लेखिका- डा. सरस्वती अय्यर
अगला दिन रविवार था. सुबह विद्या की नींद देर से खुली, घड़ी की ओर देखा, तो बड़बडाई कि अरे 9 बज गए. किसी ने मुझे उठाया तक नहीं. लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर आई तो देखा बाहर गार्डन में मां, पिताजी और अमित बैठ कर गंभीरतापूर्वक किसी विषय में बातचीत कर रहे थे. ड्राइंगरूम में फोन की घंटी बज रही थी. विद्या ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘अमित हैं?’’
‘‘नहीं वे बाहर गार्डन में हैं. मैं विद्या बोल रही हूं, आप कौन?’’ विद्या ने पूछा.
सवाल के जवाब में फिर सवाल पूछा गया, ‘‘आप उस की कौन हैं?’’
‘‘मैं उन की पत्नी हूं,’’ विद्या ने जवाब दिया.
यह सुनते ही फोन कट गया.
‘कौन हो सकती है और उस ने फोन क्यों काटा?’ सोचते हुए विद्या बाथरूम में चली गई. जल्दी से फ्रैश हो कर किचन में जा कर 4 कप कौफी बना कर वह गार्डन में सब के लिए कौफी ले कर आई. उसे देखते ही तीनों शांत हो गए. गुडमौर्निंग कहते हुए विद्या ने मुसकराते हुए सब को कौफी दी और बैठते हुए अमित से पूछा, ‘‘आप का प्रोजैक्ट कैसा रहा? गए थे डेढ़ माह के लिए और लगा दिए 5 महीने,’’ कहते हुए उस ने अमित को शिकायतभरी नजरों से देखा.
मगर अमित ने कोई जवाब नहीं दिया. उड़तीउड़ती नजर उस पर डालते हुए चाय की चुसकियां लेता रहा.
विद्या को उस का यह व्यवहार कुछ चुभ गया पर वह स्वयं को संभालते हुए बोली, ‘‘अरे अमितजी आप का अभी एक फोन आया था, किसी महिला का था, पर जब मैं ने अपना नाम बताया तो पता नहीं क्यों उस ने जल्दी से फोन रख दिया.’’
‘‘अरे छोड़ो यार किसी बैंक वगैरह की क्रैडिट कार्ड बेचने वाली सेल्स गर्ल होगी,’’ कह कर अमित ने बात पलट दी.
विद्या कहना चाहती थी कि फोन करने वाली महिला का अनौपचारिक ढंग किसी क्रैडिट कार्ड वाली का नहीं हो सकता है, पर सब के सामने वह यह बात कह नहीं पाई. एक शक का कीड़ा कहीं अंदर कुलबुलाया जरूर था, पर उस समय बात आईगई हो गई.
अमित विदेश से सब के लिए ढेर सारे तोहफे लाया था. सब उसी में मगन थे, प्रिया भी आई थी, भाई से मिलने. पर इन सब के बीच विद्या को कहीं न कहीं लगता रहा कि अमित उस से अकेले में मिलने और बात करने में कतरा रहा है. खैर, दोपहर में खाना खा कर और भैया के लाए तोहफे ले कर प्रिया अपने घर चली गई. मां और पिताजी भी अपने कमरे में जा कर सो गए. रसोई वगैरह समेट कर विद्या जब अपने कमरे में पहुंची तो अमित गाड़ी की चाबी हाथ में ले कर कमरे से बाहर निकल रहा था.
‘‘अरे आप कहां जा रहे हैं?’’
विद्या के पूछने पर वह बोला कि थोड़ा दोस्तों से मिल कर आता हूं और वह बाहर निकल गया.
‘‘मुझ से मिलना नहीं आप को, मुझ से कुछ बातें नहीं करना आप को.’’
मगर विद्या की बातें सुनने के लिए अमित वहां कहां था. विद्या अपने आंसुओं पर काबू न पा सकी, जा कर कमरे में लेट गई.
लगातार बजती फोन की घंटी सुन कर विद्या उठी. एक बार फिर सुबह वाली आवाज थी, ‘‘अमित हैं क्या घर पर?’’
नहीं वे बाहर गए हैं. आप कौन?’’ विद्या ने पूछा.
मगर जवाब में, ‘‘अच्छा निकल गया क्या वह? चलो ठीक है ओके,’’ कह कर फोन रख दिया गया.
विद्या का संदेह और गहरा गया. शाम को इस बारे में अमित से बात करूंगी, उस ने तय कर लिया. पर ऐसा हो न सका. रात को 12 बजे अमित घर पहुंचा, तब तक विद्या सो चुकी थी. सुबह उस को भी औफिस जाना था. अगले दिन जल्दी उठ कर घर के काम आदि से फ्री हो कर वह औफिस के लिए निकल गई.
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आज अमित को 10 बजे किसी साइट इंस्पैक्शन के लिए जाना था. इसलिए वह आराम से सो रहा था. विद्या ने उसे जगाना उचित और सासूमां से कह कर वह औटो से चली गई.
