखो, रातरात भर लोग बाहर रहते हैं किंतु कोई हंगामा नहीं होता.’
छोटी भाभी सिर झुकाए आटा गूंधती रहीं जैसे कुछ सुनाई न दे रहा हो. मुझे कालेज जाने में देर हो रही थी. हिम्मत कर के रसोई में पहुंची. धीमी आवाज में बोली, ‘‘भाभी, मेरा टिफिन.’’
‘‘लो आ गई…कालेज में पहुंच गई, किंतु अभी तक प्राइमरी के बच्चों की तरह बैग में टिफिन डाल कर जाएगी. एक हमारे यहां बंबई में सिर्फ एक कौपी उठाई, पैसे लिए और बस भाग चले.’’ वहां रुक कर और सुनने की हिम्मत नहीं हुई. सोचने लगी, ‘आखिर भाभी को हो क्या गया है, आज से पहले उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा.’
जैसे ही भोजनकक्ष में गई, छोटे भैया की आवाज सुन कर पैर रुक गए.
‘‘आखिर आप करते क्या हैं बाहर आधी रात तक? हम सभी की नींद खराब करते हैं…’’
पिताजी बीच में ही बोल पड़े, ‘‘बेटे, आखिर ऐसी कौन सी कमाई करते हो जिस के कारण तुम्हें आधीआधी रात तक बाहर रहना पड़ता है? तुम्हारा दफ्तर तो 5 बजे तक बंद हो जाता है न?’’
‘‘पिताजी, दफ्तर के बाद कभी मीटिंग होती है, बड़ेबड़े लोगों के साथ उठनाबैठना पड़ता है. आगे बढ़ने के लिए आखिर उन के तौरतरीके भी तो सीखने पड़ते हैं,’’ बड़े भैया ने अत्यंत धीमी आवाज में कहा.
पिताजी के सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी तेज आवाज में बोलने की. वे न ऊंचा बोलते थे और न ही उन्हें ऊंची आवाज पसंद थी. वे बड़े भैया को हिदायत दे कर छड़ी संभालते हुए बाहर निकल गए. किंतु मां से नहीं रहा गया, उन्होंने बड़े भैया को डांटते हुए कहा, ‘‘तुझ को पिताजी से झूठ बोलते शर्म नहीं आती. आगे बढ़ने की इतनी ही फिक्र थी तो 3-3 ट्यूशनों के बावजूद तुम कभी प्रथम क्यों नहीं आए? मन लगा कर पढ़ा होता तो यह नाटक करने की जरूरत ही न पड़ती. हम सब को पाठ पढ़ाने चले हो. रात 12 बजे कौन सी शिक्षा लेते हो, जरा मैं भी तो सुनूं.’’
‘‘मां, तुम क्या जानो दफ्तर की बातें. तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आएगा. तुम तो बस आराम करो और छोटे, तू अपने काम से काम रख,’’ बड़े भैया ने छोटे भैया की तरफ घूर कर कहा.
तभी पीठ पर किसी का स्पर्श पा मैं पीछे पलटी. बड़ी भाभी टिफिन लिए खड़ी थीं. कंधे पर हाथ रख प्यार से बोलीं, ‘‘मेरे कहे का बुरा मत मानना, बीनू, पता नहीं मुझे क्या हो गया था.’’
मैं ने मुसकराते हुए टिफिन लिया और बिना कुछ कहे बाहर चली गई.
करीब 10-12 दिनों तक सब ठीक चलता रहा. बड़े भैया भी समय से घर आ जाते थे. मां, पिताजी तो पहले खा कर सोने चले जाते. बाद में हम सभी साथ खाना खाते. इकट्ठे खाना खाते बड़ा अच्छा लगता. दोनों भाभियों में भी पहले की तरह बात होने लगी थी. अचानक एक रात ‘खटखट’ की आवाज से नींद खुल गई. मन आशंका से कांप गया. बगल का कमरा बड़े भैया का था. हिम्मत कर के मैं उठी. सोचा, उन्हें उठा दूं. कुंडी खोलतेखोलते किसी की आवाज सुन अचानक हाथ रुक गया. ध्यान से सुनने पर पता चला कि यह बड़े भैया की आवाज है. वे भाभी से कह रहे थे, ‘‘दरवाजा बंद कर के सो जाओ. जल्दी लौट आऊंगा.’’
घड़ी की तरफ देखा, साढ़े 11 बज रहे थे. आखिर क्या बात है? इतनी रात गए भैया क्यों बाहर जा रहे हैं? कहीं किसी की तबीयत तो नहीं खराब हो गई? किंतु आवाज तो बस बड़े भैया, भाभी की ही थी. सोचा, जा कर भाभी से पूछूं, किंतु हिम्मत न हुई.इसी उधेड़बुन में नींद गायब हो गई. काफी कोशिश के बाद जब हलकी नींद आई ही थी कि ‘खटपट’ सुन कर आंख फिर खुल गई. शायद भैया आ गए थे. घड़ी देखी, 3 बज रहे थे. भैया ने बाहर जाना छोड़ा नहीं था. सब की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह चाल चली थी. उन की इस चाल में भाभी भी शरीक थीं.
रात को आनेजाने का सिलसिला करीब रोज ही चलता था. एक रात दरवाजे पर होती लगातार दस्तक से मेरी नींद उचट गई. भाभी को शायद गहरी नींद आ गई थी. मैं जल्दी से उठी क्योंकि नहीं चाहती थी कि मांजी उठ जाएं और पिताजी तक बात पहुंचे. जैसे ही मैं ने दरवाजा खोला, बदबू का एक झोंका अंदर तक हिला गया. भैया ने शायद ज्यादा पी ली थी. अंदर आते ही बोले, ‘‘क्यों जानू, आज इतनी…’’ तभी मेरी तरफ नजर पड़ते ही खामोश हो गए.
तब तक भाभी आ गई थीं. वे बिना कुछ कहे सहारा दे कर भैया को कमरे में ले गईं. उस रात मैं सो न सकी. सारी रात करवटें बदलते बीती. यही सोचती रही कि मां से कह दूं या नहीं? कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सुबह थोड़ी झपकी आई ही थी कि
बड़ी भाभी ने आ कर जगा दिया. बोलीं, ‘‘बीनू, कृपया रात की बात किसी से न कहना.’’
तब तक मैं ने भी निर्णय कर लिया था कि बात छिपाने से अहित भैया का ही है. मैं ने उन की तरफ सीधे देखते हुए कहा, ‘‘वह तो ठीक है भाभी, किंतु जब मैं ने रात को दरवाजा खोला तो विचित्र बू का आभास हुआ. कहीं भैया…’’
भाभी बीच में ही मुंह बना कर बोलीं, ‘‘हमें तो कोई गंध नहीं आई.’’
मैं खुद अपने प्रश्न पर लज्जित हो गई. अपने पर क्रोध भी आया कि जब भाभी को भैया की फिक्र नहीं है तो मैं ही क्यों चिंता में पड़ूं. इसी तरह 2 हफ्ते और बीत गए. मैं भी घर में कलह नहीं कराना चाहती थी, इसीलिए मुंह सी लिया.