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लेखिका- रेनू मंडल

खाना खातेखाते जतिन के हाथ रुक गए. बराबर वाले कमरे से मम्मी की आवाज आ रही थी, ‘‘क्या इसी दिन के लिए मैं ने इसे पालपोस कर बड़ा किया था कि एक दिन यह मुझे खून के आंसू रुलाएगा.’’

‘‘साहबजादे बड़े हो गए हैं न, इसलिए अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं करेंगे. मांबाप की अब भला क्या जरूरत है?’’ यह पापा की आवाज थी.

जतिन ने हाथ में पकड़ा रोटी का कौर वापस प्लेट में रख दिया और पानी पी कर उठ गया.

‘‘क्या बात है, जतिन, खाना क्यों छोड़ दिया? और मम्मीपापा सुबहसुबह नाराज क्यों हो रहे हैं?’’ मैं ने चाय का कप टेबल पर रखा और जतिन के समीप चेयर पर बैठ गई. जतिन ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. चुपचाप अपना ब्रीफकेस उठाया और बैंक चल दिया. मैं हैरानी से उसे जाता देखती रही.

2 दिन पहले ही मैं अपनी ससुराल से मायके बी.एड. करने के लिए आई थी. जिस क्षण मैं ने घर की देहरी पर पांव रखा था उसी क्षण घर में पसरे तनाव को महसूस कर लिया था. यद्यपि हमेशा की भांति मम्मीपापा ने गले लगा कर मेरे माथे को चूमा था किंतु उन के माथे पर परेशानी की लकीरें मैं ने साफ महसूस की थीं.

उस समय तो घर पहुंचने के उत्साह में मैं ने इस बात को अनदेखा कर दिया था किंतु शाम होतेहोते जब जतिन घर आया तो उस का चेहरा देख कर मुझे लगा, मेरा अंदेशा गलत नहीं था. अवश्य ही घर में किसी बात को ले कर तनाव था. फिर आज सुबह की घटना, जतिन का भूखे आफिस जाना और मम्मीपापा का उसे कोसते रहना, ये सब बातें मेरे संदेह की पुष्टि कर रही थीं.

जतिन के जाते ही मैं मम्मी के पास गई और पूछा, ‘‘क्या बात है, मम्मी, उधर जतिन बिना खाना खाए बैंक चला गया और इधर आप को और पापा को गुस्सा आ रहा है. आखिर बात क्या है? कोई मुझे कुछ बताता क्यों नहीं?’’

‘‘अब तुम्हें क्या बताऊं? इस लड़के ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा. तुम्हारे पापा ने इस के रिश्ते के लिए एक जगह बात चलाई है. लड़की और उस का परिवार दोनों अच्छे हैं. कल मैं ने इसे लड़की की फोटो दिखानी चाही तो बोला, ‘मैं ने अपने लिए लड़की ढूंढ़ रखी है.’ फोटो तक देखने से इनकार कर दिया. अब तुम्हीं बताओ, मुझे और तुम्हारे पापा को गुस्सा आएगा या नहीं?’’

मम्मी की बात पर मैं सहजता से मुसकरा दी, ‘‘इस में गुस्से वाली कौन सी बात है, मम्मी. अब जमाना बदल चुका है. अकसर लड़केलड़कियां अपने जीवनसाथी स्वयं चुन लेते हैं. जतिन ने भी ऐसा कर लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई.’’

‘‘बेकार की बातें मत कर, नीलू. समझा दे उसे. उस का विवाह वहीं होगा जहां हम चाहेंगे.’’

मैं ने एक गहरी सांस ली और अपने कमरे में आ गई.

शाम को जतिन के बैंक से वापस लौटने पर मैं ने उसे आड़े हाथों लिया, ‘‘क्या मैं अब इतनी पराई हो गई हूं कि तुम अब अपने मन की बात भी मुझ से नहीं कह सकते हो?’’

‘‘सच कहूं, दीदी, अभी रास्ते में यही सोचता आ रहा था कि आज तुम से सारी बात कहूंगा,’’ जतिन बोला.

‘‘अच्छा, अब बता कौन है वह लड़की जिसे तू पसंद करता है,’’ मैं ने उस के लिए चाय का कप टेबल पर रखा और उस के समीप बैठ गई.

‘‘दीदी, उस का नाम स्वाति है. मेरे साथ बैंक में काम करती है. बहुत अच्छी लड़की है पर मम्मीपापा ने उसे बिना देखे अस्वीकृत कर दिया.’’

‘‘जतिन, मम्मीपापा की बात का बुरा मत मानो. वे दोनों पुराने खयालों के हैं. हम दोनों मिल कर उन्हें मनाने का प्रयत्न करेंगे. अच्छा, पहले यह बताओ, मुझे स्वाति से कब मिलवा रहे हो?’’

‘‘दीदी, कल रविवार है. शाम 5 बजे स्वाति को मैं क्वालिटी रेस्तरां में बुला लेता हूं. वहीं पर मिल लेना.’’

