‘‘खैर मानिए कि लड़की यहीं पर है. हमारे रिश्तेदारों में भी ऐसी ही घटना हो गई थी. रिश्तेदार एक छोटे से गांव के रहने वाले और रूढि़वादी हैं. उन की लड़की ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं है. गांव से ही मिडिल पास है. अंगरेजी तो बिलकुल नहीं आती. जब उसे अमेरिका में रहने वाला लड़का ब्याह कर ले गया तो सारे रिश्तेदार अचंभित थे. जवान लड़कियां उस से ईर्ष्या करतीं. वह लड़की जब अमेरिका पहुंची तो उस ने देखा कि उस का पति और उस की अमेरिकन पत्नी सुबहसुबह नौकरी के लिए निकल जाते. उन्हें केवल एक पूर्णकालीन नौकरानी की जरूरत थी जो उन की, उन के घर की और उन के बच्चे की देखभाल कर सके. ऐसे में दहेज दे कर भी अगर ऐसी कोई लड़की मिल रही थी तो लड़के की तो मुंहमांगी मुराद पूरी हो रही थी. ऐसी जिंदगी से तंग आ कर लड़की ने जब भारत वापस लौटना चाहा तो पहले तो किसी ने ध्यान न दिया, बाद में रोजरोज उस के कहने पर दोनों मिल कर उस की पिटाई करने लगे. न वहां उस की खोजखबर लेने वाला था न कोई उस की मदद करने वाला.’’
‘‘रेखाजी, आएदिन अखबारों में विज्ञापन छपते हैं, आप देखती ही होंगीं, ‘उच्च शिक्षा प्राप्त करने या नौकरी के लिए आस्ट्रेलिया, कनाडा या और कहीं जाने के लिए आप हम से मिलिए. हम आप के पासपोर्ट, वीजा आदि का इंतजाम करवा देंगे.’ बाद में पता चलता है कि वहां जा कर या तो कोई सड़कछाप काम करना पड़ता है या तरहतरह की ठोकरें खानी पड़ती हैं, नौकरी मिलना तो दूर की बात है, वापस आने के पैसे भी नहीं होते. कितने लोग गलत कामों में फंस जाते हैं,’’ लतिका ने कहा जो इन महिलाओं में ज्यादा समझदार थी.
‘‘ठीक कहा आप ने लतिकाजी, कई बार तो ये एजेंट लोग पैसे लेने के बाद यहीं के यहीं गायब हो जाते हैं कि विदेश जाने का सपना धरा का धरा रह जाता है,’’ एक अन्य ने जोड़ा.
विभा का सिर चकराने लगा. क्या ये सब बातें सच हैं या विदेश जाने वाले लोगों के प्रति जलन के मारे ऐसी बातें फैलाई जाती हैं.
‘‘विभाजी, आप यहां क्या कर रही हैं. सब लोग खाना शुरू भी कर चुके हैं. कहां खो गई हैं आप? चलिए, मैं ले चलती हूं,’’ मिसेज मोहन ने उन का हाथ थाम कर उठाते हुए कहा.
घर वापस आतेआते रात के 11 बज रहे थे. आते ही मां ने नरेंद्र से कहा, ‘‘बेटा, भोपाल से अर्चना का फोन आया था. उस की बेटी पिंकी की शादी तय हो गई है. अक्तूबर में शादी होगी. तारीख पक्की होते ही फिर बताएगी.’’
‘‘अच्छा मां, यह तो बड़ी अच्छी बात है. आज तो बहुत देर हो गई है. कल मैं दीदी से बात करता हूं,’’ नरेंद्र ने कहा.
घर में सब बहुत खुश थे खासकर नरेंद्र. उस की बहन अर्चना कई महीनों से अपनी बेटी के लिए एक अच्छे वर की तलाश में थी. अर्चना ने किसी से कहा तो नहीं था पर सभी लोग जानते थे कि वह हमेशा से विदेश में बसने वाले दामाद की तलाश में थी. पिंकी की पढ़ाई तो 2 साल पहले ही पूरी हो गई थी मगर दीदी की तलाश आज रंग लाई थी. उस ने जरूर अपनी पसंद का ही दामाद ढूंढ़ा होगा.
अगले दिन फोन से बात करने पर उस का अंदाजा सही निकला. यह जान कर सब खुश हुए. दीदी ने बताया कि लड़का अमेरिका के टैक्सास में रहता है.
दीदी चाहती थीं कि सब लोग शादी की तैयारियों में मदद करने के लिए कम से कम 10 दिन पहले भोपाल पहुंच जाएं. उन के अलावा दूसरा कौन था मदद करने वाला. सही भी था. अर्चना के बाद मांबाबूजी ने बहुत इंतजार करने के बाद सोच लिया था कि अब उन की कोई संतान नहीं होगी. उन्हें एक बेटा भी चाहिए था, निराशा तो हुई मगर क्या कर सकते थे. उन्होंने अपने मन को समझा लिया था. ऐसे में अर्चना के जन्म के 11 वर्ष के बाद नरेंद्र का जन्म हुआ था. नरेंद्र को अर्चना ने इतना प्यार दिया कि उस को मां और बाबूजी से ज्यादा अर्चना से लगाव था. वह अपनी दीदी की हर बात मानता था. वह उस से दीदी जैसे प्यार करता था, दोस्त जैसा अपनापन देता था और मां जैसा सम्मान करता था.
दफ्तर में 10 दिन छुट्टी ले कर नरेंद्र परिवार के साथ भोपाल जा पहुंचा. दीदी और जीजाजी बहुत खुश हुए. वे जानते थे कि अब नरेंद्र आ गया है तो वह सब संभाल लेगा. नरेंद्र भी तुरंत अपनी भांजी की शादी के कामों में जुट गया.
