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अब तो ईशिता को लगता है कि जीवन में कुछ भी अपने वश में नहीं है. ये बड़ीबड़ी बातें करते, अपनी करनी बखानते और डींगें हांकते लोग शायद नहीं जानते कि पलभर में विधिना किसी को भी कहां से कहां ला कर पटक देती है.ईशिता तो जीवनभर अपनेआप पर मान करती आई.

संसार के पंक कीचड़ से बचती आई. संयम, नियम से जीना, कामनाओं को मुट्ठी में बंद रखना ही सीखा था उस ने. उस ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अपनी भावनाओं के बहाव में यों बह जाएगी कि संयम की बागडोर उस की मुट्ठी से खिसकती चली जाएगी.कहते हैं कि स्त्री के एक ही जन्म में कई जन्म होते हैं. ईशिता के भी हुए.

जो ईशिता अपने पितृगृह में तितली के पंखों सी सुकुमार सम झी गई, प्यारमनुहार जतन से पलकों की छांव में पालीपोसी गई वही ससुराल की देहरी पर पदार्पण करते ही दायित्वों के पहाड़ के नीचे दबा दी गई. उपालंभ, भर्त्सना और उपेक्षा भरे निर्मम व्यवहार के मध्य उस के कान प्यार भरे दो मीठे बोल सुनने को तरस जाते.

पति भोलेभाले थे. पत्नी के अधिक पढे़लिखे और नौकरी करने से भयत्रस्त थे. उस पर से उन की कंडीशनिंग भी ऐसी की गई थी कि प्रशंसा करना तो दूर वे चाह कर भी उस का पक्ष नहीं ले पाते कि कहीं वह सिर ही पर न चढ़ जाए या कोई उन्हें पत्नी का दास न कह दे.

ईशिता नौकरी करती थी. गृहकार्य पूर्ण होते तो औफिस जाने का समय हो आता. औफिस में कार्य कर वहां से थकहार कर घर लौटती तो ससुर कुल के लोग त्योरियां चढ़ाए दिनभर के कार्यों का अंबार पटकते हुए ऐसा दर्शाते मानो वह कहीं से घूमघाम कर, पिकनिक मना कर लौटी हो.

क्लांत ईशिता एक प्याली गरम चाय और विश्रांत के 2 पलों के लिए तरस जाती पर उसे कहीं चैन नहीं दो घड़ी का भी. रोनेबिसूरने का भी नहीं. स्कूलकालेज की परीक्षाओं में प्रथम आने वाली, अपने में व्यस्त रहने वाली ईशिता को सब की प्रशंसा पाने का ही अभ्यास था.

ससुर कुल के समवेत व्यवहार ने जैसे उस का विवेक ही छीन लिया. उसे लगने लगा कि उस में अपार कमियां हैं. ऐसी आत्महीनता में जीए जा रही थी ईशिता कि तभी एक दिन समय ने करवट ली.‘‘आप के हाथ बड़े सुंदर हैं, कलात्मक हाथ हैं आप के.’’ईशिता चौंक उठी.

संकोच से हाथ फाइल से हटा कर अपने आंचल में छिपा लिए. लगा जैसे कोई उपहास कर रहा हो. नित्य की भांति वह आज भी इन हाथों से जूठे बरतनों का ढेर साफ कर,  झाड़ूपोंछा कर के आई है. आज से पहले तो किसी ने उस के हाथों की प्रशंसा नहीं की.

नजर उठा कर सामने देखा, पुष्कर मुसकरा रहे थे. उन की आंखों में प्रशंसा लहलहा रही थी. वह पलभर के लिए उन आंखों में डूब गई.सचमुच मनुष्य सब से अधिक प्यार अपनेआप को करता है, तभी तो वह आकृष्ट हुई उन आंखों के प्रति जिन में उस के प्रति प्रशंसा छलक रही थी.मैं ने कहा, ‘‘आप की उंगलियां कलाकारों जैसी हैं, तराशी लंबी उंगलियां.

इतने सुंदर हाथ मैं ने सचमुच नहीं देखे.’’ वह इस बार हड़बड़ाई. क्या कहे, सम झ नहीं आया. सकुचाते हुए टेबल से फाइल ली और वापस अपनी सीट पर चली आई. गोद में रखे हाथों का छिप कर निरीक्षण किया. वाशरूम जा कर देखा. क्या सचमुच उस के हाथ सुन्दर हैं.

पर किसी ने कभी कहा क्यों नहीं. उस की हथेलियां पसीने से भीग गईं. दिल नगाड़े बजने जैसा इतना तेज धड़कने लगा कि उसे डर हुआ कि उस की धड़कन कोई बाहर से न सुन ले. घर में कोई सीधे मुंह बात तक नहीं करता उस से.

वह एक ऐसा जंतु है जिस से सारे कार्य कराए जाते हैं और कैसा भी व्यवहार.दूसरे दिन पुष्कर ने बुलाया. चर्चा के दौरान चाहकर भी आंखें नहीं उठतीं. लग रहा है जैसे वह सैकड़ों आंखों उसे ही देखती जा रही हैं. वह हीनभावना से सकुचाई जा रही है. एकाएक उन की आंखों में कौंधा भाव पढ़ कर वह ठगी सी रह गई. ढेरों प्रशंसा भरे नयन.

वह सिहर उठी. कोई उस की भी प्रशंसा कर सकता है, विश्वास न हुआ क्योंकि ससुराल में उसे अब तक जो भी मिला वह उस की कमी ही गिनता दिखा. बाहर औफिस में अब तक उस ने सब से दूरी ही बरती.

पुष्कर मन ही मन मुसकराए. अपनी पीठ ठोंकी उन्होंने. जिस ईशिता को सब लोग अलग प्रकृति का और आकाश के सितारे सा अलभ्य सम झते आए, वही कैसे उन की  झोली में गिरी पड़ रही है. ठिगने कद के, अति सामान्य रंगरूप के पुष्कर का मन खुशी से अट्टहास करने का होने लगा.

21 मार्च को जन्मदिन था ईशिता का. ससुराल में किसी को याद नहीं (या जानबू झ कर भूलने का ढोंग). जिस घर में कुत्तेबिल्ली का जन्मदिन भी धूमधाम से मनता हो, वहां उस के जन्मदिन पर एक नन्हा सा फूल भी नहीं, प्यार शुभकामना आशीष भरे बोल तक नहीं.

वचनों में भी दरिद्रता. पति तो और भी रूखेपन से बोले उस दिन. अंदर कुछ छनाक से टूट कर किर्चों में बिखर गया.‘क्यों जन्मी मैं. न जन्मती तो कितना अच्छा होता,’ ऐसे उदास विचारों में घिरी ईशिता जब औफिस पहुंची तो अपनी टेबल पर एक सुंदर कार्ड और फूलों का गुलदस्ता देख कर अभिभूत रह गई पुष्कर ने भेजा यह जान कर कसक हुई कि क्या पति  झूठमूठ भी उसे विश नहीं कर सकते थे.

यदि यही उपहार उन्होंने दिया होता तो कितना अच्छा होता. कार्ड में हाथ से लिखी कुछ पंक्तियां भी थीं-चांदनी रातों मेंसितारों की बरसातों मेंलगता है जैसे तुम साथ होसूने हृदय की देहरी परदीप जलातीमंदमंद मुसकराती तुममेरे जीवन कीअनमोल निधि हो.

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