Short Story : होटल सिटी पैलेस के रेस्तरां से बाहर निकलते समय पीहू की चाल जरूर धीमी थी मगर उस के कदमों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी. चेहरे पर उदासी की एक परत जरूर थी लेकिन पीहू ने उसे अपने मन के भीतर पांव नहीं पसारने दिया.
घर आ कर बिस्तर पर लेटी तो अखिल के साथ अपने रिश्ते को अंतिम विदाई देती उस की आंखें छलछला आईं.
पूरे 5 साल का साथ था उन का. ब्रेकअप तो खलेगा ही लेकिन इसे ब्रेकअप कहना शायद इस रिश्ते का अपमान होगा. इसे टूटा हुआ तो तब कहा जाता जब इस रिश्ते को जबरदस्ती बांधा जाता.
अखिल के साथ उस के बंधन में तो जबरदस्ती वाली कोई बात ही नहीं थी. यह तो दोनों का अपनी मरजी से एकदूसरे का हाथ थामना था जिसे अनुकूल न लगने पर उस ने बहुत हौले से छुड़ा लिया था, अखिल को भावी जीवन की शुभकामनाएं देते हुए.
पीहू और अखिल कालेज के पहले साल से ही अच्छे दोस्त थे. आखिरी बरस में आतेआते दोस्ती ने प्रेम का चोला पहन लिया. लेकिन यह प्रेम किस्सेकहानियों या फिल्मों वाले प्रेम की तरह अंधा नहीं बल्कि समय के साथ परिपक्व और समझदार होता गया था. यहां चांदतारे तोड़ कर चुनरी में टांकने जैसी हवाई बातें नहीं होती थीं, यहां तो अपने पांवों पर खड़ा हो कर साथ चलने के सपने देखे जा रहे थे.
कालेज खत्म होने के बाद पीहू और अखिल दोनों ही जौब की तलाश में जुट गए ताकि जल्द से जल्द अपने सपनों को हकीकत में ढाल सकें. हालांकि अखिल का अपना पारिवारिक व्यवसाय था लेकिन वह खुद को जमाने की कसौटी पर परखना चाहता था इसलिए एक बार कोई स्वतंत्र नौकरी करना चाहता था जो उसे विरासत में नहीं बल्कि खुद अपनी मेहनत से मिली हो.
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दोनों दिल्ली आ गए. एक ही कोचिंग में साथसाथ तैयारी करने और घर के अनुशासन से दूर रहने के बावजूद दोनों ने अपनी परिधि तय कर रखी थी. जब भी अकेले में कोई एक बहकने लगता तो दूसरा उसे संभाल लेता. कई जोड़ियों को लिवइन में रहते देख कर उन का मन अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटका.
“यार जब हम ने शादी करना तय कर ही लिया है तो अभी क्यों नहीं? सिर्फ एक बार…” कई बार उतावला पुरुष मन हठ पर उतर आता.
“शादी के बाद यही सब तो करना है. एक बार कैरियर बन जाए बस. फिर तो सदा साथ ही रहना है…” संयमी स्त्री उस के बढ़े हाथ हंस कर परे सरका देती. वहीं कभी जब सधे हुए नाजुक कदम अरमानों की ढलान पर फिसलने लगते तो दृढ़ मजबूत बांहें उन्हें सहारा दे कर थाम लेती और गर्त में गिरने से बचा लेती.
आज ऊपर तो कल नीचे, कोलंबस झूले से रिश्ते में दोनों झूल रहे थे. इसी बीच पीहू की बैंक में नौकरी लग गई और उस ने दिल्ली छोड़ दिया.
हालांकि दोनों फोन के माध्यम से बराबर जुड़े हुए थे लेकिन अब अखिल के लिए दिल्ली में अकेले रह कर परीक्षा की तैयारी करना जरा मुश्किल हो गया था. मन उड़ कर बारबार पीहू के पास पहुंच जाता लेकिन फिर भी वह खुद को एक मौका देने का मानस बनाए हुए वहां टिका रहा.
2 साल मेहनत करने के बाद भी अखिल का कहीं चयन नहीं हुआ तो वह वापस आ कर अपने परिवार के पुश्तैनी बिजनैस में हाथ बंटाने लगा. भागदौड़ खत्म हुई, स्थायित्व आ गया. जिंदगी एक तय रास्ते पर चलने लगी.