विद्या औफिस पहुंच तो गई, पर उस का काम में मन नहीं लगा. एक तो घर पर काम की थकान, ऊपर से 2 दिनों से अमित की उपेक्षा से उस को बेतरह मानसिक कष्ट पहुंचा था. दोपहर होतेहोते उस को जबरदस्त सिर में दर्द होने लगा, बेचैनी होने लगी, चक्कर जैसे आने लगे. वह तुरंत छुट्टी ले कर घर आ गई.
काश, उस दिन घर न आई होती और उस ने वह सबकुछ आंखों से न देखा होता तथा कानों ने सुना न होता, तो क्या उस की जिंदगी आज कुछ और होती? नहीं, ऐसा कभी न कभी तो होना ही था. विद्या की आंखों से न चाहते हुए भी आंसू बह निकले. वृंदा को चादर ओढ़ा कर विद्या उठ खड़ी हुई. वृंदा ने उस के आंसू देख लिए तो हजार सवाल पूंछे और उन के जवाब देना उस के लिए बहुत मुश्किल होगा. अपने कमरे में आ कर विद्या लेट गई. एक बार फिर पुरानी यादें उसे घेरने लगीं और जैसे यादों की कडि़यां एक के बाद एक जुड़ती गईं…
उस दिन दोपहर के लगभग 2 बजे थे जब विद्या घर पहुंची. यह समय सासससुर के सोने का होता था, इसलिए उस ने डुप्लिकेट चाबी से घर का दरवाजा खोला और अपने कमरे की ओर जाने लगी कि अचानक सासूजी के कमरे से आती आवाजों ने उस का ध्यान खींचा. उन में से एक तेज आवाज अमित की थी. कमरे का दरवाला खुला था, पर परदे गिरे हुए थे.
भीतर से अमित की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी. गुस्से से भरे लगभग चिल्लाते हुए अमित कह रहा था, ‘‘मां अब तुम मुझ पर जबरदस्ती नहीं कर सकतीं. मैं ने तुम से पहले ही कहा था, मैं शबनम को नहीं छोड़ सकता पर तुम नहीं मानीं यह कह कर कि इस से प्रिया की शादी पर असर पड़ेगा. जोर डाल कर तुम ने उस विद्या को मेरे पल्ले बांध दिया.
‘‘यह तो अच्छा हुआ कि दुबई प्रोजैक्ट में शबनम मेरे साथ थी वरना मैं तो पागल हो जाता. मां प्लीज अब तो प्रिया भी सैटल हो चुकी है, अब विद्या से मेरा तलाक होना जरूरी है. शबनम मुझे शादी के लिए परेशान कर रही है. मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता. तुम जल्दी से विद्या के मांबाप से बात करो और उन से कहो कि मुझे आजाद कर दें.’’
इस के पहले विद्या कुछ संभल पाती कि उसे ससुरजी की गरजती हुई आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मैं ने सोचा था कि शादी के बाद तुम सुधर जाओगे, मगर नहीं. तुम्हारे इश्क का भूत अभी तक नहीं उतरा. अरे अब तो तुम बाप बनने जा रहे हो, भूल जाओ पुरानी बातें.’’
विद्या को माजरा कुछ समझे कि उसे सास की मनुहार भरी आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘अरे बेटा, इतनी सुंदर, सुघड़ बहू, साथ में सरकारी नौकरी और क्या चाहिए तुझे?’’
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‘‘अरे मां नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी सुंदर बहू और उस की नौकरी. मुझे इस प्रौब्लम से जल्दी छुट्टी दिलाओ वरना मैं ने कुवैत में जौब के लिए बात की हुई है. इस बार जाऊंगा तो 15-20 साल नहीं आऊंगा, फिर रहना आराम से अपनी बहू के साथ,’’ यह अमित की विफरती हुई आवाज थी.
विद्या सकते में थी. अब सबकुछ उस के सामने स्पष्ट हो चुका था. उस की आंखों के आगे जैसे अंधेरा सा छा रहा था. उस के पैर लड़खड़ा गए, जबान सूख गई. वह दरवाजे का सहारा लेते हुए वही जमीन पर बैठ गई.
आवाज सुन कर सासूमां लगभग दौड़ती हुई बाहर आईं. विद्या की स्थिति देख कर उन को समझते देर न लगी कि वह सबकुछ सुन चुकी है. उन्होंने तुरंत उसे उठाया, भीतर ले जा कर बिस्तर पर लिटाया. जल्दी से जा कर वे उस के लिए चाय बना कर लाईं. उन्होंने रोती हुई विद्या को बैठा कर प्यार से उस का सिर सहलाया और जबरदस्ती चाय पिलाई.
ससुरजी चिंता से कमरे से अंदरबाहर हो रहे थे. अमित मौका देख कर अपनी बाइक उठा कर जा चुका था. उसे विद्या की कोई परवाह नहीं थी. सास विद्या को समझ रही थी, ‘‘रोओ नहीं बेटे अपनी तबीयत संभालो सब ठीक हो जाएगा.’’
थोड़ी देर बाद जब उन्हें लगा कि रोतेरोते विद्या सो गई है तो वे अपने कमरे में चली गईं.
आगे पढ़ें- अचानक समधीसमधन को आया देख कर…
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