अगले दिन जब विभा और अर्चना बाजार गई हुई थीं तब अचानक नरेंद्र को खयाल आया कि उस ने तो अपनी भांजी के होने वाले दूल्हे को देखा ही न था. यह बात जब उस ने अपने जीजाजी से कही तो तुरंत उन्होंने कहा, ‘‘अरे, अभी तक अर्चना ने तुम्हें फोटो नहीं दिखाई? रुको, मैं ले कर आता हूं.’’
जब नरेंद्र ने लड़के की तसवीर देखी तो उसे लगा चेहरा तो बहुत जानापहचाना लग रहा है. लेकिन बहुत याद करने पर भी उसे याद नहीं आया कि उसे कहां देखा है? फिर वह शादी के कामों में उलझ कर इस बात को भूल गया.
शाम को नरेंद्र से मिलने मनोहर आया. वह उस का बचपन का दोस्त था. दोनों इंदौर में प्राथमिक कक्षाओं से ले कर महाविद्यालय तक साथसाथ पढ़े थे. फिर वह अमेरिका चला गया. उस के बाद जैसे दोनों का संबंधविच्छेद ही हो गया. उस की खबर न पा कर मित्रों की टोली यही सोचती रही कि वहां जा कर वह बहुत बड़ा आदमी बन गया होगा. पैसों के ढेर पर बैठे उसे इंदौर के ये साधारण मित्र याद नहीं आते होंगे. आज उस से मिलने के बाद नरेंद्र को असलियत का पता चला तो उस की आंखें नम हो गईं.
मनोहर अमेरिका में मिलने वाले वजीफे के भरोसे अमेरिका चला गया और एमएस में दाखिला ले लिया. उसे 6 महीनों तक वजीफा मिला भी. फिर वजीफा मिलना बंद हो गया. बाकी की पढ़ाई पूरी करने के लिए उसे तरहतरह के पापड़ बेलने पडे़. उसे कई ऐसे काम करने पडे़ जो यहां रहते हुए भारतवासी सोच भी नहीं सकते. उसी दौरान उसे कई भयंकर अनुभव हुए. वहां के प्रवासी भारतीयों ने उस की मदद न की होती तो शायद उसे पढ़ाई छोड़ कर वापस आने के लिए पैसे न होने के कारण भीख तक मांगनी पड़ती.
मनोहर ने बताया कि यहां भारतीय सोचते हैं कि अमेरिका जाने वाला हर आदमी जैसे सपनों की सैर करने गया है. वहां वह पैसों में खेल रहा है और वैभवपूर्ण जीवन जी रहा है. कुछ हद तक कुछ लोगों के विषय में यह सही हो सकता है लेकिन वहां ऐसे भी लोग हैं जो पगपग पर ठोकर खाते हैं और तनावपूर्ण जीवन जीते हैं.
मनोहर ने उसे बताया कि लुधियाना का रहने वाला एक लड़का भारत आ कर यहां गांव की सीधीसादी, अनपढ़ लड़की से शादी कर के अमेरिका ले गया. यहां सब खुश थे कि अनपढ़ गंवार हो कर भी लड़की को अमेरिका जाने का मौका मिल गया. वहां उस बेचारी का क्या हाल हुआ, क्या कोई जानता है?
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ नरेंद्र ने पूछा.
‘‘वहां उस लड़के की पहली पत्नी थी जो विदेशी थी. दोनों उस लड़की के सामने ही खुल कर रासलीलाएं करते थे. उन की भाषा अलग, रहनसहन अलग. इस के साथ किसी भी प्रकार का संबंध तो दूर खानेपीने या किसी भी जरूरत के बारे में न पूछते. कामवाली बाई से भी बदतर हालत थी. पति से पूछने पर गालीगलौज और मारपीट. वह वापस आना चाहती थी, वे लोग उस के लिए भी तैयार नहीं हुए. वे उसे किसी से मिलने नहीं देते थे, न कहीं जाने देते थे. एकदो बार उस लड़की ने घर से भागने की कोशिश की तो पकड़ कर वापस ले गए और इतनी पिटाई की कि लड़की ने बिस्तर पकड़ लिया. पता नहीं, बाद में उस ने कब और कैसे खुदकुशी कर ली. बेचारी की कहानी का और क्या अंत हो सकता था? यह सब मुझे वहां के एक मित्र ने बताया.’’
वह चुप हो गया. उस अनजान लड़की के लिए शायद दिल भर आया था. कुछ रुक कर फिर बोला, ‘‘कितनी भी मेहनत करो, आप को अमेरिका में दूसरे नंबर पर ही रहना होगा. स्वाभाविक है कि प्रथम स्थान तो वहां के नागरिकों का होगा. कुछ लोग परिस्थितियों से समझौता कर के, नित्य संघर्ष का सामना करते हुए वहां रह भी गए तो बच्चे जब बडे़ होने लगते हैं तो फिर से तनाव का सामना करना पड़ता है. बच्चे उस माहौल में पलतेबढ़ते हैं, इसलिए उन की संस्कृति ही सीखते हैं. उन की सोच ही अलग हो जाती है. मांबाप को यह सब ठीक लगे और सब की एक राय हो तो ठीक है वरना फिर से संघर्ष. 60 साल के बेटे को भी मांबाप यहां कुछ भी कह देते हैं, डांट देते हैं, अपमानित कर देते हैं पर बेटा कुछ नहीं कहता. पर वहां 12 साल के बच्चे को भी कुछ कहा जाए तो वह बंदूक निकाल कर गोली दाग देगा. ऐसी घटनाएं लोकविदित हैं. ऐसी कई समस्याएं हैं जिन की ओर से लोग जानबूझ कर आंख मूंद लेते हैं.