जैसाकि आम मध्यवर्गीय परिवारों में होता है, बच्चों के जीवन में स्थिरता आते ही घर में उन के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश शुरू हो जाती है. अखिल के घर में भी उस की शादी की बात चलने लगी. उधर पीहू के लिए भी लड़के की तलाश जोरशोर से जारी थी. जहां अखिल के परिवार की प्राथमिकता घरेलू लड़की थी, वहीं पीहू के घर वाले उस के लिए कोई बैंकर ही चाहते थे ताकि दोनों में आसानी से निभ जाए.
अखिल संयुक्त परिवार में तीसरी पीढ़ी का सब से बड़ा बेटा है. उस के द्वारा उठाया गया कोई भी अच्छाबुरा कदम भावी पीढ़ी के लिए लकीर बन सकता है. पारंपरिक मारवाड़ी परिवार होने के कारण अखिल के घर में बड़ों की बात पत्थर की लकीर मानी जाती है. दादा ने जो कह दिया वही फाइनल होता है. इस के बाद पापा या चाचा की एक नहीं चलने वाली. दूसरी तरफ पीहू का परिवार इस मामले में जरा तरक्कीपसंद है. उन्हें पीहू की पसंद पर कोई ऐतराज नहीं था बशर्ते कि उस का चयन व्यावहारिक हो.
परिवार की परिपाटी से भलीभांति परिचित अखिल घर वालों के सामने अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, उधर पीहू इस मामले में एकदम शांत थी. वह अखिल की पहल की प्रतीक्षा कर रही थी. उस ने ना तो अखिल पर शादी करने का कोई दबाव बनाया और ना ही अपनी असहमति जताई.
“पीहू मैं बहुत परेशान हूं यार. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा. घर वाले चाहते हैं कि मेरी शादी किसी सजातीय मारवाड़ी खानदान की लड़की से हो यानी यह शादी सिर्फ 2 लोगों का नहीं बल्कि 2 व्यापारिक घरानों का मिलन हो ताकि यह संबंध दोनों परिवारों के बिजनैस को भी आगे बढ़ाए, लेकिन तुम तो जानती हो ना मैं ने तो तुम्हारे साथ के सपने देखे हैं. तुम्हीं बताओ, मैं कैसे अपने दादाजी को राजी करूं?” एक दिन अखिल ने कहा.
“इतनी हिम्मत तो तुम्हें जुटानी ही होगी अखिल. यदि आज हिम्मत नहीं करोगे तो सोच लो, बाद में पछताना ना पड़े,” पीहू ने गंभीर हो कर कहा.
“तो क्या तुम कुछ नहीं करोगी?” अखिल ने आश्चर्य से पूछा.
“तुम्हारे परिवार के मामले में मैं क्या कर सकती हूं? मैं अपनेआप में साफ हूं और जानती हूं कि मुझे तुम से शादी करनी है. इस के लिए मेरे घर वाले भी राजी हो जाएंगे लेकिन पहले तुम तो अपने घर वालों को राजी करो. लेकिन एक बात ध्यान रहे अखिल, मैं जैसी हूं मुझे इसी रूप में स्वीकार करना होगा. मुझ से मेरी पहचान छीनने की कोशिश मत करना. ना अभी, ना बाद में,” पीहू ने अपना फैसला सुनाया तो अखिल सोच में पड़ गया.
आधुनिक और आत्मनिर्भर पीहू की छवि उस के दादाजी की पसंद से एकदम विपरीत है. वैसे भी उन के परिवार में आजतक कोई विजातीय बहू या दामाद नहीं आए. उन्हें पीहू के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा.
अखिल अपनी चाची से थोड़ा खुला हुआ था. उस ने उन से बात की. पहले तो चाची ने अखिल को ही समझाने का प्रयास किया लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने अखिल के चाचा से उस की पसंद का जिक्र किया. जैसाकि अंदेशा था, सुनते ही वे उखड़ गए.
“दिमाग खराब हो गया क्या लड़के का? अपने समाज में लड़कियों का अकाल पड़ गया क्या? अरे मैं तो उसे दिल्ली भेजने की उस की जिद पूरी करने के फैसले के ही खिलाफ था. फिर सोचा था जवानी की जिद है, सालदो साल में उतर जाएगी लेकिन यहां तो एक जिद के साथ दूसरी जिद भी साथ उठा लाया. एक तो बिजनैस में 2 साल पिछड़ गया, दूसरा यह प्रेम का चक्कर… समझाओ उसे कि नौकरी करने वाली लड़कियां हमारे यहां नहीं चल सकतीं,” चाचा ने अखिल को दिल्ली भेजने के बड़े भाई के फैसले का गुस्सा चाची पर उतारा.