अगले दिन 5 बजे मैं और जतिन क्वालिटी रेस्तरां पहुंचे. जब तक जतिन कौफी का आर्डर करता, एक गोरी- चिट्टी सुंदर सी लड़की हमारे करीब आ कर खड़ी हो गई. जतिन ने हमारा परस्पर परिचय कराया. स्वाति ने तुरंत झुक कर मेरे पांव छू लिए. कौफी पीते हुए मैं उस के परिवार से संबंधित हलकेफुलके प्रश्न पूछती रही जिन का वह सहज उत्तर देती रही.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम जानती ही होगी, मम्मीपापा तुम्हारे और जतिन के विवाह के लिए राजी नहीं हैं. ऐसे में जतिन, तुम्हें छोड़ कर उन की पसंद की लड़की से विवाह कर ले तो तुम क्या करोगी?’’

‘‘दीदी, यह तुम क्या…’’ जतिन ने मुझे टोकना चाहा किंतु मैं ने उसे खामोश रहने का संकेत किया और अपना प्रश्न दोहरा दिया.

स्वाति के चेहरे पर मुझे पीड़ा के भाव दिखाई दिए. वह धीमे स्वर में बोली, ‘‘मैं भला क्या कर सकती हूं?’’

‘‘कहीं आत्महत्या जैसा मूर्खतापूर्ण कदम तो नहीं उठाओगी?’’

‘‘नहीं दीदी, मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. जिंदगी में संघर्ष करना अच्छी तरह जानती हूं. आत्महत्या कायरों का काम है. ऐसा कर के अपने मांबाप और भाई को जीतेजी नहीं मार सकती.’’

स्वाति का जवाब सुन कर मुझे अच्छा लगा. प्यार से उस के सिर पर हाथ फेर कर मैं बोली, ‘‘मुझे अपने भाई की पसंद पर गर्व है. मैं तुम दोनों को मिलाने का पूरा प्रयास करूंगी.’’

कौफी पी कर हम लोग उठ खड़े हुए. रास्ते में जतिन बोला, ‘‘दीदी, स्वाति आप को कैसी लगी?’’

‘‘बहुत सुंदर, बहुत समझदार. तुम्हारी शादी उसी से होनी चाहिए.’’

मेरा जवाब सुन कर जतिन के मन को कुछ राहत अवश्य मिली.

एक दिन मैं कालिज से वापस लौटी, तो स्वाति मेरे साथ थी. मम्मी से उसे मिलवाते हुए मैं ने कहा, ‘‘मम्मी, यह स्वाति है. राहुल की बूआ की लड़की. पिछले माह इस की हमारे शहर में नौकरी लगी है.’’

‘‘बेटी, तुम्हारे मातापिता कहां पर हैं?’’

‘‘मम्मीपापा तो दिल्ली में हैं. मैं यहां होस्टल में रहती हूं,’’ मेरे सिखाए हुए जवाब स्वाति ने मम्मी के आगे दोहरा दिए.

‘‘इसे अपना ही घर समझना. जब भी मन करे, आ जाना,’’ मम्मी ने चलते हुए स्वाति से कहा. उस के बाद स्वाति का हमारे घर आनाजाना शुरू हो गया. मम्मी से उस की खूब पटने लगी थी. 2-4 दिन भी वह नहीं आती तो मम्मी उस के बारे में पूछपूछ कर मुझे परेशान कर देती थीं.

एक दिन लंच टाइम में स्वाति घर पर आई. मैं उस समय कालिज गई हुई थी. ज्यों ही वह गेट खोल कर अंदर घुसी उसे सीढि़यों पर से मम्मी के चीखने की आवाज सुनाई दी. वह तेजी से उस ओर लपकीं. देखा, मम्मी सीढि़यां उतरते हुए फिसल गई थीं. स्वाति ने उन्हें सहारा दे कर उठाया. मम्मी के बाएं हाथ में चोट आई थी. हाथ हिलाने में भी तकलीफ हो रही थी. स्वाति ने तुरंत टैक्सी की और उन्हें डाक्टर के पास ले गई. एक्सरे लेने के बाद डाक्टर ने हाथ पर कच्चा प्लास्टर चढ़ा दिया. शाम को हम सब मम्मी का हाथ देख घबरा गए.

सारी बात बता कर मम्मी बोलीं, ‘‘स्वाति बहुत अच्छी लड़की है. उस ने जिस जिम्मेदारी के साथ मेरी देखभाल की, मुझे विश्वास है, वह घर बहुत भाग्यशाली होगा जहां वह बहू बन कर जाएगी.’’

मैं ने जतिन की तरफ मुसकरा कर देखा, बोली, ‘‘मम्मी, क्यों न हम अपने ही घर को भाग्यशाली बना डालें.’’

‘‘अरे, मेरे बस में होता तो कब का बना चुकी होती, परंतु इसे भी तो अक्ल आए न. पता नहीं कौन सी लड़की पसंद किए बैठा है,’’ मम्मी ने जतिन की तरफ गुस्से से देखा.

आगे पढ़ें- मैं ने अपनी बात पूरी की ही थी कि…

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