लेकिन अखिल ने हौसला बनाए रखा. पिता को राजी करने का उस का प्रयास जारी रहा. इधर वह पीहू को भी जौब छोड़ने के लिए राजी कर रहा था ताकि कम से कम लड़की के घरेलू होने की शर्त तो पूरी हो सके. अखिल का प्रस्ताव पीहू के जरा भी गले नहीं उतरता था.
“तुम मुझे क्यों समझा रहे हो अखिल? मैं अपनी नौकरी जारी रखूंगी, बस इतना ही तो चाह रही हूं. देखो, समझने की जरूरत तुम्हें है. तुम्हारे सामने 2 विकल्प हैं. एक तुम्हारे परिवार की परंपरा और दूसरा तुम्हारा प्यार यानी मैं और मैं भी बिना अपनी पहचान खोए. जानते हो ना कि जब हमें 2 में से किसी 1 विकल्प का चुनाव करना होता है तो फैसला बहुत सोचसमझ कर करना पड़ता है. तुम तय करो कि तुम्हें क्या चाहिए,” पीहू ने दृढ़ता से कहा.
एक तरह से उस ने अपना निर्णय अखिल के सामने साफ कर दिया. बुझा हुआ अखिल एक बार फिर से अपने घर वालों को मनाने में जुट गया. इस बार उस ने दादाजी को चुना.
कहते हैं कि मूल से प्यारा सूद होता है. दादाजी पोते के आग्रह पर पिघल गए. थोड़ी नानुकुर के बाद उन्होंने विजातीय पीहू के साथ उस का गठजोड़ करने के लिए हरी झंडी दिखा दी. अपनी कुछ शर्तों के साथ वे पीहू के परिवार से मिलने को तैयार भी हो गए.
अखिल इसे अपनी जीत समझते हुए खुशी से उछलने लगा. उस ने फोन पर पीहू को यह खुशखबरी दी और आगे की प्लानिंग करने के लिए उसे उसी होटल सिटी पैलेस में मिलने के लिए बुलाया जहां वे अकसर मिला करते थे. हालांकि पीहू अभी भी थोड़ी आशंकित थी.
“तुम ने उन्हें बता तो दिया ना कि मैं शादी के बाद जौब नहीं छोडूंगी?” पीहू ने अखिल को एक बार फिर से आगाह किया.
“जौबजौब… यह कैसी जिद पकड़ कर बैठी हो तुम? अरे हमारे परिवार को कहां कोई कमी है जो अपनी बहूबेटियों से नौकरी करवाएंगे…” पीहू की बात सुनते ही अखिल बिफर गया.
पीहू की आशंका सही साबित हुई. उस ने अखिल की तरफ अविश्वास से देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने पीहू का हाथ कस कर पकड़ लिए और अपने स्वर को भरसक मुलायम किया.
“हमारे यहां बहुएं सिर्फ हुक्म चलाती हैं, हुक्म बजाती नहीं,” कहते हुए अखिल ने प्यार से पीहू के गाल खींच दिए. पीहू ने उस के हाथ झटक दिए.
“हमारे समाज में बहुओं के नखरे तब तक ही उठाए जाते हैं जब तक वे सिर पर पल्लू डाले, आंखें नीची किए सजीधजी गुड़िया सी घर में पायल बजाती घूमती रहें.”
“मुझ से यह उम्मीद मत रखना,” पीहू ने कहा.
“अरे यार गजब करती हो. एक बार शादी तो हो जाने दो फिर कर लेना अपने मन की. मैं बात करूंगा ना अपने घर वालों से,” अखिल ने उसे मनाने की कोशिश की.
“मेरे लिए भी यही बात तुम ने अपने घर में कही होगी कि एक बार शादी हो जाने दो, फिर छुड़वा देंगे नौकरी. मैं बात करूंगा ना पीहू से. है ना?”अखिल की आंखों में झांक कर पीहू ने उस की नकल उतारते हुए कहा.
बात सच ही थी. उस ने अपने दादाजी को यही कह कर पीहू से शादी करने के लिए राजी किया था. अखिल के पास पीहू के सवालों का कोई जवाब नहीं था. वह नजरें चुराने लगा.
“अच्छा बताओ, मेरी मां का नाम क्या है?” पीहू के अचानक दागे गए इस सवाल से अखिल अचकचा गया. उस ने इनकार में अपने कंधे उचका दिए.
“नहीं पता ना? पता होगा भी कैसे क्योंकि लोग उन्हें उन के नाम से जानते ही नहीं. वे बाहर के लोगों के लिए मिसेज सक्सेना और रिश्तेदारों के लिए पीहू की मम्मी हैं. और सिर्फ वे ही क्यों, ऐसी न जानें कितनी ही औरतें हैं जो अपना असली नाम भूल ही गई होंगी. वे या तो मिसेज अलांफलां या फिर गुड्डू, पप्पू की मम्मी के नाम से पहचानी जाती हैं. मैं ने देखा है अपने आसपास. अपने घर में भी. बहुत बुरा लगता है,” कहती हुई पीहू आवेश में आ गई.
“लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत जरूरी है. मैं तुम्हें प्यार करती हूं लेकिन सिर्फ इसी वजह से तुम्हारे घर में शोपीस बन कर नहीं रह सकती. तुम तो मेरे संघर्ष के साथी हो. सब जानते हो. मैं ने कितनी मुश्किल से अपनी पहचान बनाई है. इतनी मेहनत से हासिल इस मुकाम को मैं घूंघट की ओट में नहीं छिपा सकती. अपने नाम की पहचान को ऐशोआराम के लालच की आग में नहीं झोंक सकती,” पीहू ने अखिल का चेहरा पढ़ते हुए कहा.
“इस का मतलब तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी पहचान मुझ से अधिक जरूरी है. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा नाम मेरे नाम से जुड़ कर पहचाना जाए, हमारे नाम एक हो जाएं? जरा सोचो, पीहू अखिल लखोटिया… आहा… सोच कर ही कितना अच्छा लग रहा है,” अखिल के स्वर में अभी भी एक उम्मीद शेष थी.
“नहीं, मैं नहीं चाहती कि मेरी पहचान तुम्हारे नाम की केंचुली में छिप जाए. पीहू अखिल सक्सेना या पीहू सक्सेना लखोटिया जैसा कुछ बन कर इतराने की बजाय मैं सिर्फ पीहू सक्सेना कहलाना अधिक पसंद करूंगी. सक्सेना ना भी हो तो भी चलेगा. मैं तो सिर्फ पीहू बन कर भी खुश रहूंगी. बल्कि मैं तो कहती हूं कि दुनिया की हर लड़की के लिए उस की अपनी पहचान बहुत जरूरी है,” पीहू ने भावुक होते हुए अखिल का हाथ थाम लिया.
“यानी तुम्हारी ना समझूं? हमारे सपनों का क्या होगा पीहू?” अखिल रुआंसा हो गया.
“हमारे सपने जुड़े हुए जरूर थे लेकिन उस के बावजूद भी वे स्वतंत्र थे, एकदूसरे से अलग थे. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए अपने परिवार से बगावत करो, लेकिन माफ करना, मैं अपनी पहचान नहीं खो सकती. इसे तुम मेरा आखिरी फैसला ही समझो,” पीहू ने अपना आत्मविश्वास से भरा फैसला सुना दिया और स्नेह से अखिल का कंधा थपथपाती हुई उठ खड़ी हुई.
पीहू नहीं जानती थी कि वह अपने इस निर्णय को कितनी सहजता से स्वीकार कर पाएगी लेकिन यह भी तो आखिरी सच है कि हमारे हरेक कठोर निर्णय के समय मन के तराजू में एक तरफ निर्णय और दूसरी तरफ उस की कीमत रखी होती है.
आज भी पीहू के मन की तुला पर एक तरफ उस की निज पहचान थी तो दूसरी तरफ उस का प्रेम और सुविधाओं से भरा भविष्य. पीहू ने प्रेम की जगह अपनी पहचान को चुना. वह अखिल के नाम की केंचुली पहनने से इनकार कर अपने गढ़े हुए रास्ते पर बढ़ गई.
अखिल नम आंखों से उस आत्मविश्वास की मूरत को जाते हुए देख रहा था.